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शादी से इनकार करना अपराध नहीं सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Ratna Netam
8 Oct 2026 3:14 PM IST
शादी से इनकार करना अपराध नहीं सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के साथ प्रेम संबंध खत्म करना या शादी करने से इनकार करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। यदि रिश्ता टूटने या शादी से इनकार किए जाने के बाद दूसरा व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है, तो केवल इसी आधार पर पूर्व साथी को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप स्थापित करने के लिए आरोपी की मंशा और उसके व्यवहार से संबंधित ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने तेलंगाना से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने महिला की आत्महत्या के मामले में उसके साथी, साथी के माता-पिता, बहन और अन्य लोगों सहित छह आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने पाया कि मामले में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने महिला को आत्महत्या करने के लिए जानबूझकर उकसाया था।मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति किसी परिस्थिति में अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया करता है। प्रेम संबंध टूटने या शादी से इनकार किए जाने से किसी व्यक्ति को भावनात्मक पीड़ा हो सकती है, लेकिन इसके बाद आत्महत्या होने पर हर मामले में दूसरे पक्ष को दोषी नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि आरोपी ने वास्तव में आत्महत्या के लिए उकसाने वाला कोई कार्य किया था या नहीं।अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाने के लिए अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद होने चाहिए। केवल रिश्ता खत्म होना या विवाह का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करना इस अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
तेलंगाना के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
जानकारी के अनुसार, मामला तेलंगाना की एक महिला की आत्महत्या से जुड़ा हुआ है। महिला एक व्यक्ति के साथ सहमति से बने रिश्ते में थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि महिला के साथी ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद महिला और संबंधित पक्षों के बीच विवाद की स्थिति पैदा हुईअभियोजन के अनुसार, आरोपी के घर पर कहासुनी होने के बाद महिला ने कथित तौर पर खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और आत्महत्या कर ली। घटना के बाद महिला के साथी और उसके परिवार के सदस्यों सहित छह लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया।आरोपियों ने अपने खिलाफ दर्ज मामले से राहत पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, दिसंबर 2024 में निचली अदालत ने आरोपमुक्त करने की उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद आरोपियों ने तेलंगाना हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।फरवरी 2026 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने भी आरोपियों की याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट का मानना था कि मामले में विवादित तथ्यों की जांच के लिए मुकदमा चलना आवश्यक है। इसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां उन्हें राहत मिली।
आत्महत्या के लिए उकसाने की मंशा का प्रमाण जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में उपलब्ध सामग्री का अध्ययन करने के बाद कहा कि आरोपियों के खिलाफ ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह स्पष्ट हो कि उनका उद्देश्य महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करना था।पीठ ने कहा कि आरोपों को शिकायतकर्ता के बताए अनुसार सही मान लेने पर भी आत्महत्या के लिए उकसाने का आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होता। अदालत को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह कहा जा सके कि आरोपियों ने जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा की थीं, जिनका उद्देश्य महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करना था।अदालत ने यह भी माना कि मामले में ऐसा कोई आधार नहीं था, जिससे यह साबित हो कि आरोपियों को जानकारी थी कि शादी से इनकार करने के कारण महिला आत्महत्या कर लेगी।शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु और दूसरे व्यक्ति के व्यवहार के बीच संबंध बताना पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए उकसाने, जानबूझकर सहायता करने या अपराध से संबंधित अन्य आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।
रिश्ता खत्म करने को अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी प्रेम संबंधों से जुड़े आपराधिक मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का विवाह करने से इनकार करना या सहमति से चल रहे रिश्ते को समाप्त करने का निर्णय अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता।हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रेम संबंधों के दौरान होने वाली किसी भी प्रकार की धमकी, उत्पीड़न या जानबूझकर आत्महत्या के लिए उकसाने वाले व्यवहार पर कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों और आरोपी के आचरण के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय की जाती है।भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के अंतर्गत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध निर्धारित किया गया था। इस प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने के लिए धारा 107 में वर्णित उकसावे, षड्यंत्र या जानबूझकर सहायता करने जैसे तत्वों का होना जरूरी है।अदालत ने अपने फैसले में इसी कानूनी सिद्धांत को महत्व दिया और कहा कि केवल शादी से इनकार करने के आधार पर किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने छह आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही की रद्द
सभी पक्षों की दलीलों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने छह आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत तथ्यों में आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते।शीर्ष अदालत के इस फैसले से स्पष्ट हुआ है कि किसी दुखद घटना के बाद आपराधिक जिम्मेदारी तय करते समय भावनात्मक परिस्थितियों के साथ कानूनी साक्ष्यों का मूल्यांकन भी जरूरी है।सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ बन सकता है, जिनमें प्रेम संबंध समाप्त होने या विवाह से इनकार किए जाने के बाद आत्महत्या की घटना सामने आती है। अदालत ने अपने फैसले के माध्यम से स्पष्ट किया है कि आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए संबंधित अपराध के आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।
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