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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला नारायण साईं की सजा पर रोक लगाने से किया इनकार

Ratna Netam
7 Aug 2026 9:58 PM IST
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला नारायण साईं की सजा पर रोक लगाने से किया इनकार
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नई दिल्ली : दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम के बेटे नारायण साईं को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें नारायण साईं की सजा पर रोक लगाने और जमानत देने की मांग खारिज कर दी गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह साईं की लंबित आपराधिक अपील पर यथाशीघ्र सुनवाई करते हुए संभव हो तो तीन महीने के भीतर फैसला सुनाने का प्रयास करे।
यह मामला उस विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) से जुड़ा था, जिसमें नारायण साईं ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने सुनवाई के दौरान सजा पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि अपील लंबित है, इसलिए उसका समयबद्ध निपटारा उचित होगा।
गौरतलब है कि गुजरात हाईकोर्ट ने इस वर्ष 4 मई को नारायण साईं की लगातार पांचवीं जमानत और सजा पर रोक संबंधी याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि उपलब्ध रिकॉर्ड और ट्रायल कोर्ट के फैसले को देखते हुए यह मानने का कोई आधार नहीं है कि आरोपी के बरी होने की प्रबल संभावना है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के बाद निर्दोष होने की प्रारंभिक धारणा समाप्त हो जाती है और केवल लंबी कैद के आधार पर सजा पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि अपील के निपटारे में देरी के लिए स्वयं नारायण साईं जिम्मेदार हैं। अदालत के अनुसार, उन्होंने बार-बार जमानत की याचिकाएं दाखिल कीं, जबकि अपील की अंतिम सुनवाई कराने में उनकी कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई दी। न्यायालय ने कहा कि यदि आरोपी वास्तव में जल्द न्याय चाहता तो वह अपील पर सुनवाई के लिए तैयार रहता, लेकिन लगातार अंतरिम राहत मांगने से न्यायिक प्रक्रिया लंबी होती गई। ऐसे में लंबी कैद का आधार बनाकर विशेष राहत की मांग उचित नहीं मानी जा सकती।
नारायण साईं को वर्ष 2019 में सूरत की विशेष अदालत ने एक महिला अनुयायी के साथ कई वर्षों तक दुष्कर्म और यौन शोषण करने का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, जिनमें दुष्कर्म और अप्राकृतिक अपराध से संबंधित प्रावधान शामिल थे, के तहत उन्हें दोषी माना था। सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार पीड़िता वर्ष 2001 में सूरत स्थित आश्रम में धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान नारायण साईं के संपर्क में आई थी। उसने आरोप लगाया कि वर्ष 2001 से 2004 के बीच बिहार, सूरत और अन्य आश्रमों में उसके साथ कई बार यौन शोषण किया गया। पीड़िता ने यह भी बताया कि आरोपी और उसके पिता का अनुयायियों पर गहरा प्रभाव होने के कारण वह लंबे समय तक शिकायत दर्ज कराने का साहस नहीं जुटा सकी।
वर्ष 2013 में आसाराम की गिरफ्तारी के बाद पीड़िता ने हिम्मत जुटाकर अक्टूबर 2013 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। जांच के दौरान पुलिस ने कई साक्ष्य एकत्र किए और मामले को अदालत में पेश किया। ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयान को विश्वसनीय मानते हुए कहा कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी परिस्थितियों के अनुरूप थी और उसका संतोषजनक कारण मौजूद था। गुजरात हाईकोर्ट ने भी इस निष्कर्ष को सही ठहराया।
एफआईआर दर्ज होने के बाद नारायण साईं कुछ समय तक फरार रहा। बाद में दिसंबर 2013 में दिल्ली पुलिस ने उसे पंजाब-हरियाणा सीमा के निकट से गिरफ्तार किया था। इसके बाद लंबी न्यायिक प्रक्रिया चली और अंततः ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद फिलहाल नारायण साईं की सजा यथावत रहेगी। अब सभी की नजर गुजरात हाईकोर्ट पर होगी, जहां उसकी आपराधिक अपील लंबित है। यदि उच्च न्यायालय निर्धारित समयसीमा के भीतर सुनवाई पूरी करता है, तो इस बहुचर्चित मामले में आगे की कानूनी स्थिति जल्द स्पष्ट हो सकती है।
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