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सरकार के सामने Meta की पेशी, PM वीडियो हटाने पर जवाब

Ratna Netam
5 Aug 2026 2:26 PM IST
सरकार के सामने Meta की पेशी, PM वीडियो हटाने पर जवाब
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दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक से कुछ घंटों के लिए हटाए जाने के मामले ने अब गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक रूप ले लिया है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने मेटा (Meta) के वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया, जहां कंपनी के वैश्विक प्रतिनिधियों ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक कर पूरे घटनाक्रम पर अपना पक्ष रखा। करीब 45 मिनट तक चली इस बैठक में प्रधानमंत्री का वीडियो हटने की वजहों के अलावा सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (CSAM) और महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर भी विस्तार से चर्चा हुई।
सूत्रों के अनुसार मेटा के चीफ ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल काप्लान नई दिल्ली में मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन से मिलने पहुंचे। बैठक के दौरान कंपनी की ओर से यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई कि आखिर किन कारणों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हट गया था। हालांकि सरकार की ओर से बैठक में दिए गए निर्देशों या कंपनी के स्पष्टीकरण पर कोई आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
यह मामला उस समय और गंभीर हो गया जब संसद की सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली समिति ने मेटा प्रमुख मार्क जकरबर्ग से बिना शर्त सार्वजनिक माफी की मांग की है। समिति ने उन्हें तीन दिन का समय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि में माफी नहीं मांगी जाती, तो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3) के तहत कंपनी को प्राप्त कानूनी सुरक्षा और मध्यस्थ (इंटरमीडियरी) का दर्जा वापस लेने की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।
लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी पत्र में कहा गया कि समिति ने प्रधानमंत्री के उस वीडियो को हटाए जाने की घटना को अत्यंत गंभीर माना है, जिसमें उन्होंने छात्रों और युवाओं को संबोधित करते हुए परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ सख्त कार्रवाई और शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी बात रखी थी। समिति का मानना है कि इस प्रकार के वीडियो को हटाना केवल तकनीकी त्रुटि का मामला नहीं माना जा सकता और इसकी पूरी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
संसदीय समिति ने केवल प्रधानमंत्री के वीडियो का मामला ही नहीं उठाया, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर बढ़ते आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर भी गहरी चिंता जताई। समिति ने विशेष रूप से बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (CSAM) और महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक एवं अश्लील सामग्री को तत्काल हटाने की आवश्यकता पर जोर दिया। समिति ने कहा कि यदि कोई सोशल मीडिया मंच ऐसे कंटेंट को समय पर नहीं हटाता है तो उसके खिलाफ आईटी अधिनियम की धारा 79(3) के तहत कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
समिति का मानना है कि सोशल मीडिया कंपनियों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री की निगरानी करें और भारतीय कानूनों के अनुरूप कार्रवाई सुनिश्चित करें। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो उन्हें केवल तकनीकी मंच मानकर कानूनी संरक्षण देना उचित नहीं होगा।
इससे पहले भी मेटा और सरकार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आ चुके हैं। समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया कि यह पहली बार नहीं है जब मेटा ने किसी महत्वपूर्ण वीडियो को हटाया हो। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2024 में भी मेटा प्रमुख मार्क जकरबर्ग ने भारतीय संसदीय चुनावों को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। उनके अनुसार सोशल मीडिया कंपनियां कई बार भारत सरकार के गृह मंत्रालय और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं करतीं, जिससे गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
सरकार और संसदीय समिति दोनों का मानना है कि भारत में कार्यरत सभी डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भारतीय कानूनों और नियमों का पूरी तरह पालन करना होगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रीय महत्व के विषयों, सार्वजनिक हित और संवेदनशील मुद्दों से जुड़े कंटेंट को बिना उचित कारण हटाया न जाए। दूसरी ओर मेटा ने सरकार के सामने अपना पक्ष रखते हुए पूरे मामले को स्पष्ट करने का प्रयास किया है, लेकिन अब सभी की नजर इस बात पर है कि कंपनी मार्क जकरबर्ग की ओर से माफी मांगती है या नहीं और सरकार आगे इस मामले में क्या कदम उठाती है। आने वाले दिनों में यह मामला सोशल मीडिया नियमन और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही से जुड़े बड़े विमर्श का केंद्र बन सकता है।
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