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Newsweek Report: वॉन्टेड अपराधी असाइलम और स्टूडेंट वीजा से विदेशों में चला रहे नेटवर्क

New Delhi , नई दिल्ली : न्यूज़वीक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हत्या, जबरन वसूली, नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकी गतिविधियों जैसे आरोपों में वांछित कई गैंगस्टर और संगठित अपराध से जुड़े लोग कथित तौर पर अमेरिका और कनाडा से अपने आपराधिक नेटवर्क चला रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे गैंग और अन्य संगठित आपराधिक समूहों से जुड़े भगोड़े कथित तौर पर स्टूडेंट वीज़ा, शरण की मांग और अवैध आव्रजन रास्तों से उत्तरी अमेरिका पहुंचे और फिर ऐसे नेटवर्क बनाए जो अब कई देशों में काम कर रहे हैं।
न्यूज़वीक ने बताया कि DHS के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि वे अमेरिकियों को निशाना बनाने के लिए नहीं आए थे। कम से कम शुरुआत में तो नहीं। वे इसलिए आए क्योंकि अमेरिका और कनाडा सुरक्षित जगहें थीं, जहाँ से वे अपने देश में लोगों के खिलाफ अपराध कर सकते थे। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे सेंट्रल वैली के किसी अपार्टमेंट या वैंकूवर के बाहरी इलाके में बैठकर वे भारत में हत्याओं का आदेश दे सकते थे, यह जानते हुए कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया धीमी है, शरण का दावा सालों तक चल सकता है, और भारतीय पुलिस का नोटिस अकेले उन्हें गिरफ्तार नहीं करवा सकता।
इसमें बताया गया है कि कैसे वह मॉडल, जिसने शुरू में भारत में व्यापारियों को डराया-धमकाया था, सैक्रामेंटो में दुकानदारों को भी निशाना बनाने लगा; उसी लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का इस्तेमाल करके, जो पहले बंदूकें और नकदी पहुंचाता था, अब कोकीन और फेंटानिल बनाने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल पहुंचाए जाने लगे।
न्यूज़वीक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत, कनाडा और अमेरिका की सरकारें अब एक ही संगठन का वर्णन लगभग एक जैसी भाषा में करती हैं। जहाँ FBI इसे भारत के सबसे वांछित आपराधिक नेटवर्क में से एक कहती है, वहीं रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस इसे एक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन कहती है और भारतीय पुलिस इसे एक ऐसा सिंडिकेट कहती है जिसकी पहुंच कई महाद्वीपों तक है।
न्यूज़वीक ने कहा कि उसकी रिपोर्ट भारत और अन्य महाद्वीपों में सत्यापित स्रोतों से मिली जानकारी, संघीय अभियोगों, इंटरपोल नोटिस, भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की फाइलों, भारतीय राज्य पुलिस के बयानों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कनाडाई सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित है।
इसमें कई ऐसे लोगों का ज़िक्र किया गया है जिन पर सार्वजनिक आरोप हैं, जिन्हें औपचारिक रूप से नामित किया गया है या जिनके खिलाफ कानून प्रवर्तन कार्रवाई हुई है; साथ ही यह भी कहा गया है कि आरोप तब तक आरोप ही रहते हैं जब तक अदालत कुछ और न कहे। रिपोर्ट में लॉरेंस बिश्नोई, अनमोल बिश्नोई, गोल्डी बराड़, अर्श डाला, भानु राणा, अरविंद कुमार, सुनील कुमार, चरणजीत सिंह और दरमनजोत सिंह जैसे कई भगोड़ों का ज़िक्र है। इन पर भारत में हत्या, ड्रग्स की तस्करी, रंगदारी और UAPA के तहत कार्रवाई जैसे कई मामले दर्ज हैं।
न्यूज़वीक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत, अमेरिका और कनाडा के जांचकर्ताओं का मानना है कि ये नेटवर्क अपने ऑपरेशन को कोऑर्डिनेट करने के लिए एन्क्रिप्टेड ऐप्स, क्रिप्टोकरेंसी ट्रांज़ैक्शन और विदेशों में बैठे हैंडलर्स पर ज़्यादा निर्भर हैं, ताकि गैंग लीडर्स सीधे तौर पर शामिल न हों।
हरियाणा स्पेशल टास्क फोर्स के इंस्पेक्टर जनरल बी. सतीश बालन ने न्यूज़वीक को बताया, "अब किसी गैंगस्टर को रंगदारी मांगने, गोलीबारी करवाने या डराने-धमकाने के लिए हरियाणा में मौजूद रहने की ज़रूरत नहीं है।"
उन्होंने बताया कि ये गैंग "ओवरसीज़ कमांड, डिजिटल गुमनामी, स्थानीय स्तर पर काम को अंजाम देने और मनोवैज्ञानिक युद्ध" के मिले-जुले मॉडल पर काम करते हैं।
न्यूज़वीक ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि कुछ ही सालों में अपराधों का स्वरूप बदल गया है - रंगदारी और हत्या से लेकर कैश और क्रिप्टोकरेंसी तक, पिस्तौल से लेकर फेंटानिल तक, और अब इसमें शामिल होने वाले लोग भी कम उम्र के होते जा रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि भारत ने कनाडा और अमेरिका में रह रहे कई भगोड़ों के प्रत्यर्पण (extradition) की बार-बार मांग की है, लेकिन कानूनी और प्रक्रियात्मक अड़चनों के कारण डिपोर्टेशन और प्रत्यर्पण की कोशिशें धीमी पड़ गई हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने संगठित अपराध और ड्रग्स से जुड़े मामलों की जांच में भारतीय एजेंसियों के साथ सहयोग बढ़ने की बात तो मानी, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इंटरपोल नोटिस और शरण (asylum) से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं के कारण अक्सर कार्रवाई में देरी होती है।





