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EVM टोटलाइजर को लेकर SC का बड़ा सवाल 18 साल से क्यों लटका है फैसला
Ratna Netam
2 Sept 2026 3:43 PM IST

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नई दिल्ली। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM से जुड़े एक पुराने लेकिन बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मामला चुनाव में **‘टोटलाइजर’ मशीन** के इस्तेमाल से जुड़ा है। इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग मतदान केंद्रों पर पड़े वोटों का अलग-अलग परिणाम दिखाने के बजाय कई EVM के वोटों को एक साथ जोड़कर गिनना है, ताकि किसी खास बूथ के मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का अनुमान न लगाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि EVM से डाले गए वोटों की गिनती में टोटलाइजर व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई जा सकती। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या इसके इस्तेमाल में कोई कानूनी, तकनीकी या प्रशासनिक बाधा है और इससे चुनाव प्रक्रिया पर कोई नकारात्मक असर पड़ेगा या नहीं। चुनाव आयोग को भी इस संबंध में अपना प्रस्ताव केंद्र के सामने रखने को कहा गया है।
दिलचस्प बात यह है कि टोटलाइजर का विचार नया नहीं है। इस तकनीक पर करीब **18 साल से चर्चा** चल रही है और इसका एक प्रोटोटाइप वर्ष 2007 में ही तैयार होकर प्रदर्शित किया जा चुका था। फिर भी आज तक इसे नियमित चुनावी मतगणना में लागू नहीं किया गया है।
आखिर टोटलाइजर मशीन होती क्या है?
आसान भाषा में समझें तो मौजूदा व्यवस्था में प्रत्येक EVM की कंट्रोल यूनिट से उम्मीदवारों को मिले वोटों की संख्या अलग-अलग निकाली जाती है। इससे यह पता चल सकता है कि किसी खास मतदान केंद्र पर किस उम्मीदवार को कितने वोट मिले।
उदाहरण के लिए अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में 200 से ज्यादा मतदान केंद्र हैं तो मतगणना के दौरान बूथवार आंकड़े सामने आने से उम्मीदवारों को यह पता चल सकता है कि कौन सा इलाका उसके पक्ष में था और कौन सा उसके खिलाफ। यही जानकारी टोटलाइजर के समर्थकों के अनुसार मतदाताओं की गोपनीयता को प्रभावित कर सकती है।
टोटलाइजर का उद्देश्य इस जानकारी को एक बड़े समूह में मिला देना है। चुनाव आयोग के 2016 के प्रस्ताव के मुताबिक टोटलाइजर एक साथ **14 EVM की कंट्रोल यूनिट** से वोटों को जोड़ सकता है और उम्मीदवारवार कुल आंकड़ा देता है, लेकिन किसी एक EVM यानी किसी एक मतदान केंद्र का अलग परिणाम सामने नहीं आता।
इसका मतलब यह नहीं है कि वोटों की संख्या छिपा दी जाएगी। वोटों की गिनती होगी और उम्मीदवारों को मिलने वाले कुल वोट सामने आएंगे, लेकिन किसी एक बूथ का उम्मीदवारवार परिणाम अलग से नहीं दिखेगा।
18 साल से क्यों अटका है मामला?
टोटलाइजर का प्रोटोटाइप 2007 में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ने चुनाव आयोग को प्रदर्शित किया था। इसके बाद चुनाव आयोग ने कई मौकों पर इसके इस्तेमाल की जरूरत बताई।
2013 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने कानून मंत्री को पत्र लिखकर बताया था कि करीब 12 से 15 मतदान केंद्रों की EVM को एक साथ गिनने से अलग-अलग EVM का परिणाम उजागर किए बिना मतगणना की जा सकती है। बाद में चुनाव आयोग ने 14 मशीनों को एक समूह के रूप में जोड़ने का प्रस्ताव रखा।
2015 में विधि आयोग ने भी चुनाव सुधारों पर अपनी 255वीं रिपोर्ट में इस प्रस्ताव का उल्लेख किया। इसके बावजूद व्यवस्था को लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी बदलाव नहीं हो सके।
यही वजह है कि तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद मामला वर्षों तक आगे नहीं बढ़ पाया।
असली पेच कानून का है
टोटलाइजर को लेकर सबसे बड़ा सवाल सिर्फ मशीन की तकनीक नहीं बल्कि **मतगणना के मौजूदा कानूनी नियमों** से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से यह सवाल उठाया है कि क्या EVM की गिनती के लिए भी ऐसा प्रावधान बनाया जा सकता है जैसा कागजी मतपत्रों के मामले में नियम 59A के तहत कुछ परिस्थितियों में मतों को मिलाने की अनुमति देता है।
यानी अदालत यह देखना चाहती है कि जब मतपत्रों के मामले में मतों को एक साथ मिलाने का कानूनी रास्ता मौजूद है तो EVM के लिए समान व्यवस्था बनाने में क्या दिक्कत है।
इसलिए इस मामले में संसद और केंद्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि मौजूदा चुनाव नियमों में बदलाव जरूरी है तो उसके लिए विधायी प्रक्रिया अपनानी होगी।
चुनाव आयोग की क्या भूमिका है?
चुनाव आयोग टोटलाइजर के विचार से पूरी तरह अनजान नहीं है। आयोग के अपने FAQ में भी टोटलाइजर का उल्लेख है। आयोग के मुताबिक ऐसा प्रोटोटाइप मौजूद है जो एक समय में अधिकतम 14 कंट्रोल यूनिट के वोटों को जोड़ सकता है और संबंधित मतदान केंद्र की उम्मीदवारवार संख्या को उजागर किए बिना कुल परिणाम दे सकता है।
हालांकि आयोग यह भी कहता है कि टोटलाइजर फिलहाल इस्तेमाल में नहीं है और इसके तकनीकी, वैधानिक तथा प्रशासनिक पहलुओं की जांच चल रही है। मामला न्यायालय में विचाराधीन होने की बात भी आयोग के FAQ में दर्ज है।
समर्थकों का तर्क क्या है?
टोटलाइजर के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क **मतदाता की गोपनीयता** है।
मान लीजिए किसी छोटे इलाके में किसी उम्मीदवार को बहुत कम वोट मिले। अगर उम्मीदवारों और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बूथवार आंकड़े उपलब्ध हैं तो उन्हें यह पता चल सकता है कि किसी खास इलाके के मतदाताओं ने किस तरह मतदान किया।
इससे चुनाव के बाद मतदाताओं पर दबाव या राजनीतिक बदले की आशंका पैदा होने की बात टोटलाइजर के समर्थक उठाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए कहा है कि यह व्यवस्था मतदाताओं के राजनीतिक चुनाव को अनाम बनाने में मददगार हो सकती है।
अदालत की चिंता मूल रूप से यही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसके मतदान केंद्र का सामूहिक राजनीतिक रुझान उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
विरोध या आपत्ति कहां है?
टोटलाइजर लागू करने में कुछ व्यावहारिक सवाल भी हैं। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि बूथवार परिणाम चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मिलान के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अगर कई EVM के वोटों को एक साथ जोड़ दिया जाए तो उम्मीदवारों और उनके एजेंटों के लिए हर मतदान केंद्र के परिणाम का सीधा मिलान करना पहले जैसी स्थिति में नहीं रहेगा। यही कारण है कि टोटलाइजर के साथ पारदर्शिता और सत्यापन की व्यवस्था कैसे बनाए रखी जाए, यह महत्वपूर्ण सवाल है।
इसके अलावा मौजूदा चुनाव कानूनों और नियमों में बदलाव की आवश्यकता भी एक बड़ी बाधा है। केंद्र को अब अदालत के सामने इन सभी पहलुओं पर अपना रुख स्पष्ट करना होगा।
क्या टोटलाइजर से EVM की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा?
यह समझना जरूरी है कि टोटलाइजर का उद्देश्य EVM में दर्ज वोटों को बदलना नहीं है। यह मुख्य रूप से **मतगणना के तरीके** से संबंधित व्यवस्था है।
यानी EVM में जिस उम्मीदवार के जितने वोट रिकॉर्ड हुए हैं, टोटलाइजर उन्हें कई मशीनों के समूह में जोड़कर उम्मीदवारवार कुल आंकड़ा तैयार करेगा। चुनाव आयोग के अनुसार प्रस्तावित मशीन का उद्देश्य व्यक्तिगत EVM के उम्मीदवारवार आंकड़े को सार्वजनिक होने से रोकना है।
इसलिए टोटलाइजर की बहस को EVM में वोट बदलने या मशीन से छेड़छाड़ के सवाल से अलग समझना जरूरी है। यह मुख्यतः बूथवार परिणाम की गोपनीयता और मतगणना के स्वरूप से जुड़ा विषय है।
सुप्रीम कोर्ट के सवाल के बाद क्या होगा?
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से स्पष्ट जवाब मांगा है कि EVM वोटों की गिनती में टोटलाइजर लागू करने में क्या बाधाएं हैं। साथ ही चुनाव आयोग को भी अपनी स्थिति और प्रस्ताव रखने को कहा गया है।
यदि केंद्र सरकार इसके पक्ष में कोई रास्ता सुझाती है तो चुनाव नियमों में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि सरकार तकनीकी या प्रशासनिक कठिनाइयों का हवाला देती है तो अदालत उन कारणों की जांच कर सकती है।
18 साल पुरानी बहस फिर क्यों महत्वपूर्ण हुई?
टोटलाइजर का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चुनाव में दो जरूरी सिद्धांतों के बीच संतुलन का सवाल उठाता है—**पारदर्शिता और मतदाता की गोपनीयता**।
एक तरफ मतगणना ऐसी होनी चाहिए जिसे उम्मीदवार और उनके एजेंट जांच सकें। दूसरी तरफ मतदाता को यह भरोसा भी होना चाहिए कि उसके मतदान केंद्र का सामूहिक रुझान उसके खिलाफ राजनीतिक दबाव का आधार नहीं बनेगा।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख इसी संतुलन की तलाश के तौर पर देखा जा सकता है। करीब 18 साल पहले जिस तकनीक का प्रोटोटाइप सामने आ चुका था, वह अब फिर न्यायिक चर्चा के केंद्र में है।
फिलहाल टोटलाइजर लागू करने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल केंद्र से जवाब और चुनाव आयोग से प्रस्ताव मांगा है। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि आने वाले चुनावों में बूथवार EVM की जगह टोटलाइजर से मतगणना शुरू हो जाएगी। लेकिन अदालत की पहल ने इस लंबे समय से लंबित चुनाव सुधार को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में जरूर ला दिया है।
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