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LoC, LAC और अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट पर नई पाबंदियां

नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने देश की सुरक्षा और रणनीतिक रूप से संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर नई गाइडलाइंस जारी की हैं। इन दिशा-निर्देशों के तहत लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC), लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद नजदीक नए सोलर, विंड और हाइब्रिड रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट स्थापित करने पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है।
गृह मंत्रालय के इंटरनल सिक्योरिटी विंग की ओर से जारी दिशा-निर्देशों में सीमावर्ती क्षेत्रों में ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़े सुरक्षा पहलुओं को प्राथमिकता दी गई है। मंत्रालय ने सीमाओं के आसपास अलग-अलग दूरी के आधार पर इलाकों को संवेदनशील श्रेणियों में रखा है और परियोजनाओं की स्थापना तथा उनमें काम करने वाले कर्मचारियों को लेकर अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान तय किए हैं।
एक किलोमीटर के दायरे में नए प्रोजेक्ट पर रोक
नई गाइडलाइंस के अनुसार, LoC, LAC और अंतरराष्ट्रीय सीमा के एक किलोमीटर के दायरे में किसी भी नए सोलर, विंड या हाइब्रिड रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट की स्थापना की अनुमति नहीं होगी।
इन परियोजनाओं में बड़े स्तर पर सोलर पैनल, विंड टर्बाइन, ट्रांसमिशन उपकरण और अन्य बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है। सीमावर्ती क्षेत्रों की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने ऐसे प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और उनसे जुड़े संभावित जोखिमों को ध्यान में रखते हुए यह प्रावधान किया है।
यह फैसला विशेष रूप से उन इलाकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां सीमा की सुरक्षा, सैन्य गतिविधियां और रणनीतिक प्रतिष्ठानों की मौजूदगी पहले से ही महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
50 किलोमीटर तक का इलाका संवेदनशील
गाइडलाइंस में LoC, LAC और अंतरराष्ट्रीय सीमा से 50 किलोमीटर तक के इलाके को ‘संवेदनशील क्षेत्र’ के तौर पर चिह्नित किए जाने की बात कही गई है।
इसका मतलब है कि सीमा से काफी दूरी तक किसी रिन्यूएबल एनर्जी परियोजना की योजना बनाते समय सुरक्षा संबंधी पहलुओं को ध्यान में रखना होगा। परियोजना की प्रकृति, स्थान और उससे जुड़े अन्य कारकों के आधार पर संबंधित सुरक्षा एजेंसियों और सरकारी विभागों से आवश्यक मंजूरी ली जा सकती है।
सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट अक्सर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी के दायरे में आते हैं। ऐसे में नई गाइडलाइंस का उद्देश्य ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना माना जा रहा है।
20 किलोमीटर के दायरे में रक्षा मंत्रालय की NOC
गाइडलाइंस में अंतरराष्ट्रीय सीमा से 20 किलोमीटर के दायरे वाले क्षेत्रों को लेकर भी विशेष प्रावधान किया गया है। इन इलाकों में संबंधित रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं के लिए रक्षा मंत्रालय से अलग से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी NOC लेना जरूरी होगा।
इस प्रावधान से स्पष्ट है कि सीमा के बेहद नजदीक स्थापित होने वाली ऊर्जा परियोजनाओं को केवल सामान्य प्रशासनिक या पर्यावरणीय मंजूरी के आधार पर आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा। सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की समीक्षा के बाद ही परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश से जुड़े कर्मचारियों पर भी नियम
गाइडलाइंस में सीमावर्ती देशों से आने वाले लोगों की परियोजनाओं में भागीदारी को लेकर भी सख्त प्रावधान किए गए हैं। केंद्रीय सरकार की मंजूरी के बिना पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन जैसे जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों के इंजीनियरों, स्टाफ, कर्मचारियों और मजदूरों को परियोजना के कार्यान्वयन में शामिल नहीं किया जा सकेगा।
इस प्रावधान का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे से जुड़े कामों में विदेशी नागरिकों की भूमिका को नियंत्रित करना है। रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं में तकनीकी विशेषज्ञों से लेकर निर्माण कार्य में लगे कर्मचारियों तक बड़ी संख्या में लोग शामिल हो सकते हैं। इसलिए सरकार ने इन क्षेत्रों में काम करने वाले विदेशी नागरिकों को लेकर अतिरिक्त जांच और अनुमति की व्यवस्था की है।
ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बढ़ेगी सुरक्षा जांच
भारत में सोलर और विंड एनर्जी क्षमता को तेजी से बढ़ाया जा रहा है। देश के कई सीमावर्ती राज्यों में भी सौर और पवन ऊर्जा की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। ऐसे में नई गाइडलाइंस का सीधा असर उन परियोजनाओं पर पड़ सकता है, जिनके लिए सीमावर्ती इलाकों में जमीन की पहचान की जा रही है।
परियोजना डेवलपर्स को अब स्थान तय करते समय केवल जमीन की उपलब्धता, बिजली उत्पादन की क्षमता और कनेक्टिविटी जैसे आर्थिक एवं तकनीकी पहलुओं पर ही ध्यान नहीं देना होगा, बल्कि सीमा सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को भी ध्यान में रखना होगा।
रणनीतिक क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर जोर
सीमा के आसपास किसी भी बड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण से सुरक्षा एजेंसियों के सामने निगरानी और सुरक्षा से जुड़ी अतिरिक्त चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। सोलर और विंड परियोजनाओं में बड़े क्षेत्र में फैले उपकरण, सड़कें, बिजली लाइनें और अन्य संरचनाएं शामिल होती हैं।
ऐसे में सरकार की ओर से संवेदनशील क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा जांच का प्रावधान रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर LoC और LAC जैसे इलाकों में सैन्य गतिविधियों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए बुनियादी ढांचे के निर्माण को लेकर पहले से ही कई सावधानियां बरती जाती हैं।
रिन्यूएबल एनर्जी और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन
सरकार देश में स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार पर जोर दे रही है। इसके बावजूद सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नई गाइडलाइंस इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई हैं। एक तरफ देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में किसी भी ऐसे बुनियादी ढांचे से बचना होगा, जो सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।
परियोजना कंपनियों के लिए नई अनुपालन चुनौती
नई व्यवस्था के बाद रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों को परियोजना की शुरुआती योजना से ही सुरक्षा नियमों का पालन करना होगा। जमीन की पहचान, परियोजना का डिजाइन, कर्मचारियों की नियुक्ति और निर्माण गतिविधियों से जुड़े विभिन्न चरणों में संबंधित सरकारी मंजूरियों की जरूरत पड़ सकती है।
विशेष रूप से सीमा से निर्धारित दूरी के भीतर आने वाले क्षेत्रों में परियोजना शुरू करने से पहले सुरक्षा एजेंसियों की आपत्तियों और आवश्यक NOC को ध्यान में रखना होगा।
कुल मिलाकर, गृह मंत्रालय की नई गाइडलाइंस का मुख्य फोकस सीमावर्ती क्षेत्रों में रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं के विस्तार को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोड़ना है। LoC, LAC और अंतरराष्ट्रीय सीमा के आसपास अलग-अलग सुरक्षा दूरी निर्धारित करने तथा विदेशी कर्मचारियों की भागीदारी पर नियंत्रण लगाने से सरकार ने इन इलाकों में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए एक अधिक सख्त सुरक्षा ढांचा तैयार किया है। आने वाले समय में इन प्रावधानों का असर सीमावर्ती राज्यों में प्रस्तावित सोलर, विंड और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं की योजना और मंजूरी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।





