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मुख्य चुनाव आयुक्त की कानूनी सुरक्षा पर सवाल

Ratna Netam
14 Oct 2026 4:03 PM IST
मुख्य चुनाव आयुक्त की कानूनी सुरक्षा पर सवाल
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नई दिल्ली। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव एम.ए. बेबी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को दी गई कानूनी सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने बुधवार को कहा कि चुनाव अधिकारियों को कानून के तहत ऐसी विशेष सुरक्षा प्रदान की गई है, जो उनके अनुसार भारत के राष्ट्रपति को भी हासिल नहीं है। बेबी ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से चुनाव संबंधी कानून में तत्काल संशोधन करने की मांग की। उन्होंने इसे असाधारण स्थिति बताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस प्रकार की कानूनी सुरक्षा की समीक्षा होनी चाहिए।
बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली स्थित हरकिशन सिंह सुरजीत भवन के बाहर पत्रकारों से बातचीत करते हुए एम.ए. बेबी ने चुनाव आयोग से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को दी गई सुरक्षा का दायरा बेहद व्यापक है। उनके मुताबिक, इस व्यवस्था में बदलाव करने के लिए सरकार पर दबाव बनाना आवश्यक है।
एम.ए. बेबी ने कहा कि देश में राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को भी कानूनी संरक्षण एक निश्चित संवैधानिक व्यवस्था के तहत मिलता है। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयुक्तों को दी गई कानूनी सुरक्षा उससे भी आगे जाती है। इसी आधार पर उन्होंने मौजूदा कानूनी प्रावधानों को बदलने की मांग की।
सीपीआई(एम) महासचिव ने कहा कि सरकार को चुनाव कानून में संशोधन करने के लिए मजबूर करना होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को अत्यधिक कानूनी संरक्षण प्रदान करती है। बेबी ने इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न बताया।
दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों तथा कार्यकाल से संबंधित अधिनियम, 2023 में अधिकारियों की कानूनी सुरक्षा को लेकर विशेष प्रावधान किया गया है। इस कानून की धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी अन्य चुनाव आयुक्त के आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों, कही गई बातों या लिए गए निर्णयों के संबंध में दीवानी अथवा आपराधिक कार्यवाही से संरक्षण दिया गया है।
इस प्रावधान की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि संरक्षण केवल पद पर रहने की अवधि तक सीमित नहीं है। कानून के अनुसार, आधिकारिक कर्तव्यों से संबंधित कार्यों के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और पूर्व चुनाव आयुक्तों को भी यह सुरक्षा मिलती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि उनके प्रत्येक निजी कार्य या पद से असंबंधित गतिविधि को कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
एम.ए. बेबी ने इसी प्रावधान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कानून में तत्काल बदलाव किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के अधिकारियों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मौजूदा कानूनी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और सरकार को इनका समाधान करना चाहिए।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों को भी विशेष कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इस अनुच्छेद के अनुसार, पद पर रहते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं की जा सकती। हालांकि, चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा और राष्ट्रपति को मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए दोनों व्यवस्थाओं की तुलना करते समय उनके कानूनी दायरे को समझना आवश्यक है।
एम.ए. बेबी का बयान ऐसे समय सामने आया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी राजनीतिक विवाद बना हुआ है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाताओं के नाम हटाए जाने से संबंधित मुद्दों को उठाते रहे हैं।
हाल के दिनों में दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए हैं। विभिन्न विपक्षी दलों और संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई है। वहीं चुनाव आयोग मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को अपने संवैधानिक दायित्वों का हिस्सा बताता रहा है।
इस राजनीतिक माहौल के बीच एम.ए. बेबी ने चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा का मुद्दा उठाकर चुनाव संबंधी कानून में संशोधन की मांग की है। उनका कहना है कि चुनाव अधिकारियों को दी गई विशेष सुरक्षा की समीक्षा की जानी चाहिए।
फिलहाल एम.ए. बेबी की इस मांग पर केंद्र सरकार की किसी नई आधिकारिक प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं हुई है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि सरकार चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा से संबंधित प्रावधानों में संशोधन करने पर विचार कर रही है या नहीं।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और संवैधानिक जवाबदेही के बीच संतुलन का सवाल इस बहस का प्रमुख विषय है। एक ओर कानून चुनाव अधिकारियों को आधिकारिक कार्यों के लिए कानूनी संरक्षण प्रदान करता है, वहीं एम.ए. बेबी ने इस संरक्षण के दायरे पर आपत्ति जताते हुए बदलाव की मांग की है।
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