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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी युवक को नियमित जमानत प्रदान कर दी है। न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने मामले की परिस्थितियों, पीड़िता और आरोपी के बीच संबंध, पीड़िता के माता-पिता की सहमति तथा आरोपी के जेल में संतोषजनक आचरण को ध्यान में रखते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में आरोपी को आगे न्यायिक हिरासत में रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत देने का अर्थ आरोपी को आरोपों से मुक्त करना नहीं है।
14 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को चेतन बनाम दिल्ली सरकार मामले में नियमित जमानत का आदेश पारित किया। यह मामला दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के सरिता विहार थाने में 17 जनवरी 2026 को दर्ज एफआईआर संख्या 44/2026 से संबंधित है।मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत आरोप दर्ज किए गए थे। आरोपी की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 483 के तहत तीसरी बार नियमित जमानत याचिका दाखिल की गई थी।
जनवरी में लापता हुई थी 16 वर्षीय किशोरी
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता के पिता ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी लगभग 16 वर्षीय बेटी 5 जनवरी 2026 से लापता है। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।13 मई 2026 को पुलिस ने किशोरी को दिल्ली के बुराड़ी स्थित नत्थूपुरा इलाके में एक किराए के मकान से बरामद किया। वह आरोपी के साथ रह रही थी। उसी दिन पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया।जांच के दौरान आरोपी ने दावा किया कि उसने किशोरी से विवाह किया है। हालांकि, कथित विवाह का कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया था। मेडिकल जांच में किशोरी के गर्भवती होने की जानकारी भी सामने आई थी।
पीड़िता के माता-पिता ने रिश्ते को किया स्वीकार
सुनवाई के दौरान पीड़िता अपने माता-पिता और वकील के साथ अदालत में उपस्थित हुई। पीड़िता की ओर से बताया गया कि वह आरोपी के साथ अपनी इच्छा से गई थी।पीड़िता के माता-पिता ने भी अदालत को बताया कि उन्होंने अब दोनों के रिश्ते को स्वीकार कर लिया है। पिता ने यह भी कहा कि वह मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।अदालत ने इन परिस्थितियों को जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना। हालांकि, नाबालिग की सहमति पॉक्सो कानून के तहत कानूनी सहमति नहीं मानी जाती।
चार महीने की न्यायिक हिरासत में व्यवहार रहा संतोषजनक
अदालत ने जेल प्रशासन की रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया। 19 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी 13 मई से चार महीने और छह दिन न्यायिक हिरासत में रह चुका था।रिपोर्ट में आरोपी का समग्र व्यवहार संतोषजनक पाया गया। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि उसकी हिरासत में पूछताछ पूरी हो चुकी थी और निचली अदालत में आरोप तय किए जा चुके थे।राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया। अभियोजन पक्ष ने आशंका जताई कि आरोपी रिहा होने के बाद पीड़िता या गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी दिया हवाला
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध एवं अन्य मामले का उल्लेख किया।इस फैसले में किशोरों के प्रेम संबंधों से जुड़े मामलों में पॉक्सो कानून के संभावित दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों के लिए कानून में विशेष अपवाद पर विचार करने की आवश्यकता भी बताई थी।दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में प्रत्येक घटना की परिस्थितियों, दोनों पक्षों के बयानों और उपलब्ध तथ्यों पर सावधानीपूर्वक विचार करना आवश्यक है।
20 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत
अदालत ने आरोपी को 20 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानतदार की शर्त पर नियमित जमानत देने का आदेश दिया।इसके साथ ही आरोपी को जांच में सहयोग करने, गवाहों को प्रभावित नहीं करने, सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने और अदालत के निर्देशों के अनुसार पेश होने को कहा गया।आरोपी को प्रत्येक सोमवार सुबह नौ बजे संबंधित स्थानीय पुलिस थाने में उपस्थित होने का भी निर्देश दिया गया है। उसे अपना पता और मोबाइल नंबर जांच अधिकारी को उपलब्ध कराना होगा।
जमानत का मतलब आरोपों से बरी होना नहीं
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जमानत पर की गई टिप्पणियां केवल वर्तमान आवेदन के निस्तारण तक सीमित हैं। इनका निचली अदालत में चल रही सुनवाई या मामले के अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।इस निर्णय ने किशोरों के आपसी संबंधों से जुड़े पॉक्सो मामलों में जमानत के समय व्यक्तिगत परिस्थितियों और कानूनी संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता को एक बार फिर सामने रखा है।
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