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नौसेना के बेड़े में शामिल होंगी छह नई सबमरीन

Ratna Netam
16 Aug 2026 5:56 PM IST
नौसेना के बेड़े में शामिल होंगी छह नई सबमरीन
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नई दिल्ली। भारतीय नौसेना की पानी के भीतर युद्ध क्षमता बढ़ाने वाला लंबे समय से लंबित प्रोजेक्ट 75(I) अब निर्णायक चरण में पहुंच सकता है। करीब 70 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत छह आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है। रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना का प्रस्ताव जल्द ही सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति यानी CCS के सामने मंजूरी के लिए रखा जा सकता है।
हालांकि, अभी इस सौदे को अंतिम सरकारी मंजूरी नहीं मिली है। CCS की स्वीकृति और अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के बाद ही निर्माण कार्यक्रम, लागत तथा डिलीवरी की समयसीमा औपचारिक रूप से तय होगी। प्रोजेक्ट को लेकर वाणिज्यिक और तकनीकी बातचीत पिछले काफी समय से चल रही है। लागत, तकनीक हस्तांतरण और स्वदेशी हिस्सेदारी जैसे विषयों के कारण प्रक्रिया में कई बार देरी हुई है।
मुंबई में होगा पनडुब्बियों का निर्माण
योजना के मुताबिक, छह पनडुब्बियों का निर्माण मुंबई स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी MDL में किया जाएगा। इसमें जर्मनी की नौसैनिक जहाज निर्माण कंपनी थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी TKMS डिजाइन, तकनीक और निर्माण संबंधी सहयोग उपलब्ध कराएगी।
TKMS और मझगांव डॉक का गठजोड़ इस परियोजना का प्रमुख दावेदार है। जनवरी 2025 में प्रस्तावित पनडुब्बी के समुद्री परीक्षण सफल रहने के बाद यह गठजोड़ एकमात्र पात्र दावेदार के रूप में सामने आया था। स्पेन की नवांतिया और भारत की लार्सन एंड टुब्रो का प्रतिस्पर्धी प्रस्ताव निर्धारित तकनीकी मानकों पर खरा नहीं उतर सका था।
प्रोजेक्ट 75(I) का उद्देश्य केवल तैयार पनडुब्बियां खरीदना नहीं है। भारत इसके माध्यम से पनडुब्बियों के निर्माण, रखरखाव, आधुनिकीकरण और भविष्य की स्वदेशी डिजाइन क्षमता विकसित करना चाहता है। इसलिए तकनीक हस्तांतरण और भारतीय कंपनियों की भागीदारी इस समझौते के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
AIP तकनीक से लंबे समय तक रहेंगी पानी में
नई पनडुब्बियों में एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP सिस्टम मिलने की उम्मीद है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह के करीब आकर हवा लेनी पड़ती है। इससे उनकी स्थिति का पता लगने का जोखिम बढ़ जाता है।
AIP तकनीक पनडुब्बी को ज्यादा समय तक पानी के नीचे रहने की सुविधा देती है। इससे उसकी गोपनीयता, निगरानी और युद्ध क्षमता बेहतर होती है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित पनडुब्बियां दो सप्ताह से अधिक समय तक सतह पर आए बिना अभियान चलाने में सक्षम हो सकती हैं।
इनमें आधुनिक सोनार और सेंसर, हैवीवेट टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल, कम्युनिकेशन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण शामिल किए जा सकते हैं। हालांकि, हथियारों और दूसरे उपकरणों का अंतिम संयोजन अनुबंध के बाद ही स्पष्ट होगा।
भारतीय कंपनियों से साझेदारी बढ़ा रही TKMS
CCS के फैसले से पहले TKMS ने भारत में रक्षा आपूर्ति नेटवर्क बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। कंपनी ने हैदराबाद स्थित VEM Technologies के साथ हैवीवेट टॉरपीडो के संयुक्त विकास और उत्पादन के लिए टीमिंग समझौता किया है।
इस साझेदारी में TKMS की इकाई एटलस इलेक्ट्रॉनिक तकनीकी सहयोग देगी, जबकि VEM Technologies भारत में टॉरपीडो के एकीकरण और परीक्षण की जिम्मेदारी संभालेगी। दोनों कंपनियों ने सितंबर 2025 में शुरुआती समझौता किया था, जिसे मार्च 2026 में विस्तृत टीमिंग समझौते में बदल दिया गया।
TKMS ने मुंबई की CFF Fluid Control के साथ सतह पर चलने वाले युद्धपोतों के लिए एंटी-सबमरीन वारफेयर सिस्टम विकसित करने में भी सहयोग किया है। कंपनी अन्य भारतीय संगठनों और DRDO के साथ संभावित साझेदारियों पर भी विचार कर रही है।
नौसेना के लिए क्यों जरूरी है परियोजना?
भारतीय नौसेना का पारंपरिक पनडुब्बी बेड़ा पुराना हो रहा है और कई पनडुब्बियां आने वाले वर्षों में सेवा से बाहर हो सकती हैं। दूसरी ओर, हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की नौसैनिक और पनडुब्बी गतिविधियां बढ़ी हैं। ऐसे में छह नई पनडुब्बियां भारत की समुद्री निगरानी, दुश्मन के युद्धपोतों और पनडुब्बियों का मुकाबला करने तथा रणनीतिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा में मदद करेंगी।
CCS की मंजूरी मिलने के बाद भी पनडुब्बियों के निर्माण और परीक्षण में कई वर्ष लग सकते हैं। इसलिए यह परियोजना भारत की तत्काल आवश्यकता के साथ दीर्घकालिक स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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