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समंदर के बीच राफेल मरीन ने रचा इतिहास, पहली कोशिश में INS विक्रांत पर लैंडिंग
Ratna Netam
30 Oct 2026 7:09 PM IST

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नई दिल्ली। भारतीय नौसेना ने अपनी समुद्री युद्धक क्षमताओं को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। फ्रांस निर्मित अत्याधुनिक राफेल मरीन (Rafale Marine) लड़ाकू विमान ने पहली बार भारत के स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की है। यह परीक्षण 29 अक्टूबर 2026 को अरब सागर में चल रहे समुद्री परीक्षणों के दौरान किया गया। खास बात यह रही कि राफेल मरीन ने पहली ही कोशिश में विमानवाहक पोत पर सुरक्षित लैंडिंग कर ली। इस सफलता को भारतीय नौसेना में राफेल मरीन के परिचालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।भारतीय नौसेना ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस उपलब्धि की जानकारी साझा की। नौसेना ने बताया कि 29 अक्टूबर को राफेल मरीन विमान ने स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर पहले प्रयास में सफलतापूर्वक लैंडिंग की। नौसेना के अनुसार, वर्तमान में जारी परीक्षण भारतीय नौसैनिक बेड़े में इन लड़ाकू विमानों को परिचालन के लिए तैयार करने की दिशा में शुरुआती कदम हैं।इस ऐतिहासिक लैंडिंग का वीडियो भी नौसेना ने जारी किया है। वीडियो में राफेल मरीन विमान को समुद्र के बीच मौजूद विशाल विमानवाहक पोत के उड़ान डेक पर उतरते देखा जा सकता है। विमान ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लैंडिंग पूरी की। विमानवाहक पोत पर लड़ाकू विमान को उतारना एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया होती है, क्योंकि समुद्र में चलते हुए पोत का रनवे जमीन पर बने हवाई अड्डों की तुलना में काफी छोटा होता है।
करीब 45 हजार टन वजनी आईएनएस विक्रांत पर यह परीक्षण भारतीय नौसेना की विमानवाहक पोत आधारित परिचालन क्षमताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राफेल मरीन की सफल लैंडिंग से यह संकेत मिला है कि विमान को विक्रांत की विशेष उड़ान एवं लैंडिंग प्रणाली के अनुरूप संचालित करने की दिशा में प्रगति हुई है। हालांकि, अभी कई आवश्यक परीक्षण पूरे होने बाकी हैं।आईएनएस विक्रांत में शॉर्ट टेक-ऑफ बट अरेस्टेड रिकवरी (STOBAR) प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस व्यवस्था में लड़ाकू विमान पोत के आगे बने स्की-जंप रैंप से उड़ान भरते हैं, जबकि उतरते समय विमान का टेलहुक डेक पर लगी अरेस्टर वायर को पकड़ता है। इससे तेज रफ्तार विमान बहुत कम दूरी में रुक जाता है।
राफेल मरीन मूल रूप से फ्रांस के विमानवाहक पोत चार्ल्स डी गॉल पर संचालन के लिए विकसित किया गया है। फ्रांस का विमानवाहक पोत कैटापल्ट आधारित उड़ान प्रणाली का उपयोग करता है, जबकि भारतीय विमानवाहक पोतों में स्की-जंप प्रणाली है। इसी कारण भारतीय नौसेना के लिए राफेल मरीन की तकनीकी अनुकूलता को परखना जरूरी है।राफेल मरीन के परीक्षणों में विमान की लैंडिंग, उड़ान भरने की क्षमता, डेक पर संचालन और पोत की प्रणालियों के साथ तालमेल की जांच की जा रही है। इसके बाद रात्रिकालीन उड़ान, हथियार प्रणालियों के एकीकरण और अन्य परिचालन प्रक्रियाओं का मूल्यांकन किया जाएगा। इन परीक्षणों के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद ही विमान को नियमित नौसैनिक अभियानों में तैनात करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।
इससे पहले राफेल मरीन विमान का गोवा स्थित आईएनएस हंसा के शोर-बेस्ड टेस्ट फैसिलिटी में भी परीक्षण किया जा चुका है। यहां स्की-जंप टेकऑफ और लैंडिंग से जुड़ी प्रक्रियाओं की जांच की गई थी। इसके बाद अब समुद्र में वास्तविक विमानवाहक पोत पर परीक्षण किया जा रहा है।भारत ने 28 अप्रैल 2025 को फ्रांस के साथ लगभग 63 हजार करोड़ रुपये के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के अंतर्गत भारतीय नौसेना के लिए कुल 26 राफेल मरीन विमान खरीदे जाने हैं। इनमें 22 सिंगल-सीट लड़ाकू विमान और चार ट्विन-सीट प्रशिक्षण विमान शामिल हैं। समझौते में हथियार, प्रशिक्षण उपकरण, सिमुलेटर, तकनीकी सहायता और लॉजिस्टिक सुविधाएं भी शामिल हैं।
राफेल मरीन विमान आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और अत्याधुनिक हथियारों से लैस किए जा सकते हैं। इनका उपयोग दुश्मन के लड़ाकू विमानों को रोकने, समुद्री लक्ष्यों पर हमला करने, हवाई सुरक्षा प्रदान करने और नौसैनिक अभियानों में सहायता के लिए किया जा सकता है।भारतीय नौसेना वर्तमान में अपने विमानवाहक पोतों से मिग-29के लड़ाकू विमानों का संचालन करती है। भविष्य में राफेल मरीन के शामिल होने से नौसेना के पास आधुनिक लड़ाकू विमानों का एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध होगा। इससे समुद्री क्षेत्रों में हवाई निगरानी और रक्षा अभियानों को मजबूती मिलने की संभावना है।
आईएनएस विक्रांत भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत है। इसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया था और सितंबर 2022 में इसे भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। लगभग 262 मीटर लंबे इस पोत को भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती समुद्री गतिविधियों और रणनीतिक चुनौतियों के बीच भारतीय नौसेना अपने विमानवाहक पोत आधारित बेड़े को आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रही है। राफेल मरीन जैसे लड़ाकू विमान भविष्य में समुद्री निगरानी, वायु रक्षा और लंबी दूरी के अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।फिलहाल 29 अक्टूबर को हुई सफल लैंडिंग भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि है। हालांकि, इस परीक्षण का मतलब यह नहीं है कि राफेल मरीन को पूरी तरह परिचालन की मंजूरी मिल गई है। इसके लिए अन्य परीक्षणों, प्रशिक्षण और तकनीकी प्रक्रियाओं का पूरा होना जरूरी है।आने वाले समय में राफेल मरीन और आईएनएस विक्रांत के बीच संचालन संबंधी अनुकूलता के परीक्षण जारी रहेंगे। इनके सफल होने पर भारतीय नौसेना की विमानवाहक पोत आधारित हवाई क्षमता को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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