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PM मोदी का आह्वान महासागर बनें शांति और समृद्धि का माध्यम

Ratna Netam
7 Oct 2026 9:39 PM IST
PM मोदी का आह्वान महासागर बनें शांति और समृद्धि का माध्यम
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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित ‘सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग’ के तीसरे संस्करण के लिए अपने संदेश में स्वतंत्र, खुली, सुरक्षित और नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य सभी देशों के लिए शांति, समृद्धि और प्रगति के अवसर बढ़ाना होना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया कि सागरमंथन जैसे वैश्विक मंच इस व्यापक दृष्टिकोण को और मजबूत करेंगे।‘सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग’ का तीसरा संस्करण 7 से 9 अक्टूबर 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। इसका आयोजन केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की साझेदारी में किया गया है। सम्मेलन में सरकारों, उद्योग जगत, शिक्षाविदों, वित्तीय संस्थानों, बहुपक्षीय संगठनों और समुद्री क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों की भागीदारी हो रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे नीति-निर्माताओं, समुद्री क्षेत्र के नेताओं और विशेषज्ञों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया पहले से अधिक एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। किसी एक क्षेत्र में होने वाला घटनाक्रम समुद्री व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों के जरिए दूर-दराज के देशों को भी प्रभावित कर सकता है।प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारा विज़न एक ऐसी आज़ाद, खुली, सुरक्षित और नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था का है जो सभी के लिए ज़्यादा शांति, समृद्धि और प्रगति लाए। मुझे भरोसा है कि सागरमंथन इस बड़े विज़न को और मज़बूती देगा।”
मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि महासागर केवल व्यापार के मार्ग नहीं हैं, बल्कि वे देशों, समाजों, अर्थव्यवस्थाओं और संस्कृतियों को आपस में जोड़ते हैं। समुद्री क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा का सीधा संबंध वैश्विक आर्थिक विकास और लोगों की आजीविका से है। ऐसे में समुद्री मामलों पर संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भूमिका लगातार बढ़ रही है।सागरमंथन 2026 में समुद्री व्यापार और कनेक्टिविटी से लेकर हरित जहाज निर्माण, समुद्री समुदायों और बंदरगाह आधारित विकास जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है। सम्मेलन के पांच प्रमुख विषयों में चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बीच समुद्री प्रवाह को सुरक्षित रखना, जहाजों और जहाज निर्माण को पर्यावरण अनुकूल बनाना, व्यापार और कनेक्टिविटी का प्रबंधन, समुद्री समुदायों की भूमिका तथा बंदरगाह शहरों को अंदरूनी क्षेत्रों से जोड़ना शामिल है।
प्रधानमंत्री का संदेश भारत की उस व्यापक समुद्री नीति के अनुरूप है जिसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र नौवहन, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान और नियमों पर आधारित व्यवस्था को प्रमुखता दी जाती रही है। भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दोहराता रहा है कि समुद्री क्षेत्रों में विवादों का समाधान बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार होना चाहिए।प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले भी सागरमंथन मंच को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए महत्वपूर्ण बता चुके हैं। वर्ष 2024 में आयोजित इसके पहले संस्करण के अवसर पर उन्होंने कहा था कि स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित समुद्री नेटवर्क दुनिया भर के देशों के लिए महत्वपूर्ण है और ऐसे संवाद नियमों पर आधारित विश्व व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दे सकते हैं।
तीसरे संस्करण में भी इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए समुद्री क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा की जा रही है। मौजूदा समय में प्रमुख समुद्री मार्गों में भू-राजनीतिक तनाव, सुरक्षा खतरे, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संबंधी चुनौतियां अंतरराष्ट्रीय चिंता के बड़े विषय बने हुए हैं।प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में देशों के बीच संवाद और साझेदारी और महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका कहना है कि दुनिया के एक हिस्से में होने वाले घटनाक्रम का प्रभाव दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकता है। इसी कारण समुद्री क्षेत्र में किसी भी समस्या को केवल एक देश तक सीमित समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता।
भारत अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण हिंद महासागर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। देश का बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार पर निर्भर है और ऊर्जा, वस्तुओं तथा कच्चे माल की आवाजाही में समुद्री मार्गों का अहम योगदान है। यही वजह है कि भारत समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ निर्बाध वाणिज्यिक आवाजाही और अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के पालन पर जोर देता रहा है।सागरमंथन सम्मेलन का उद्देश्य केवल सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना नहीं, बल्कि समुद्री अर्थव्यवस्था के नए अवसरों को भी सामने लाना है। इसमें ब्लू इकोनॉमी, नई तकनीक, टिकाऊ जहाज निर्माण, बंदरगाह विकास, लॉजिस्टिक्स और समुद्री समुदायों की आजीविका से जुड़े विषयों को शामिल किया गया है। आयोजकों के मुताबिक यह मंच टिकाऊ और समावेशी समुद्री भविष्य के लिए वैश्विक भागीदारी बढ़ाने पर केंद्रित है।
भारत ने हाल के वर्षों में समुद्री क्षेत्र में आधारभूत ढांचे और जहाज निर्माण को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। साथ ही सरकार समुद्री अर्थव्यवस्था, बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स और ऑफशोर संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। इसी दिशा में जुलाई 2026 में केंद्र ने ‘समुद्र मंथन’ राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को भी मंजूरी दी थी, हालांकि यह सागरमंथन संवाद से अलग सरकारी योजना है।प्रधानमंत्री के संदेश में समुद्री व्यवस्था को सभी देशों के साझा हित से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और सुरक्षित समुद्री क्षेत्र से केवल बड़े देशों या समुद्री शक्तियों को ही लाभ नहीं होता, बल्कि छोटे और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतों और व्यापार पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
सागरमंथन के तीसरे संस्करण में होने वाली चर्चाओं से समुद्री सहयोग के नए क्षेत्रों, साझेदारियों और नीतिगत विकल्पों पर विचार सामने आने की उम्मीद है। ढाई दिनों तक चलने वाले सम्मेलन में उच्च स्तरीय सत्र, मंत्रिस्तरीय बातचीत, रणनीतिक गोलमेज बैठकें और तकनीकी चर्चाएं आयोजित की जा रही हैं।प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश के अंत में विश्वास जताया कि सागरमंथन वैश्विक समुद्री व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, समावेशी और सहयोग आधारित बनाने की दिशा में उपयोगी भूमिका निभाएगा। उनका जोर इस बात पर रहा कि महासागरों को संघर्ष के बजाय सहयोग और साझा समृद्धि का माध्यम बनाया जाए तथा नियमों पर आधारित व्यवस्था के जरिए सभी देशों की शांति और प्रगति सुनिश्चित की जाए।
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