दिल्ली-एनसीआर

बढ़ते प्रदूषण से बच्चों की जान को खतरा, विशेषज्ञ ने दी चेतावनी

Ratna Netam
22 Oct 2026 3:02 PM IST
बढ़ते प्रदूषण से बच्चों की जान को खतरा, विशेषज्ञ ने दी चेतावनी
x
नई दिल्ली। उत्तर भारत में लगातार बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। विशेष रूप से शिशुओं और छोटे बच्चों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक और एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने चेतावनी दी है कि प्रदूषित हवा बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण केवल सांस संबंधी बीमारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर बच्चों के फेफड़ों, मस्तिष्क, हृदय और रक्त वाहिकाओं पर भी पड़ सकता है।
बच्चों के स्वास्थ्य पर मंडरा रहा गंभीर खतरा
समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि उत्तर भारत में प्रदूषण का स्तर बेहद चिंताजनक स्थिति में पहुंच रहा है। यह स्थिति सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए नुकसानदायक है, लेकिन शिशु और बच्चे विशेष रूप से संवेदनशील हैं।उन्होंने कहा, "उत्तर भारत में प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्थिति तक पहुंच रहा है, जो हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। शिशु और बच्चे इसके प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनके फेफड़े, दिमाग, दिल और रक्त वाहिकाएं अभी भी विकसित हो रही होती हैं। वायु प्रदूषण उनके फेफड़ों के विकास को रोक रहा है और उनकी सीखने की क्षमता को भी प्रभावित कर रहा है।"
फेफड़ों के विकास पर पड़ सकता है बुरा असर
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के फेफड़े जन्म के बाद भी कई वर्षों तक विकसित होते रहते हैं। इस दौरान प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और हानिकारक गैसें श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।विशेष रूप से पीएम 2.5 जैसे महीन प्रदूषण कण फेफड़ों के अंदर तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से बच्चों में खांसी, सांस लेने में परेशानी, अस्थमा के लक्षण और फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।जिन बच्चों को पहले से अस्थमा या सांस संबंधी परेशानी है, उनके लिए प्रदूषण का बढ़ना और भी चिंताजनक हो सकता है।
दिमाग और सीखने की क्षमता भी प्रभावित
डॉ. स्वामीनाथन ने बच्चों के मस्तिष्क के विकास पर वायु प्रदूषण के संभावित प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि बचपन में मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है और इस दौरान प्रदूषित वातावरण स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।वैज्ञानिक अध्ययनों में लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क और बच्चों की संज्ञानात्मक क्षमताओं के बीच संबंध पाए गए हैं। इसमें ध्यान केंद्रित करने, याददाश्त और सीखने की प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव शामिल हैं।हालांकि, हर बच्चे पर इसका असर एक जैसा नहीं होता। प्रदूषण का स्तर, संपर्क की अवधि, पोषण और स्वास्थ्य संबंधी अन्य परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
हृदय और रक्त वाहिकाओं पर भी पड़ता है प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता। हवा में मौजूद हानिकारक कण शरीर में सूजन से जुड़ी प्रतिक्रियाओं को बढ़ा सकते हैं और हृदय तथा रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बच्चों के विकसित हो रहे अंग प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से भविष्य में विभिन्न बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।
प्रदूषण से बचाव के लिए जरूरी सावधानियां
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषण अधिक होने पर बच्चों की बाहरी गतिविधियों को सीमित करना चाहिए। अभिभावकों को स्थानीय वायु गुणवत्ता सूचकांक की जानकारी रखनी चाहिए और अत्यधिक प्रदूषण वाले समय में बच्चों को अनावश्यक रूप से बाहर भेजने से बचना चाहिए।घर के अंदर धूम्रपान, अगरबत्ती और अन्य धुआं पैदा करने वाली गतिविधियों को कम करना भी आवश्यक है। बच्चों में लगातार खांसी, सांस फूलने या घरघराहट जैसे लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
डॉ. स्वामीनाथन पहले भी वायु प्रदूषण से निपटने के लिए परिवहन, उद्योग, घरेलू ईंधन और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता बता चुकी हैं। उनका मानना है कि प्रदूषण नियंत्रण केवल किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।उनकी चेतावनी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान वायु गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए स्वच्छ हवा सुनिश्चित करना सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।
Next Story