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मनन मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका BCI में नीतिगत फैसलों पर लगी रोक

Ratna Netam
2 Sept 2026 3:59 PM IST
मनन मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका BCI में नीतिगत फैसलों पर लगी रोक
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नई दिल्ली। देश में वकीलों की सर्वोच्च वैधानिक संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI के कामकाज और उसके अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के लंबे कार्यकाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। मुख्य न्यायाधीश **सूर्यकांत**, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि मौजूदा व्यवस्था में मनन कुमार मिश्रा को लोकतांत्रिक रूप से चुने गए स्थायी अध्यक्ष की तरह नहीं देखा जा सकता। नई BCI के गठन तक उनकी स्थिति मूल रूप से ‘प्रो टेम’ यानी अंतरिम अध्यक्ष जैसी है और उनका प्रमुख दायित्व संस्था के रोजमर्रा के कामकाज को चलाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही BCI के बड़े नीतिगत फैसलों पर एक महत्वपूर्ण नियंत्रण लगा दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि नई निर्वाचित BCI के गठन तक संस्था के प्रत्येक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय में भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए। यानी अंतरिम अवधि में BCI नेतृत्व स्वतंत्र रूप से बड़े नीतिगत फैसले नहीं ले सकेगा।
मनन मिश्रा के लंबे कार्यकाल पर उठे सवाल
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया जिनमें मनन कुमार मिश्रा के BCI अध्यक्ष के रूप में लंबे समय से बने रहने की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि मिश्रा लंबे समय से संस्था के शीर्ष पद पर बने हुए हैं और उनके कार्यकाल की अवधि तथा BCI के नियमों के बीच गंभीर कानूनी सवाल मौजूद हैं।
एक याचिका के मुताबिक मिश्रा नवंबर 2014 से लगातार BCI अध्यक्ष पद पर हैं। याचिकाकर्ताओं ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे प्रमुख पदों के लिए निश्चित कार्यकाल और कार्यकाल की संख्या सीमित करने की मांग भी उठाई है। उनका तर्क है कि किसी राष्ट्रीय नियामक संस्था के शीर्ष पदों पर लंबे समय तक एक ही व्यक्ति का बने रहना संस्थागत प्रतिनिधित्व और जवाबदेही से जुड़े सवाल पैदा करता है।
मनन कुमार मिश्रा बिहार से भाजपा के राज्यसभा सांसद भी हैं। इसी वजह से उनके BCI अध्यक्ष पद पर बने रहने से जुड़ा मामला कानूनी के साथ राजनीतिक चर्चा का विषय भी बन गया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न उनकी राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि BCI के वैधानिक ढांचे, चुनाव और अध्यक्ष के कार्यकाल से संबंधित है।
पांच साल के कार्यकाल पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल
सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा BCI अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल पांच साल किए जाने को लेकर सामने आया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि 2 मार्च 2025 की BCI जनरल काउंसिल बैठक में मनन कुमार मिश्रा को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया था और उनका नया कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया। इससे पहले 9 जनवरी 2025 के एक प्रस्ताव के जरिए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल बढ़ाकर पांच वर्ष करने की बात सामने आई थी।
याचिकाकर्ताओं ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि BCI Rules का Rule 12(2) इन पदों के लिए दो साल का कार्यकाल निर्धारित करता है। ऐसे में सवाल उठाया गया कि महज एक प्रस्ताव के जरिए वैधानिक नियमों के विपरीत कार्यकाल कैसे बढ़ाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रथम दृष्टया इस व्यवस्था पर सवाल उठाए और साफ किया कि मौजूदा स्थिति को 2030 तक स्वतः जारी रहने वाली व्यवस्था के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा- आप प्रो टेम चेयरमैन की तरह हैं
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची की टिप्पणी इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही। उन्होंने BCI की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णकुमार से कहा कि मौजूदा अध्यक्ष की स्थिति नए चुनाव तक प्रो टेम चेयरमैन जैसी है।
अदालत का आशय था कि जब राज्य बार काउंसिलों के चुनाव हो चुके हैं और नई परिषदों के गठन की प्रक्रिया चल रही है तो वर्तमान नेतृत्व अनिश्चितकाल तक पूर्ण निर्वाचित अधिकारों का दावा नहीं कर सकता। नई राज्य बार काउंसिलें अपने प्रतिनिधि BCI में भेजेंगी और उसके बाद नई BCI अपने पदाधिकारियों का चुनाव करेगी।
इस अंतरिम अवधि में वर्तमान अध्यक्ष रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्य संभाल सकते हैं, लेकिन व्यापक प्रभाव वाले नीतिगत फैसलों पर अदालत ने अतिरिक्त संस्थागत निगरानी जरूरी मानी है।
अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की बढ़ी भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि नई BCI के गठन तक प्रत्येक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए। BCI की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी इस व्यवस्था पर सहमति जताई।
हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि दोनों शीर्ष कानून अधिकारियों को BCI के हर छोटे प्रशासनिक काम में शामिल होने की जरूरत नहीं होगी। रोजमर्रा के काम मौजूदा व्यवस्था के तहत चलते रहेंगे। लेकिन ऐसा कोई फैसला जिसका व्यापक नीतिगत प्रभाव हो, उसमें AG और SG की भागीदारी होगी।
इस निर्देश को मनन मिश्रा की नीतिगत शक्तियों पर महत्वपूर्ण अंकुश के रूप में देखा जा रहा है।
Advocates Act की धारा 4(3) का क्या है पेच?
पूरे विवाद की जड़ में **Advocates Act, 1961 की धारा 4(3)** का प्रावधान भी है। इसके तहत BCI का कोई निर्वाचित सदस्य सामान्य कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी अपने उत्तराधिकारी के चुने जाने तक पद पर बना रह सकता है।
इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य प्रशासनिक शून्यता से बचना है। यानी अगर नए सदस्य का चुनाव किसी वजह से नहीं हुआ तो संस्था का काम अचानक बंद न हो जाए।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इसी अंतरिम प्रावधान का इस्तेमाल लंबे कार्यकाल को जारी रखने के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने भी संकेत दिया कि यह व्यवस्था मूल रूप से संक्रमणकालीन है। इसलिए नई BCI के गठन की प्रक्रिया पूरी होते ही निर्वाचित व्यवस्था सामने आनी चाहिए।
नई BCI के गठन का रास्ता साफ करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट का ध्यान केवल मनन मिश्रा के कार्यकाल तक सीमित नहीं है। अदालत चाहती है कि राज्य बार काउंसिलों से लेकर BCI तक पूरी चुनावी प्रक्रिया समय पर पूरी हो।
पीठ ने संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लंबित co-option की प्रक्रिया दो सप्ताह के भीतर पूरी करने को कहा है। इसके बाद राज्य बार काउंसिलों को अपनी अंतिम संरचना अधिसूचित करनी होगी और फिर Advocates Act की धारा 4(1)(c) के तहत BCI के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
नई राज्य बार काउंसिलों के प्रतिनिधि चुने जाने के बाद BCI का पुनर्गठन संभव होगा। इसके बाद नई परिषद अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष समेत पदाधिकारियों का चुनाव करेगी।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर भी अदालत का जोर
राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने पहले निर्देश दिए थे। अदालत ने 30 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व की दिशा में व्यवस्था बनाने को कहा था, जिसमें 20 प्रतिशत प्रत्यक्ष चुनाव और शेष 10 प्रतिशत co-option के माध्यम से सुनिश्चित करने की प्रक्रिया शामिल है।
इसी प्रक्रिया के पूरा होने में देरी के कारण कुछ राज्य बार काउंसिलों की अंतिम संरचना अभी पूरी नहीं हुई है। अब अदालत ने इसे तेजी से पूरा करने के निर्देश दिए हैं ताकि नई BCI के गठन का रास्ता खुल सके।
PEARL Trust पर भी उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान केवल अध्यक्ष के कार्यकाल का मुद्दा ही नहीं उठा। BCI से जुड़े **PEARL Trust** को लेकर भी अदालत के सामने सवाल रखे गए।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि 2020 में Bar Council of India Trust for Promotion of Education, Legal and Professional Reforms and Improvement in Research यानी PEARL Trust बनाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके ट्रस्ट डीड में 11 मैनेजिंग ट्रस्टी को ‘मूल और स्थायी ट्रस्टी’ के तौर पर रखने का प्रावधान किया गया और उनका ट्रस्टी पद BCI सदस्य के रूप में उनके कार्यकाल से स्वतंत्र बताया गया।
अदालत ने इस पर सवाल किया कि एक निर्वाचित वैधानिक संस्था की संपत्ति से बने ट्रस्ट में व्यक्ति संस्था की सदस्यता समाप्त होने के बाद भी स्थायी रूप से कैसे बने रह सकते हैं। हालांकि ये आरोप फिलहाल न्यायालय के सामने विचाराधीन हैं और अदालत ने इन पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
NALSAR विवाद के बाद बढ़ी थी जांच
मनन मिश्रा और BCI का कामकाज हाल में NALSAR University of Law के 2026 बैच से जुड़े विवाद के कारण भी चर्चा में आया था। BCI ने छात्रों के एक विरोध के बाद उनके नामांकन से जुड़ी कार्रवाई की थी। बाद में संबंधित रोक वापस ले ली गई और छात्रों के खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी गई। मिश्रा ने भी बाद में अपने शब्दों या BCI की कार्रवाई से हुई तकलीफ के लिए माफी मांगी थी।
इसी विवाद के बाद BCI के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और अध्यक्ष के लंबे कार्यकाल को लेकर सवाल और तेज हुए।
क्या मनन मिश्रा को पद से हटा दिया गया?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को समझते समय यह अंतर बेहद जरूरी है। अदालत ने फिलहाल मनन कुमार मिश्रा को BCI अध्यक्ष पद से हटाने का आदेश नहीं दिया है। मौजूदा व्यवस्था को दैनिक कामकाज के लिए जारी रहने दिया गया है।
लेकिन अदालत ने यह साफ कर दिया है कि उनकी मौजूदा स्थिति को 2030 तक पूर्ण अधिकार वाले निर्वाचित अध्यक्ष के कार्यकाल की तरह नहीं माना जा सकता। नई BCI बनने तक उनका काम मुख्यतः दिन-प्रतिदिन का प्रशासन संभालना होगा और बड़े नीतिगत फैसलों में AG तथा SG की सक्रिय भागीदारी जरूरी होगी।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल पद हटाने के बजाय **शक्तियों पर संस्थागत नियंत्रण और जल्द चुनाव** का रास्ता चुना है।
क्यों महत्वपूर्ण है सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप?
BCI देश में अधिवक्ताओं के पेशे को नियंत्रित करने वाली शीर्ष वैधानिक संस्था है। वकीलों के नामांकन, पेशेवर मानकों और कानूनी शिक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में इसकी भूमिका होती है। इसलिए इसके नेतृत्व की वैधानिकता और निर्णय प्रक्रिया का पारदर्शी होना पूरे कानूनी पेशे के लिए महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश ने तीन बातें स्पष्ट कर दी हैं—मौजूदा नेतृत्व को स्थायी निर्वाचित व्यवस्था नहीं माना जाएगा, अंतरिम अवधि में बड़े नीतिगत फैसलों पर AG और SG की निगरानी रहेगी और नई BCI के गठन की प्रक्रिया को जल्द पूरा किया जाएगा।
अब सभी की नजर राज्य बार काउंसिलों की शेष प्रक्रिया और नई BCI के गठन पर है। उसके बाद ही यह साफ होगा कि देश के वकीलों की सर्वोच्च संस्था की नई कमान किसके हाथ में जाएगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है—अंतरिम व्यवस्था को स्थायी अधिकार का आधार नहीं बनाया जा सकता और संस्था के बड़े फैसले अब अतिरिक्त संस्थागत निगरानी में होंगे।
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