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केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने पर उठे सवाल, हाईकोर्ट में चुनौती
Ratna Netam
30 Oct 2026 3:20 PM IST

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नई दिल्ली : 30 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की तैनाती की अवधि बार-बार बढ़ाए जाने का मामला अब कानूनी चर्चा का विषय बन गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, सेवानिवृत्त सिविल सेवक आशीष जोशी ने इस फैसले को चुनौती देने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया है। उन्होंने राजधानी में बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की लगातार तैनाती पर सवाल उठाया है। इस मामले में सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत, प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, जोशी की याचिका के विस्तृत आधार और अदालत में उसकी वर्तमान स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।
दिल्ली में अक्टूबर की शुरुआत से विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए केंद्रीय सुरक्षा बलों की अतिरिक्त कंपनियां तैनात की गई थीं। शुरुआत में इनकी तैनाती सीमित अवधि के लिए की गई थी, लेकिन कानून-व्यवस्था से जुड़ी आशंकाओं का हवाला देते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसकी अवधि कई बार बढ़ाई है।
ताजा जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार ने दिल्ली में CAPF की 270 कंपनियों की तैनाती 16 नवंबर 2026 तक बढ़ाने का फैसला किया है। यह अक्टूबर के दौरान तैनाती की अवधि बढ़ाने का तीसरा निर्णय है। अधिकारियों ने बताया कि 1 नवंबर को रामलीला मैदान में प्रस्तावित INDIA गठबंधन की रैली, अचानक विरोध प्रदर्शनों की आशंका और त्योहारों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है।
दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इन कंपनियों की तैनाती जारी रखने की मंजूरी दी है। सुरक्षा बलों को राजधानी के संवेदनशील इलाकों में आवश्यकतानुसार तैनात करने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस को सौंपी गई है। मंत्रालय ने संबंधित बलों और पुलिस अधिकारियों को आपसी समन्वय बनाए रखने के निर्देश भी दिए हैं।
अधिकारिक सूत्रों के अनुसार, वर्तमान में तैनात 270 कंपनियों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 125 कंपनियां शामिल हैं। इसके अलावा त्वरित कार्रवाई बल (RAF) की 20, सीमा सुरक्षा बल (BSF) की 46, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) की 39, सशस्त्र सीमा बल (SSB) की 31 और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की 12 कंपनियां तैनात हैं। इन बलों का उद्देश्य दिल्ली पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संवेदनशील स्थानों की सुरक्षा में सहयोग देना है।
इससे पहले 23 अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 273 कंपनियों की तैनाती 31 अक्टूबर तक बढ़ाई थी। उस समय अधिकारियों ने विभिन्न राजनीतिक समूहों द्वारा अचानक प्रदर्शन किए जाने की आशंका को फैसले का प्रमुख कारण बताया था। अक्टूबर के मध्य में भी इसी आधार पर अतिरिक्त बलों की तैनाती बढ़ाई गई थी। लगातार हो रहे इन विस्तारों ने राजधानी में केंद्रीय सुरक्षा बलों की जरूरत और तैनाती की अवधि को लेकर चर्चा बढ़ा दी है।
दिल्ली में केंद्रीय बलों की व्यापक तैनाती ऐसे समय में की गई है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विरोध प्रदर्शन सामने आए हैं। कुछ संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए विरोध जताया था। इसके बाद विपक्षी राजनीतिक दलों ने भी चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन आयोजित किए।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि बड़े राजनीतिक आयोजनों और अचानक होने वाले विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था की चुनौती बढ़ सकती है। संसद भवन, निर्वाचन आयोग के कार्यालय, महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त बल उपलब्ध रहना जरूरी है।
दूसरी ओर, केंद्रीय सुरक्षा बलों की लंबे समय तक तैनाती को लेकर प्रशासनिक और संवैधानिक सवाल भी उठ सकते हैं। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। हालांकि, सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए विधिसम्मत प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।
ऐसे मामलों में अदालत के सामने यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकता है कि सुरक्षा संबंधी निर्णय उचित आधार पर लिए गए हैं या नहीं। इसके साथ ही यह भी देखा जा सकता है कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए उठाए गए कदम आवश्यक, आनुपातिक और कानून के अनुरूप हैं या नहीं। हालांकि, आशीष जोशी की कथित याचिका में वास्तव में कौन-कौन से कानूनी आधार प्रस्तुत किए गए हैं, यह याचिका की प्रति उपलब्ध होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
सेवानिवृत्त सिविल सेवक आशीष जोशी इससे पहले भी कानूनी प्रक्रिया से जुड़े मामले में चर्चा में रह चुके हैं। सितंबर 2026 में उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी की प्रति प्राप्त करने के लिए अदालत का रुख किया था। रिपोर्टों के अनुसार, सोशल मीडिया पोस्ट से संबंधित मामले में उनसे लगभग नौ घंटे पूछताछ की गई थी। उनके वकील ने कहा था कि बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद प्राथमिकी की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
राजधानी में बड़ी संख्या में केंद्रीय बलों को तैनात करने का असर अन्य राज्यों में उनकी उपलब्धता से भी जुड़ सकता है। अक्टूबर की शुरुआत में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था के लिए जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ सहित विभिन्न स्थानों पर तैनात सीआरपीएफ की कुछ कंपनियों को बुलाया गया था। इनमें नक्सल विरोधी अभियानों से जुड़े क्षेत्रों की इकाइयां भी शामिल थीं। ऐसे में सुरक्षा संसाधनों के आवंटन और विभिन्न क्षेत्रों की जरूरतों के बीच संतुलन भी महत्वपूर्ण विषय है
फिलहाल केंद्र सरकार का पक्ष है कि राजधानी की सुरक्षा स्थिति और संभावित विरोध प्रदर्शनों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त बलों की तैनाती जारी रखना आवश्यक है। दूसरी ओर, इस तरह के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा होने की स्थिति में अदालत प्रशासनिक अधिकारों और संवैधानिक सीमाओं से संबंधित पहलुओं पर विचार कर सकती है।
अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि दिल्ली उच्च न्यायालय में कथित याचिका की सुनवाई कब होती है और अदालत केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा दिल्ली पुलिस से क्या जानकारी मांगती है। अदालत के किसी आदेश या टिप्पणी के बारे में अभी कोई पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।
दिल्ली में CAPF की तैनाती फिलहाल 16 नवंबर तक जारी रखने का निर्णय लिया गया है। आने वाले दिनों में सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के आधार पर इस व्यवस्था में बदलाव संभव है। इस बीच आशीष जोशी के अदालत जाने की सूचना ने केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को चर्चा में ला दिया है।
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