- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- सुप्रीम कोर्ट में...
दिल्ली-एनसीआर
सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की मांग वाली याचिका खारिज
Ratna Netam
25 Sept 2026 4:52 PM IST

x
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें शीर्ष अदालत की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी के इस्तेमाल की संभावनाओं पर विचार करने और सिफारिश देने के लिए केंद्र सरकार को एक आयोग गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही में भाषा से जुड़े इस तरह के बदलाव कोर्ट के आदेश के जरिए नहीं किए जा सकते, बल्कि इन्हें संस्थागत सुधारों के तहत धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना होगा।भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट की 25 सितंबर की आधिकारिक सूची भी इस पीठ की संरचना की पुष्टि करती है। याचिका ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रा की ओर से दायर की गई थी। इसमें केंद्र सरकार को एक आयोग गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जो सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करने के मुद्दे पर विचार कर अपनी सिफारिश दे।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के बदलाव अदालत के आदेशों से नहीं होते। उन्होंने कहा कि भाषा संबंधी सुधार धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से किए जाते हैं तथा सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर इस दिशा में पहले से प्रयास किए जा रहे हैं। अदालत ने संकेत दिया कि भाषा को लेकर बदलाव प्रशासनिक और संस्थागत प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाए जाने चाहिए।याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत से कम से कम एक आयोग गठित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया। इस पर न्यायमूर्ति वी. मोहना ने सवाल किया कि जिस विषय में संवैधानिक बदलाव की जरूरत पड़ सकती है, उसे अदालत अपने आदेश के माध्यम से कैसे लागू कर सकती है। याचिकाकर्ता के वकील ने इसके बाद भी आयोग बनाने के निर्देश की मांग दोहराई, लेकिन पीठ ने जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए इसे खारिज कर दिया।
इस मामले में संविधान का अनुच्छेद 348 भी महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद 348(1)(a) के मुताबिक, जब तक संसद कानून के जरिए अन्य व्यवस्था नहीं करती, सुप्रीम कोर्ट और प्रत्येक हाई कोर्ट की सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी। इसी संवैधानिक व्यवस्था के कारण सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही की भाषा बदलने का विषय केवल न्यायिक आदेश तक सीमित नहीं है।हालांकि संविधान के अनुच्छेद 348(2) में हाई कोर्ट के लिए अलग व्यवस्था मौजूद है। इसके तहत किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस राज्य के हाई कोर्ट की कार्यवाही में हिंदी या राज्य के आधिकारिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने वाली किसी अन्य भाषा के उपयोग को अधिकृत कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के लिए इसी तरह का अपवाद अनुच्छेद 348(2) में नहीं दिया गया है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को अपनी जन सूचना व्यवस्था में धीरे-धीरे शामिल करने की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने महत्वपूर्ण सामग्री का संक्षिप्त विवरण हिंदी में उपलब्ध कराने और आगे दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को भी शामिल करने की बात कही। अदालत ने इस प्रक्रिया में अन्य भारतीय भाषाओं और उनकी सांस्कृतिक पहचान के सम्मान पर भी जोर दिया।सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस दिशा में एक और कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने 14 सितंबर 2026 को हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी जन सूचना सेवा शुरू करने की घोषणा की थी। इसके तहत महत्वपूर्ण फैसलों के सरल हिंदी सार के साथ दैनिक ऑडियो और वीडियो बुलेटिन उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में इस पहल की जानकारी दी गई है।
यह पहल अदालत की कार्यवाही की आधिकारिक भाषा बदलने से अलग है। इसका उद्देश्य न्यायपालिका से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी को हिंदी भाषी लोगों तक अधिक आसानी से पहुंचाना है। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट का हिंदी संस्करण भी उपलब्ध है, जहां फैसलों और न्यायालय से संबंधित अन्य सूचनाओं तक पहुंच प्रदान की जा रही है।शुक्रवार की सुनवाई में पीठ का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि भाषाई बदलाव न्यायिक आदेश के जरिए अचानक लागू करने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा होने चाहिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भारतीय भाषाओं को न्यायिक सूचना व्यवस्था में स्थान देने की दिशा में काम पहले से चल रहा है।याचिका खारिज होने के साथ फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की संभावनाओं पर विचार करने के लिए केंद्र को आयोग गठित करने का कोई न्यायिक निर्देश नहीं दिया गया है। अदालत की टिप्पणी से यह जरूर स्पष्ट हुआ कि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर चरणबद्ध प्रयास जारी हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक कार्यवाही की भाषा में व्यापक बदलाव के लिए मौजूदा संवैधानिक और विधायी ढांचे के अनुरूप प्रक्रिया अपनानी होगी।
Next Story





