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छात्रा से जुड़े मामले में SC की अहम टिप्पणी यौन मंशा पर दिया जोर
Ratna Netam
11 Sept 2026 5:58 PM IST

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक और छात्रा से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी नाबालिग को छूने भर से हर परिस्थिति में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण यानी **POCSO Act** के तहत अपराध स्वतः साबित नहीं हो जाता। अदालत को घटना की परिस्थितियों और कानून में आवश्यक **sexual intent यानी यौन मंशा** जैसे तत्वों को भी देखना होता है। संबंधित मामले में शिक्षक पर छात्रा की पीठ छूने और कमर पर हाथ रखने जैसे आरोप लगाए गए थे। अदालत ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर POCSO के तहत लगाए गए आरोपों के टिकने पर सवाल उठाया।
इस फैसले को यह सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए कि किसी शिक्षक द्वारा छात्रा की पीठ या कमर को छूना हमेशा POCSO के दायरे से बाहर रहेगा। POCSO में अपराध तय करने के लिए स्पर्श की प्रकृति, परिस्थितियां और यौन मंशा महत्वपूर्ण हो सकती है। हर मामले का फैसला उसके अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होता है।
क्या था पूरा मामला?
मामला एक शिक्षक और छात्रा के बीच स्कूल में हुई कथित घटना से जुड़ा था। शिक्षक पर आरोप लगाया गया कि उसने छात्रा की पीठ को छुआ और उसकी कमर पर हाथ रखा।
शिकायत सामने आने के बाद मामला कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचा और शिक्षक के खिलाफ POCSO Act के प्रावधानों के तहत भी आरोप लगाए गए।
मामला अदालतों से गुजरते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह बना कि शिकायत में बताए गए कथित स्पर्श को कानून की नजर में POCSO के तहत यौन हमला माना जा सकता है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए इस सवाल पर विचार किया।
POCSO में 'यौन मंशा' क्यों महत्वपूर्ण?
POCSO Act बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया विशेष कानून है। इसके तहत कई प्रकार के यौन अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है।
कानून में कुछ प्रकार के शारीरिक संपर्क वाले अपराधों के संदर्भ में **sexual intent** महत्वपूर्ण तत्व है।
इसका अर्थ यह है कि किसी मामले में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं हो सकता कि आरोपी ने बच्चे को छुआ था। अदालत यह भी देख सकती है कि कथित स्पर्श किस परिस्थिति में हुआ और उसके पीछे यौन मंशा स्थापित होती है या नहीं।
इसी वजह से सामान्य या आकस्मिक शारीरिक संपर्क और यौन मंशा से किए गए स्पर्श के बीच कानूनी अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है।
पीठ और कमर छूने के आरोप पर क्या सवाल?
संबंधित मामले में शिक्षक पर छात्रा की पीठ और कमर को छूने का आरोप था।
अदालत के सामने सवाल था कि क्या शिकायत में बताए गए तथ्य अपने आप POCSO के तहत संबंधित अपराध की सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
अदालत ने आरोपों को उनके संदर्भ में देखा। यदि किसी कथित स्पर्श के पीछे यौन मंशा का आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होता तो केवल शारीरिक संपर्क के आधार पर POCSO की संबंधित धारा लागू करना उचित नहीं हो सकता।
लेकिन इसका उलटा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अगर इसी तरह का स्पर्श यौन मंशा से किया गया हो और मामले के तथ्य उसका संकेत देते हों तो परिस्थितियां पूरी तरह अलग हो सकती हैं।
इसलिए फैसले को 'कमर या पीठ छूना POCSO अपराध नहीं है' जैसे सार्वभौमिक नियम के रूप में पढ़ना गलत होगा।
हर स्पर्श POCSO अपराध क्यों नहीं?
स्कूल, अस्पताल, खेल मैदान और रोजमर्रा की जिंदगी में बच्चों और वयस्कों के बीच कई तरह के सामान्य शारीरिक संपर्क हो सकते हैं।
शिक्षक किसी बच्चे को रास्ता दिखाने के लिए कंधे पर हाथ रख सकता है। डॉक्टर इलाज के दौरान बच्चे को छू सकता है। खेल प्रशिक्षक किसी तकनीक को समझाने के लिए आवश्यक संपर्क कर सकता है।
अगर हर प्रकार के स्पर्श को परिस्थितियों की जांच किए बिना यौन अपराध मान लिया जाए तो कानून का दायरा उसके उद्देश्य से अलग हो जाएगा।
इसीलिए POCSO की संबंधित धाराओं में यौन मंशा जैसे तत्व महत्वपूर्ण हैं।
दूसरी तरफ बच्चे की शिकायत को केवल इस आधार पर नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता कि आरोपी शिक्षक, डॉक्टर या कोई परिचित व्यक्ति है।
जांच का उद्देश्य दोनों पहलुओं को निष्पक्ष तरीके से देखना होता है।
क्या कहता है POCSO Act?
POCSO Act 2012 में लागू हुआ था। इसका उद्देश्य 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन हमला और यौन शोषण के अन्य रूपों से कानूनी सुरक्षा देना है।
कानून में अलग-अलग प्रकार के अपराधों को अलग श्रेणियों में रखा गया है।
**Section 7** में sexual assault से संबंधित प्रावधान है। इसमें यौन मंशा से बच्चे के कुछ शारीरिक अंगों को छूना या बच्चे से आरोपी अथवा किसी अन्य व्यक्ति को छुआना शामिल हो सकता है। इसके अलावा यौन मंशा से किया गया ऐसा अन्य शारीरिक संपर्क भी इसके दायरे में आ सकता है जिसमें penetration शामिल न हो।
यही कारण है कि 'sexual intent' कई मामलों में निर्णायक सवाल बन जाता है।
यौन मंशा कैसे तय होती है?
यह सबसे जटिल सवालों में से एक है क्योंकि किसी व्यक्ति की मंशा सीधे दिखाई नहीं देती।
अदालतें आम तौर पर पूरे घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों को देखती हैं।
कथित घटना कहां हुई, किस परिस्थिति में हुई, स्पर्श किस तरह का था, आरोपी का व्यवहार क्या था, बच्चे का बयान क्या है और घटना से पहले या बाद में क्या हुआ—ये सभी तथ्य प्रासंगिक हो सकते हैं।
किसी मामले में एक ही प्रकार का शारीरिक संपर्क अलग परिस्थितियों में अलग कानूनी परिणाम दे सकता है।
इसीलिए POCSO के मामलों में तथ्य बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
शिक्षक होने से नहीं मिलती कानूनी छूट
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को यह समझना भी गलत होगा कि शिक्षक को छात्र को अनुचित तरीके से छूने की छूट है।
शिक्षक और छात्र के रिश्ते में भरोसे और जिम्मेदारी का विशेष महत्व होता है।
अगर शिक्षक यौन मंशा से किसी बच्चे को अनुचित तरीके से छूता है और कानून के आवश्यक तत्व पूरे होते हैं तो POCSO के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
कुछ परिस्थितियों में आरोपी की बच्चे पर अधिकार या भरोसे की स्थिति अपराध की गंभीरता के मूल्यांकन में भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसलिए संबंधित मामले में राहत को शिक्षकों के लिए सामान्य छूट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
बच्चे का बयान कितना महत्वपूर्ण?
POCSO से जुड़े मामलों में बच्चे का बयान बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है।
जांच एजेंसी और अदालत को बच्चे की उम्र और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया अपनानी होती है।
कानून का उद्देश्य यह भी है कि शिकायत करने वाले बच्चे को अनावश्यक रूप से परेशान या भयभीत न किया जाए।
लेकिन आपराधिक मुकदमे में अदालत को आरोपी के अधिकारों की भी रक्षा करनी होती है।
इसलिए बच्चे के बयान के साथ मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों को देखकर कानूनी निष्कर्ष निकाला जाता है।
POCSO इतना सख्त क्यों है?
बच्चों के खिलाफ यौन अपराध अक्सर ऐसे लोगों द्वारा किए जा सकते हैं जिन्हें बच्चा पहले से जानता हो। कई बार बच्चा डर, शर्म या दबाव के कारण तुरंत शिकायत नहीं कर पाता।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए POCSO Act में बच्चों के अनुकूल कानूनी प्रक्रिया और विशेष सुरक्षा का प्रावधान किया गया है।
कानून का उद्देश्य बच्चे की गरिमा और सुरक्षा को प्राथमिकता देना है।
साथ ही किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए संबंधित अपराध के कानूनी तत्व साबित होना भी आवश्यक है।
यही संतुलन अदालतों के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती होता है।
फैसले को गलत तरीके से समझना खतरनाक
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात फैसले की सही व्याख्या है।
अगर इसे केवल इतना कहकर प्रचारित किया जाए कि 'सुप्रीम कोर्ट ने कहा कमर छूना POCSO अपराध नहीं' तो इससे गलत संदेश जा सकता है।
अदालत का निष्कर्ष संबंधित मामले के आरोपों और परिस्थितियों पर आधारित होता है।
किसी दूसरे मामले में अगर यौन मंशा के पर्याप्त संकेत मौजूद हों तो इसी तरह का शारीरिक संपर्क POCSO के तहत अपराध बन सकता है।
इसलिए किसी एक फैसले को सभी मामलों पर लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।
स्कूलों की जिम्मेदारी भी बड़ी
कानूनी फैसले से अलग स्कूलों की अपनी सुरक्षा जिम्मेदारी होती है।
स्कूलों को बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना चाहिए। शिक्षकों और कर्मचारियों को स्पष्ट आचार संहिता और child-safeguarding नियमों की जानकारी होनी चाहिए।
अगर कोई छात्र या छात्रा किसी शिक्षक के व्यवहार से असहज महसूस करता है तो शिकायत के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए।
ऐसी शिकायत को गंभीरता से सुनना जरूरी है, लेकिन साथ ही निष्पक्ष जांच भी उतनी ही आवश्यक है।
अभिभावकों को क्या समझना चाहिए?
बच्चों को यह समझाना महत्वपूर्ण है कि अगर किसी व्यक्ति का स्पर्श उन्हें असहज करता है तो वे किसी भरोसेमंद वयस्क को इसकी जानकारी दे सकते हैं।
उन्हें डराने के बजाय शरीर की सीमाओं और सुरक्षा के बारे में उम्र के अनुसार समझाया जाना चाहिए।
अगर बच्चा कोई शिकायत करता है तो पहले उसकी बात शांत तरीके से सुननी चाहिए।
गंभीर आरोप की स्थिति में उचित प्राधिकारी से संपर्क किया जा सकता है। बच्चे पर बार-बार घटना दोहराने का दबाव डालने से बचना भी महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का व्यापक संदेश
इस मामले से निकलने वाला कानूनी संदेश दो हिस्सों में समझना जरूरी है।
पहला, POCSO बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाला कठोर और विशेष कानून है और वास्तविक यौन शोषण के मामलों में इसका प्रभावी इस्तेमाल बेहद जरूरी है।
दूसरा, कानून की किसी धारा के तहत अपराध साबित करने के लिए उस धारा के आवश्यक कानूनी तत्व भी मौजूद होने चाहिए।
केवल शारीरिक संपर्क को संदर्भ से अलग करके हर मामले में समान निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
संबंधित शिक्षक-छात्रा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों और परिस्थितियों को देखते हुए POCSO के तहत अपराध बनने के सवाल पर फैसला दिया। लेकिन इसे किसी भी तरह से बच्चों को अनुचित तरीके से छूने की अनुमति नहीं समझा जा सकता।
**हर मामले में स्पर्श की प्रकृति, परिस्थितियां, उपलब्ध साक्ष्य और यौन मंशा जैसे तत्व महत्वपूर्ण रहेंगे।**
यही कारण है कि इस फैसले की सबसे सटीक व्याख्या यह नहीं है कि 'पीठ या कमर छूना अपराध नहीं', बल्कि यह है कि **POCSO के तहत संबंधित यौन अपराध तय करने के लिए अदालत को कानून में आवश्यक तत्वों और पूरे घटनाक्रम को देखना होगा।**
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