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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, गैंगरेप केस में रेलवे दोषी

Ratna Netam
4 Aug 2026 2:50 PM IST
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, गैंगरेप केस में रेलवे दोषी
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दिल्ली : हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 में बिहार में एक पैसेंजर ट्रेन में गैंगरेप की शिकार हुई महिला को बड़ी राहत देते हुए रेलवे को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई यात्री वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा है, तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है। केवल इस आधार पर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता कि अपराध रेलवे कर्मचारियों ने नहीं, बल्कि बाहरी लोगों ने किया था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे परिसर और ट्रेन में यात्रियों की सुरक्षा उसकी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है।

यह मामला 27 अगस्त 2012 का है, जब बिहार के एक रेलवे स्टेशन पर खड़ी पैसेंजर ट्रेन में एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना हुई थी। घटना के बाद पीड़िता के पिता ने 9 मार्च 2013 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत की सुनवाई के बाद आयोग ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को पीड़िता को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। आयोग का मानना था कि यह मामला मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का है और पीड़िता को तत्काल आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए।

हालांकि रेलवे ने एनएचआरसी के इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। रेलवे का तर्क था कि मुआवजा तय करने का अधिकार केवल रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के पास है और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस प्रकार का आदेश जारी नहीं कर सकता। रेलवे ने यह भी कहा कि घटना में शामिल लोग रेलवे कर्मचारी नहीं थे, बल्कि बाहरी अपराधी थे जिन्हें बाद में दोषी भी ठहराया गया। इसके अलावा रेलवे का कहना था कि घटना उस समय हुई जब ट्रेन स्टेशन पर खड़ी थी, इसलिए कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के अधीन कार्यरत गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (जीआरपी) की थी।

रेलवे ने अदालत में यह दलील भी दी कि गैंगरेप की घटना रेलवे अधिनियम की धारा 123 के तहत ‘अनहोनी घटना’ की परिभाषा में नहीं आती, इसलिए धारा 124ए के तहत मुआवजा देने का प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। जस्टिस अमित बंसल की पीठ ने कहा कि किसी यात्री पर ट्रेन या रेलवे परिसर में किया गया हिंसक हमला ‘अनहोनी घटना’ की श्रेणी में आता है और गैंगरेप जैसा गंभीर अपराध निश्चित रूप से हिंसक हमले की परिभाषा में शामिल है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कानून केवल ट्रेन के अंदर होने वाली घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि रेलवे प्लेटफॉर्म और रेलवे परिसर में यात्रियों के साथ होने वाली हिंसक घटनाओं पर भी समान रूप से लागू होता है। अदालत ने पाया कि पीड़िता वैध टिकट के साथ यात्रा कर रही थी और रेलवे की ओर से उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए थी। इसलिए रेलवे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अधिकार क्षेत्र को भी सही ठहराया। अदालत ने कहा कि आयोग ने मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के मामले में पीड़िता को त्वरित राहत देने के उद्देश्य से अपने अधिकारों का उचित उपयोग किया। अदालत ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कोई “बिना दांत का बाघ” नहीं है, बल्कि नागरिकों के जीवन और सम्मान के अधिकार का प्रभावी संरक्षक है। अदालत ने कहा कि सरकारें आयोग की सिफारिशों को अदालत में चुनौती दे सकती हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।

गौरतलब है कि वर्ष 2016 में जब रेलवे की याचिका पर सुनवाई शुरू हुई थी, तब हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश के तहत रेलवे को तीन लाख रुपये अदालत की रजिस्ट्री में जमा कराने का निर्देश दिया था। अब रेलवे की याचिका खारिज होने के बाद अदालत ने रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि जमा की गई राशि, उस पर अर्जित ब्याज सहित, दो सप्ताह के भीतर पीड़िता को सौंप दी जाए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल एक पीड़िता को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि रेलवे जैसी सार्वजनिक संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। यह निर्णय ऐसे मामलों में पीड़ितों के अधिकारों को मजबूत करने और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

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