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POCSO संशोधन 2019 पुराने अपराधों पर लागू नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 20 का हवाला दिया

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति को अपराध किए जाने के समय लागू कानून के आधार पर ही दोषी ठहराया जा सकता है और सजा दी जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में किए गए कानूनी संशोधन के जरिए सजा बढ़ाकर उसे पुराने अपराधों पर लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत हर व्यक्ति को यह मौलिक अधिकार प्राप्त है कि उसे ऐसे कानून के आधार पर सजा न दी जाए, जो अपराध किए जाने के समय अस्तित्व में नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो यानी यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) में 2019 में किए गए संशोधन को लेकर यह टिप्पणी की। अदालत ने माना कि 2019 में किए गए उस संशोधन को 2016 में हुए अपराध पर लागू नहीं किया जा सकता, जिसके तहत न्यूनतम सजा की अवधि बढ़ाई गई थी।
पीठ ने कहा कि यदि किसी अपराध के समय कानून में एक निश्चित सजा का प्रावधान था, तो बाद में कानून में बदलाव कर बढ़ाई गई सजा को पुराने मामले में लागू करना संविधान के अनुच्छेद 20(1) के खिलाफ होगा।
संविधान का अनुच्छेद 20(1) किसी व्यक्ति को ऐसे आपराधिक कानून के तहत सजा दिए जाने से सुरक्षा देता है, जो अपराध किए जाने के बाद बनाया गया हो। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को बाद में बनाए गए कठोर कानून के आधार पर दंडित न किया जाए।
मामला POCSO एक्ट से जुड़ा था, जिसमें आरोपी पर वर्ष 2016 में अपराध करने का आरोप था। बाद में 2019 में POCSO कानून में संशोधन किया गया, जिसमें कुछ अपराधों के लिए न्यूनतम सजा बढ़ाई गई। निचली अदालत ने संशोधित प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए सजा तय की थी, जिसे चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून में बदलाव का उद्देश्य अपराधों पर सख्ती करना हो सकता है, लेकिन नए और कठोर प्रावधानों को पुराने अपराधों पर लागू नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान द्वारा दिए गए संरक्षण का उल्लंघन होगा।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है। किसी व्यक्ति को उस समय मौजूद कानूनी व्यवस्था के आधार पर ही जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, जब कथित अपराध हुआ था।
POCSO एक्ट में 2019 का संशोधन बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर सजा को और कठोर बनाने के उद्देश्य से किया गया था। इसके तहत कुछ गंभीर अपराधों में न्यूनतम सजा बढ़ाई गई थी और कानून को अधिक प्रभावी बनाने के प्रयास किए गए थे।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराधों पर नियंत्रण के लिए बनाए गए नए कानूनों का इस्तेमाल भविष्य के मामलों पर किया जा सकता है, लेकिन पुराने मामलों में नए दंडात्मक प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराता है। अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि आपराधिक कानूनों में किए गए ऐसे बदलाव, जिनसे सजा बढ़ती है, उन्हें पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।
इस फैसले का असर उन मामलों पर भी पड़ सकता है, जहां अपराध पुराने कानून के तहत दर्ज हुए हैं लेकिन सुनवाई के दौरान कानून में बदलाव हो चुका है। अदालतों को ऐसे मामलों में अपराध की तारीख पर लागू कानून को ही आधार बनाना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों और कानून के शासन के सिद्धांत को मजबूत करता है। अदालत ने कहा कि न्याय प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार न हो, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ हो।
फैसले के बाद कानूनी क्षेत्र में इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि भविष्य में आपराधिक कानूनों में होने वाले संशोधनों को लागू करते समय अदालतें किस तरह पुराने और नए मामलों में अंतर करेंगी।





