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नई दिल्ली। डेंगू जैसी गंभीर बीमारी के इलाज की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण शोध में पता लगाया है कि मानव शरीर की कोशिकाओं में मौजूद कुछ छोटे आरएनए अंश डेंगू वायरस को बढ़ने में मदद करते हैं, जबकि कुछ अंश वायरस की वृद्धि को रोकने की क्षमता रखते हैं। इस खोज से भविष्य में डेंगू के खिलाफ नई एंटीवायरल दवाएं विकसित करने का रास्ता खुल सकता है।
वैज्ञानिकों के इस शोध को चिकित्सा जगत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि डेंगू वायरस को सीधे निशाना बनाने वाली प्रभावी दवाओं की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। नई खोज से वैज्ञानिकों को यह समझने में सहायता मिलेगी कि डेंगू वायरस मानव कोशिकाओं के भीतर अपनी संख्या कैसे बढ़ाता है और शरीर की कौन-सी जैविक प्रक्रियाएं इस संक्रमण को प्रभावित करती हैं।
यह अध्ययन 14 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका NAR Molecular Medicine में प्रकाशित हुआ है।
एम्स के वैज्ञानिकों ने शोध में क्या पाया?
एम्स के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में टीआरएनए से बनने वाले छोटे आरएनए अंशों की भूमिका का विश्लेषण किया। इन्हें वैज्ञानिक भाषा में टीआरएनए-डिराइव्ड फ्रैगमेंट्स यानी टीआरएफ कहा जाता है।
सामान्य तौर पर टीआरएनए कोशिकाओं में प्रोटीन निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन कुछ परिस्थितियों में इसके छोटे-छोटे हिस्से भी बनते हैं, जो कोशिकाओं की विभिन्न जैविक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया कि डेंगू वायरस के संक्रमण के दौरान ऐसे छोटे आरएनए अंशों की मात्रा में बदलाव होता है। इनमें से कुछ वायरस की संख्या बढ़ाने में सहायक होते हैं, जबकि कुछ उसकी वृद्धि को सीमित करते हैं।यही खोज भविष्य में नई दवाओं के विकास के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
शरीर के छोटे आरएनए अंश निभाते हैं महत्वपूर्ण भूमिका
वैज्ञानिकों के अनुसार, शरीर की कोशिकाओं में मौजूद छोटे आरएनए अंश केवल सामान्य जैविक गतिविधियों का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वायरस के संक्रमण को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं।
डेंगू वायरस जब शरीर में प्रवेश करता है, तो वह अपनी संख्या बढ़ाने के लिए मानव कोशिकाओं की विभिन्न प्रक्रियाओं का उपयोग करता है।शोध में सामने आया कि टीआरएफ नामक कुछ आरएनए अंश इस प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकते हैं।इसके विपरीत कुछ अन्य अंश वायरस के बढ़ने की प्रक्रिया को रोकने में मदद कर सकते हैं।
इससे संकेत मिलता है कि यदि भविष्य में वैज्ञानिक इन अंशों की गतिविधियों को सुरक्षित ढंग से नियंत्रित करने में सफल होते हैं, तो वायरस की वृद्धि को सीमित करने वाली उपचार तकनीक विकसित की जा सकती है।
विशेष तकनीक से की गई आरएनए की जांच
एम्स के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में आरएनए सीक्वेंसिंग और अन्य आणविक तकनीकों का उपयोग किया।आरएनए सीक्वेंसिंग के माध्यम से वैज्ञानिक कोशिकाओं में मौजूद विभिन्न आरएनए अंशों की पहचान और उनकी मात्रा का अध्ययन कर सकते हैं।शोधकर्ताओं ने पहले उन छोटे आरएनए अंशों को पहचाना, जिनकी मात्रा डेंगू संक्रमण के दौरान बदलती है।इसके बाद चयनित अंशों की पुष्टि नॉर्दर्न ब्लॉटिंग जैसी प्रयोगशाला तकनीक से की गई।
अध्ययन में एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड्स नामक विशेष अणुओं का भी इस्तेमाल किया गया। इनकी मदद से कुछ चयनित टीआरएफ की गतिविधि को बाधित किया गया और देखा गया कि इसका डेंगू वायरस की वृद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है।
PI3K सिग्नलिंग पाथवे से जुड़ा मिला संबंध
इस शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष PI3K सिग्नलिंग पाथवे से संबंधित है।PI3K कोशिकाओं के भीतर मौजूद एक जैविक संकेत प्रणाली का हिस्सा है, जो कोशिकाओं की वृद्धि, जीवित रहने और अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है।वैज्ञानिकों ने पाया कि छोटे आरएनए अंश इस पाथवे को प्रभावित करके डेंगू वायरस की वृद्धि में बदलाव ला सकते हैं।कुछ टीआरएफ वायरस की संख्या बढ़ाने में मदद करते हैं, जबकि अन्य उसकी वृद्धि सीमित करने में भूमिका निभाते हैं।
इस जानकारी से भविष्य में ऐसी उपचार रणनीतियां तैयार करने की संभावना बनती है, जो संक्रमण के दौरान वायरस को लाभ पहुंचाने वाली कोशिकीय प्रक्रियाओं को नियंत्रित कर सकें।हालांकि, मानव शरीर में इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करते समय सामान्य कोशिकाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी बेहद जरूरी होगा।
नई दवा विकसित करने की दिशा में क्यों महत्वपूर्ण है खोज?
डेंगू के इलाज में वर्तमान समय में मरीज की स्थिति के अनुसार सहायक चिकित्सा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।डेंगू वायरस को सीधे रोकने वाली व्यापक रूप से स्थापित विशिष्ट एंटीवायरल दवा अभी उपलब्ध नहीं है।ऐसे में वैज्ञानिक उन जैविक प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास कर रहे हैं, जिनकी मदद से डेंगू वायरस शरीर में फैलता है।एम्स का नया शोध इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यदि वैज्ञानिक वायरस की वृद्धि बढ़ाने वाले छोटे आरएनए अंशों की गतिविधि रोकने या संक्रमण को सीमित करने वाले अंशों की उपयोगिता बढ़ाने में सफल होते हैं, तो भविष्य में नई दवाओं के विकास की संभावना हो सकती है।
हालांकि, अभी यह एक प्रारंभिक वैज्ञानिक खोज है। इसे मरीजों के लिए तैयार दवा या प्रमाणित उपचार नहीं माना जा सकता।
डेंगू कैसे फैलता है?
डेंगू एक वायरल संक्रमण है, जो मुख्य रूप से संक्रमित मादा एडीज मच्छर के काटने से फैलता है।यह मच्छर अक्सर दिन के समय सक्रिय रहता है और घरों तथा आसपास जमा साफ पानी में भी पनप सकता है।डेंगू होने पर मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, कमजोरी तथा त्वचा पर चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
कुछ मरीजों में संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। लगातार उल्टी, पेट में तेज दर्द, खून आना, सांस लेने में कठिनाई और अत्यधिक सुस्ती जैसे लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।
डेंगू के मरीजों को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
चिकित्सकों के अनुसार, डेंगू संक्रमण के दौरान पर्याप्त तरल पदार्थ लेना और मरीज की स्थिति पर निगरानी रखना जरूरी है।बुखार और दर्द के लिए डॉक्टर की सलाह से पैरासिटामोल का उपयोग किया जा सकता है। डेंगू में एस्पिरिन और आइबुप्रोफेन जैसी दवाओं से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इनसे रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है।
डेंगू के मरीजों को बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं या घरेलू उपचार नहीं अपनाने चाहिए।प्लेटलेट्स की संख्या के साथ मरीज की संपूर्ण चिकित्सकीय स्थिति का मूल्यांकन करना भी महत्वपूर्ण है।
डेंगू की रोकथाम भी उतनी ही जरूरी
नई दवा विकसित होने की संभावनाओं के बीच डेंगू की रोकथाम सबसे महत्वपूर्ण उपायों में शामिल है।घरों के आसपास पानी जमा न होने दें। कूलर, गमले, टंकियां और खुले बर्तनों की नियमित सफाई करें।मच्छरों से बचने के लिए पूरी बांह के कपड़े पहनें और आवश्यकता के अनुसार मच्छररोधी उपाय अपनाएं।
डेंगू से बचाव के लिए भारत में जुलाई 2026 में एक वैक्सीन को भी नियामकीय मंजूरी दी गई थी। हालांकि, टीकाकरण की पात्रता और उपलब्धता के बारे में चिकित्सकीय सलाह तथा आधिकारिक दिशानिर्देशों का पालन करना जरूरी है।
वैज्ञानिकों के सामने अब क्या है चुनौती?
एम्स की इस खोज के बाद वैज्ञानिकों के सामने अगली चुनौती इन छोटे आरएनए अंशों की भूमिका को और विस्तार से समझने की होगी।इसके लिए अतिरिक्त प्रयोगशाला अध्ययन, उपयुक्त प्रीक्लिनिकल परीक्षण और आगे चलकर आवश्यक मानव परीक्षण करने होंगे।
वैज्ञानिकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी आरएनए अंश की गतिविधि को नियंत्रित करने से वायरस की वृद्धि तो रुके, लेकिन शरीर की सामान्य कोशिकाओं पर कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
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