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Supreme Court से अंतरराष्ट्रीय मूर्ति तस्कर सुभाष कपूर को बड़ा झटका
Ratna Netam
27 Oct 2026 4:42 PM IST

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नई दिल्ली : 27 अक्टूबर 2026। अंतरराष्ट्रीय कला और प्राचीन मूर्ति तस्करी से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जा चुके सुभाष चंद्र कपूर को जर्मनी वापस भेजने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाए जाने की जानकारी सामने आई है, जिसमें केंद्र सरकार को कपूर को जर्मनी वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के ताजा स्थगन आदेश की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं हो सकी है। मद्रास हाई कोर्ट का 8 सितंबर 2026 का आदेश सार्वजनिक न्यायिक रिकॉर्ड में मौजूद है।
मद्रास हाई कोर्ट ने दिया था जर्मनी भेजने का आदेश
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने 8 सितंबर 2026 को सुभाष चंद्र कपूर की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की थी। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह कपूर को तमिलनाडु की तिरुचिरापल्ली केंद्रीय जेल से अपनी हिरासत में लेकर कानून के अनुसार जर्मनी वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू करे।हाई कोर्ट ने कहा था कि कपूर को जिस विशेष मामले में जर्मनी से भारत प्रत्यर्पित किया गया था, उसमें वह अपनी सजा पूरी कर चुका है। ऐसे में जर्मनी की अनुमति के बिना प्रत्यर्पण से पहले के अन्य मामलों में उसकी हिरासत जारी रखने की वैधता पर सवाल उठता है।
2012 में जर्मनी से भारत लाया गया था कपूर
सुभाष चंद्र कपूर भारतीय मूल का अमेरिकी नागरिक है। उसे अक्टूबर 2011 में जर्मनी में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद जुलाई 2012 में प्रत्यर्पण प्रक्रिया के तहत भारत लाया गया।कपूर पर तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों से ऐतिहासिक मूर्तियों की चोरी और उन्हें विदेशों में बेचने से जुड़े गंभीर आरोप लगे थे।जांच एजेंसियों के अनुसार, कपूर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राचीन कलाकृतियों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा था। अमेरिका के न्यूयॉर्क में वह प्राचीन वस्तुओं की एक गैलरी संचालित करता था।
मूर्ति चोरी मामले में मिली थी 10 साल की सजा
वर्ष 2022 में तमिलनाडु की एक अदालत ने कपूर को प्राचीन मूर्तियों की चोरी और अवैध कारोबार से संबंधित मामले में दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष कारावास की सजा सुनाई थी।यह मामला अरियालुर जिले के एक मंदिर से प्राचीन मूर्तियों की चोरी से संबंधित था। जांच में सामने आया था कि चोरी की गई कलाकृतियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया गया था।कपूर की दोषसिद्धि को भारतीय पुरावशेषों की तस्करी के विरुद्ध कार्रवाई में महत्वपूर्ण माना गया था।
प्रत्यर्पण संधि को लेकर खड़ा हुआ कानूनी विवाद
इस मामले का प्रमुख कानूनी पहलू भारत और जर्मनी के बीच प्रत्यर्पण संधि से जुड़ा है।प्रत्यर्पण कानून में 'रूल ऑफ स्पेशलिटी' का सिद्धांत लागू होता है। इसके अनुसार, प्रत्यर्पित व्यक्ति पर सामान्यतः उसी अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है जिसके लिए उसका प्रत्यर्पण किया गया था। दूसरे पुराने अपराधों में कार्रवाई के लिए संबंधित देश की अनुमति आवश्यक हो सकती है।हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, जर्मनी ने कपूर के खिलाफ चार अतिरिक्त मामलों में अभियोजन की अनुमति देने से इनकार किया था, जबकि अन्य मामलों में अनुमति का प्रश्न लंबित था।मद्रास हाई कोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए कपूर की हिरासत को अनुचित माना था।
अमेरिका भी चाहता है कपूर का प्रत्यर्पण
सुभाष कपूर के मामले में अमेरिका की भी दिलचस्पी है। अमेरिकी अधिकारियों ने प्राचीन कलाकृतियों की कथित तस्करी से जुड़े मामलों में उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया था।भारत सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार, अमेरिका का प्रत्यर्पण अनुरोध सितंबर 2021 में प्राप्त हुआ था।हालांकि, भारत से अमेरिका प्रत्यर्पण की प्रक्रिया में भी जर्मनी की सहमति से जुड़े कानूनी प्रश्न सामने आए हैं, क्योंकि कपूर को सबसे पहले जर्मनी से भारत लाया गया था।इस कारण मामला केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भारत, जर्मनी और अमेरिका के बीच प्रत्यर्पण संबंधी कानूनी दायित्व भी महत्वपूर्ण हैं।
सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर नजर
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाए जाने की जानकारी के बाद अब इस मामले में आगे की न्यायिक कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। शीर्ष अदालत के प्रमाणित आदेश से ही रोक का सटीक दायरा, उसकी अवधि और अगली सुनवाई की तारीख स्पष्ट हो सकेगी।यह मामला अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण संधियों, गंभीर आपराधिक आरोपों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
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