- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- डॉक्टर की पर्ची वाली...
दिल्ली-एनसीआर
डॉक्टर की पर्ची वाली दवाओं के विज्ञापन पर सख्ती की तैयारी
Ratna Netam
9 Oct 2026 2:12 PM IST

x
नई दिल्ली। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने डॉक्टर की सलाह और पर्ची पर मिलने वाली दवाओं के विज्ञापनों को लेकर नियमों को और सख्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मंत्रालय ने 'ड्रग्स रूल्स, 1945' में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य ऐसी दवाओं के विज्ञापनों पर नियामकीय निगरानी को मजबूत करना है, जिनकी बिक्री डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर की जाती है। प्रस्तावित संशोधन के तहत शेड्यूल H, शेड्यूल H1 और शेड्यूल X में शामिल दवाओं के विज्ञापन के लिए केंद्र सरकार से पूर्व अनुमति लेने की मौजूदा व्यवस्था का दायरा बढ़ाने की तैयारी है।स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से यह मसौदा ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) से विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया है। प्रस्तावित संशोधन को 28 सितंबर 2026 की तारीख वाले गजट नोटिफिकेशन GSR 861(E) के माध्यम से अधिसूचित किया गया है। इसके जरिए दवाओं की बिक्री और वितरण का लाइसेंस रखने वाली संस्थाओं को भी विज्ञापन संबंधी पूर्व अनुमति की व्यवस्था के दायरे में लाने का प्रस्ताव है।
दवाओं के विज्ञापन पर बढ़ेगी निगरानी
केंद्र सरकार का यह प्रस्ताव उन दवाओं से संबंधित है, जिन्हें सामान्य तौर पर बिना चिकित्सकीय सलाह के इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। शेड्यूल H, H1 और X के अंतर्गत आने वाली दवाओं के लिए पहले से विशेष नियामकीय प्रावधान मौजूद हैं। अब विज्ञापन से संबंधित अनुमति व्यवस्था का दायरा बढ़ाने की पहल की गई है।प्रस्तावित संशोधन का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दवाओं की बिक्री और वितरण का लाइसेंस रखने वाली संस्थाओं को भी केंद्र सरकार से पहले मंजूरी लेने की व्यवस्था में शामिल किया जाएगा। इससे विज्ञापन संबंधी नियम केवल सीमित श्रेणी की संस्थाओं तक नहीं रहेंगे, बल्कि प्रस्ताव में निर्दिष्ट लाइसेंसधारक संस्थाओं पर भी लागू हो सकेंगे।हालांकि, यह फिलहाल प्रस्तावित संशोधन है। इसे अंतिम रूप दिए जाने के बाद ही संशोधित प्रावधानों की वास्तविक कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।
शेड्यूल H, H1 और X की दवाएं क्यों हैं महत्वपूर्ण?
भारत में दवाओं को उनके उपयोग, जोखिम और नियामकीय आवश्यकताओं के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में रखा गया है। शेड्यूल H में ऐसी दवाएं शामिल होती हैं, जिन्हें डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर बेचा जाता है। इनमें कई प्रकार की ऐसी दवाएं आती हैं, जिनका इस्तेमाल चिकित्सकीय निगरानी में किया जाना जरूरी होता है।शेड्यूल H1 में शामिल दवाओं के लिए अतिरिक्त निगरानी और रिकॉर्ड रखने से संबंधित प्रावधान हैं। इस श्रेणी का उद्देश्य विशेष रूप से कुछ दवाओं की बिक्री और उपयोग पर अधिक नियंत्रण सुनिश्चित करना है।वहीं, शेड्यूल X के अंतर्गत आने वाली दवाओं के लिए अपेक्षाकृत अधिक कठोर नियंत्रण और रिकॉर्ड संबंधी आवश्यकताएं लागू होती हैं। इन श्रेणियों की दवाओं के इस्तेमाल में चिकित्सकीय सलाह और निर्धारित नियमों का पालन महत्वपूर्ण माना जाता है।ऐसे में इन दवाओं के विज्ञापन से संबंधित व्यवस्था को मजबूत करने का प्रस्ताव दवा नियमन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
लाइसेंसधारक संस्थाएं भी आएंगी दायरे में
प्रस्तावित संशोधन में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव दवाओं की बिक्री और वितरण से जुड़ी लाइसेंसधारक संस्थाओं को लेकर है। वर्तमान पूर्व अनुमति व्यवस्था का विस्तार इन संस्थाओं तक करने का प्रस्ताव रखा गया है।इसका अर्थ है कि संशोधन लागू होने पर संबंधित लाइसेंसधारक संस्थाओं को निर्दिष्ट श्रेणी की दवाओं के विज्ञापन के मामले में केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी से जुड़े नियमों का पालन करना होगा।यह बदलाव दवा कारोबार से जुड़ी संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। विज्ञापन जारी करने से पहले आवश्यक अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया को उनके नियामकीय अनुपालन का हिस्सा बनाया जा सकता है।हालांकि, प्रस्ताव में अनुमति प्राप्त करने की विस्तृत प्रक्रिया, आवेदन की शर्तों और संभावित प्रशासनिक आवश्यकताओं के बारे में उपलब्ध जानकारी सीमित है। इसलिए इन पहलुओं पर अंतिम नियमों के आधार पर ही स्पष्ट स्थिति सामने आएगी।
DTAB से विचार-विमर्श के बाद तैयार हुआ मसौदा
स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रस्तावित संशोधन तैयार करने से पहले ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड से सलाह-मशविरा किया है। DTAB देश में दवाओं से संबंधित तकनीकी और नियामकीय मामलों पर सलाह देने वाली महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था है।दवाओं के निर्माण, बिक्री, वितरण और नियमन से जुड़े विभिन्न तकनीकी विषयों में इस बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। प्रस्तावित संशोधन से पहले बोर्ड से परामर्श किया जाना इस नियामकीय प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।मंत्रालय ने 28 सितंबर 2026 को जारी गजट नोटिफिकेशन GSR 861(E) के माध्यम से मसौदे को अधिसूचित किया है। यह अधिसूचना प्रस्तावित बदलाव की औपचारिक प्रक्रिया से संबंधित है।
मरीजों और आम लोगों के लिए क्या मायने?
डॉक्टर की पर्ची पर मिलने वाली दवाओं के विज्ञापनों का विषय सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। दवाओं का उपयोग उनकी चिकित्सकीय आवश्यकता, निर्धारित मात्रा और संभावित दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।किसी दवा का प्रचार देखकर बिना डॉक्टर की सलाह के उसका इस्तेमाल करना स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। विशेष रूप से प्रिस्क्रिप्शन दवाओं के मामले में चिकित्सकीय निगरानी महत्वपूर्ण होती है।विज्ञापन संबंधी पूर्व अनुमति की व्यवस्था का दायरा बढ़ाने से संबंधित संस्थाओं के प्रचार पर नियामकीय नियंत्रण मजबूत हो सकता है। हालांकि, प्रस्तावित संशोधन का वास्तविक प्रभाव अंतिम नियमों और उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।इस प्रस्ताव को सभी दवाओं के विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह विशेष रूप से शेड्यूल H, H1 और X की दवाओं के विज्ञापन के लिए पूर्व मंजूरी संबंधी व्यवस्था के विस्तार से जुड़ा है।
अंतिम नियमों पर रहेगी नजर
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का यह कदम प्रिस्क्रिप्शन दवाओं के विज्ञापन संबंधी नियमन में संभावित बदलाव का संकेत देता है। प्रस्तावित संशोधन में लाइसेंसधारक बिक्री और वितरण संस्थाओं को शामिल करने की बात कही गई है।अब महत्वपूर्ण बात यह होगी कि मसौदे को अंतिम रूप देते समय किन प्रावधानों को लागू किया जाता है और संबंधित संस्थाओं के लिए अनुमति की प्रक्रिया किस प्रकार निर्धारित की जाती है।फिलहाल 28 सितंबर 2026 की अधिसूचना के जरिए प्रस्तावित संशोधन सामने आया है। अंतिम नियम लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दवा कारोबार से जुड़ी संस्थाओं के विज्ञापन संबंधी दायित्वों में किस प्रकार का बदलाव आएगा।
Next Story





