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New Delhi नई दिल्ली : कभी बढ़ती आबादी भारत में प्रजनन दर (फर्टिलिटी रेट) में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और यह अब करीब 1.9 के स्तर तक पहुंच गई है। इसका मतलब यह है कि औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है। यह बदलाव देश की जनसंख्या संरचना और सामाजिक-आर्थिक स्थिति में बड़े परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और जीवनशैली से जुड़े कारण हैं। सबसे बड़ा कारण शहरीकरण और शिक्षा का बढ़ना है। जैसे-जैसे लोग शहरों की ओर बढ़ रहे हैं और शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे परिवार छोटा रखने की प्रवृत्ति भी मजबूत हुई है। खासकर महिलाएं अब करियर और आर्थिक स्वतंत्रता पर अधिक ध्यान दे रही हैं, जिससे देर से शादी और देर से मातृत्व का चलन बढ़ा है।
इसके अलावा महंगाई और जीवनयापन की बढ़ती लागत भी एक बड़ा कारण है। बच्चों की परवरिश, शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है, जिससे कई परिवार सीमित बच्चों की योजना बना रहे हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों में यह सोच और भी अधिक देखने को मिलती है कि कम बच्चे होने से उन्हें बेहतर जीवन और बेहतर संसाधन दिए जा सकते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार नियोजन की बेहतर सुविधाओं ने भी इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता और जागरूकता के कारण लोग अब परिवार नियोजन को लेकर अधिक सजग हो गए हैं। सरकारी और गैर-सरकारी अभियानों ने भी “छोटा परिवार, सुखी परिवार” की सोच को बढ़ावा दिया है।
सामाजिक दृष्टिकोण में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां बड़े परिवार को सामान्य माना जाता था, वहीं अब छोटे परिवार को अधिक सुविधाजनक और आधुनिक जीवनशैली के अनुरूप माना जा रहा है। इसके साथ ही महिलाएं अब शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में अधिक सक्रिय हैं, जिससे मातृत्व की उम्र भी आगे खिसक रही है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि प्रजनन दर लगातार गिरती रही, तो आने वाले समय में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ सकता है, जिससे आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। कई विकसित देशों में यह स्थिति पहले से देखी जा चुकी है।





