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ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे पर NCPI सांसद का बड़ा बयान
Ratna Netam
8 Oct 2026 8:59 PM IST

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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए सांसदों और ममता बनर्जी के बीच जारी राजनीतिक मतभेदों के बीच नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) से जुड़े सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने गुरुवार, 8 अक्टूबर को बड़ा बयान दिया। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे को ज्यादा महत्व देने से इनकार कर दिया। बसुनिया ने कहा कि ममता बनर्जी की राजनीतिक गतिविधियों और राजधानी में उनकी मौजूदगी से बागी गुट की रणनीति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके सहयोगी अपने राजनीतिक रुख पर कायम हैं और ममता बनर्जी की गतिविधियों को लेकर चिंतित नहीं हैं।
ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे से जुड़े सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने कहा कि वह कहां जाती हैं और किन कार्यक्रमों में हिस्सा लेती हैं, इससे उनके समूह का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी विपक्ष की नेता हैं और अपनी राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने के लिए स्वतंत्र हैं।बसुनिया ने कहा, "ममता बनर्जी कहां जाती हैं या नहीं, इससे हमें कोई लेना-देना नहीं है। वह विपक्ष की नेता हैं और जहां चाहें, वहां जाने के लिए आजाद हैं।"
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसद अपने राजनीतिक फैसलों को ममता बनर्जी की गतिविधियों के आधार पर नहीं बदलेंगे। उनके बयान से स्पष्ट है कि बागी खेमे का एक हिस्सा अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखने पर जोर दे रहा है।
ममता बनर्जी गुरुवार शाम दिल्ली पहुंचीं। उनका यह दौरा ऐसे समय हुआ है, जब विपक्षी INDIA गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है। गठबंधन ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात का समय भी मांगा है। हालांकि, ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे का आधिकारिक उद्देश्य तत्काल स्पष्ट नहीं हुआ था।
ममता बनर्जी के राजधानी पहुंचने के कारण राष्ट्रीय राजनीति में कई तरह की चर्चाएं शुरू हुईं, लेकिन बसुनिया ने कहा कि इसका उनके राजनीतिक समूह के फैसलों से कोई संबंध नहीं है।
दरअसल, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ा राजनीतिक बदलाव सामने आया था। जून 2026 में पार्टी के 20 सांसदों ने अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़ने की घोषणा की थी। इस समूह ने भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने की बात भी कही थी।
इन बागी सांसदों में कूचबिहार से लोकसभा सदस्य जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया भी शामिल हैं। हालांकि, संसद में बागी सांसदों की अलग पहचान और उनकी सदस्यता से जुड़े सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। लोकसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में संबंधित सांसदों को तृणमूल कांग्रेस के सदस्य के रूप में सूचीबद्ध किए जाने की स्थिति बनी हुई है
इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व और बागी सांसदों के बीच मतभेद बढ़े हैं। पार्टी नेतृत्व ने अलग हुए सांसदों की सदस्यता को लेकर लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष शिकायत की है। तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि पार्टी छोड़ने वाले सांसदों की स्थिति संविधान की दसवीं अनुसूची में दिए गए दल-बदल विरोधी प्रावधानों के तहत जांची जानी चाहिए।
दूसरी ओर, बागी सांसद अपने फैसलों को राजनीतिक रूप से उचित बताते रहे हैं। उन्होंने संसद में अपनी अलग पहचान स्थापित करने का प्रयास किया है। इस संबंध में अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष की प्रक्रिया के अधीन है।बागी सांसदों की सदस्यता से जुड़ा मामला गुरुवार को भी चर्चा में रहा। 8 अक्टूबर को लोकसभा अध्यक्ष के नोटिस का जवाब देने की समयसीमा समाप्त होने के बीच संबंधित सांसदों ने अतिरिक्त समय की मांग की। रिपोर्ट के अनुसार, बागी गुट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से जुड़ी याचिका का जवाब देने के लिए दो सप्ताह का और समय मांगा है।
सांसदों ने अपनी मांग के पीछे दुर्गा पूजा के आयोजनों और कानूनी दस्तावेज तैयार करने में लग रहे समय का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि संबंधित मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए कानूनी टीम को अतिरिक्त समय चाहिए।इस बीच बागी सांसदों की एक बैठक में भी सभी सदस्यों की उपस्थिति नहीं रही। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, 20 में से केवल 10 सांसद बैठक में शामिल हुए। हालांकि, गुट के प्रतिनिधियों का कहना है कि अन्य सांसदों से विचार-विमर्श के बाद समय बढ़ाने की मांग पर सहमति बनाई गई।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने बार-बार समय मांगे जाने की आलोचना की है। पार्टी का कहना है कि जिन सांसदों ने उसके चुनाव चिह्न पर जीत हासिल की थी, उन्हें अपने राजनीतिक फैसलों के लिए जवाबदेह होना चाहिए।इस विवाद की शुरुआत जून 2026 में हुई थी, जब तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के एक समूह ने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाने की घोषणा की। इसके बाद लोकसभा में उनकी सदस्यता और अलग राजनीतिक पहचान को लेकर कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
सितंबर में जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया था कि NCPI से जुड़े 20 सांसदों में से 17 भाजपा में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि यह कदम दुर्गा पूजा के आसपास उठाया जा सकता है। हालांकि, इस दावे पर बागी गुट के अन्य सदस्यों ने ही असहमति जताई थी।सांसद अबू ताहेर खान और अन्य नेताओं ने कहा था कि भाजपा में शामिल होने का कोई सामूहिक निर्णय नहीं लिया गया है। पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी बसुनिया के दावे से दूरी बनाई थी। इससे स्पष्ट हुआ कि बागी समूह के भीतर भविष्य की राजनीतिक रणनीति को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद हैं।
इस पृष्ठभूमि में ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे पर बसुनिया का बयान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री की गतिविधियों पर सीधे टिप्पणी करने के बजाय कहा कि वह अपनी इच्छानुसार कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं।इस बयान से बसुनिया ने यह संदेश देने की कोशिश की कि बागी समूह के सामने इस समय अपनी राजनीतिक और संसदीय स्थिति से जुड़े मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, उनके बयान को पूरे समूह की सर्वसम्मत राय नहीं माना जा सकता, क्योंकि अन्य राजनीतिक विषयों पर बागी सांसदों के बीच मतभेद पहले भी सामने आ चुके हैं।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए भी सांसदों का अलग होना महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम रहा है। पार्टी ने इस मामले में दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की मांग की है। वहीं, संबंधित सांसदों का पक्ष है कि उनके राजनीतिक फैसलों और संसदीय स्थिति का निर्धारण उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में निर्वाचित प्रतिनिधियों के दल-बदल से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। किसी सांसद के खिलाफ अयोग्यता संबंधी शिकायत आने पर संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार निर्णय लिया जाता है। इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है।
फिलहाल जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे को लेकर किसी प्रकार की चिंता व्यक्त नहीं की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि पूर्व मुख्यमंत्री की गतिविधियों से उनके राजनीतिक समूह का कोई लेना-देना नहीं है।गुरुवार को सामने आए इस बयान और बागी सांसदों द्वारा अतिरिक्त समय मांगे जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए समूह की स्थिति एक बार फिर चर्चा में है। अब सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष की ओर से समय बढ़ाने की मांग पर लिए जाने वाले निर्णय और अयोग्यता संबंधी मामले की आगे की कार्यवाही पर रहेंगी।
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