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नई दिल्ली। दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। डायबिटीज की निगरानी करने वाले सेंसर, ब्लड प्रेशर मॉनिटर और शरीर पर पहनकर दवा पहुंचाने वाले उपकरण मरीजों के इलाज को सुविधाजनक बना रहे हैं। लेकिन इन उपकरणों के इस्तेमाल के बाद पैदा होने वाला मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-वेस्ट) एक गंभीर वैश्विक चुनौती बनता जा रहा है। वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट (WEEE) फोरम से जुड़ी एक स्टडी के मुताबिक, संक्रमण और दूषित सामग्री से जुड़े जोखिमों की चिंता के कारण मेडिकल ई-वेस्ट का बड़ा हिस्सा रीसाइक्लिंग प्रक्रिया तक नहीं पहुंच पाता। इसके बजाय ऐसे कई उपकरणों को जला दिया जाता है, जिससे उनमें मौजूद उपयोगी इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों और कीमती सामग्रियों को दोबारा हासिल करने की संभावनाएं कम हो जाती हैं।
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में हर साल लगभग 6.2 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में यह मात्रा बढ़कर 8.2 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। यह आंकड़ा सभी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक कचरे से संबंधित है, केवल मेडिकल उपकरणों से निकलने वाले कचरे से नहीं। डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बीच मेडिकल ई-वेस्ट का सुरक्षित निपटान पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिहाज से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ रहा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल
आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। पहले जहां कई स्वास्थ्य जांचों और उपचार प्रक्रियाओं के लिए बड़े उपकरणों का इस्तेमाल होता था, वहीं अब छोटे और पोर्टेबल उपकरण भी मरीजों की निगरानी तथा इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
डायबिटीज के मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाले सेंसर, ब्लड प्रेशर मॉनिटर और शरीर पर लगाए जाने वाले ड्रग-डिलीवरी सिस्टम इसके उदाहरण हैं। इन उपकरणों से मरीजों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जुटाने और उपचार को अधिक सुविधाजनक बनाने में मदद मिलती है। हालांकि, इनके इस्तेमाल की अवधि समाप्त होने के बाद इन्हें सुरक्षित तरीके से नष्ट करना या रीसायकल करना जरूरी हो जाता है।
कई उपकरणों में बैटरी, सर्किट, इलेक्ट्रॉनिक चिप और दूसरी ऐसी सामग्री होती है, जिन्हें सामान्य घरेलू कचरे के साथ फेंकना उचित नहीं है। इन उपकरणों के सही निपटान के लिए विशेष व्यवस्था की आवश्यकता होती है, ताकि पर्यावरण को नुकसान पहुंचने और उपयोगी संसाधनों की बर्बादी को कम किया जा सके।
संक्रमण की आशंका से रीसाइक्लिंग में परेशानी
मेडिकल ई-वेस्ट को रीसायकल करने में सबसे बड़ी चुनौतियों में संक्रमण और दूषित सामग्री से जुड़े जोखिम शामिल हैं। मरीजों के शरीर के संपर्क में आने वाले कुछ उपकरणों पर जैविक पदार्थ मौजूद हो सकते हैं। ऐसे उपकरणों को बिना उचित जांच और सुरक्षित प्रसंस्करण के दोबारा इस्तेमाल करना स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
इसी कारण कई चिकित्सा उपकरणों को सामान्य इलेक्ट्रॉनिक कचरे से अलग रखना पड़ता है। पहले यह निर्धारित करना जरूरी होता है कि उपकरण किस तरह इस्तेमाल हुआ था और क्या उसमें संक्रमण का जोखिम मौजूद है। इसके बाद ही तय किया जा सकता है कि उसे सुरक्षित तरीके से खोला जा सकता है या नहीं और उसके हिस्सों को दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है या नहीं।
हालांकि, संक्रमण का जोखिम होने का मतलब यह नहीं है कि हर मेडिकल उपकरण को रीसायकल करना असंभव है। उचित वर्गीकरण, सुरक्षित सफाई और विशेषज्ञों की निगरानी में कई उपकरणों से उपयोगी सामग्री वापस प्राप्त की जा सकती है। चुनौती यह है कि ऐसी व्यवस्था सभी संबंधित संस्थानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे।
उपकरणों में मौजूद कीमती सामग्री को दोबारा हासिल करने की संभावना
‘डिजिटल हेल्थ इन सर्कुलर इकोनॉमी’ नाम की स्टडी में बताया गया कि मेडिकल उपकरणों में इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, धातु और अन्य मूल्यवान सामग्री मौजूद हो सकती है। इन्हें उचित प्रक्रिया के जरिए अलग करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन जब उपकरणों को सीधे जला दिया जाता है, तो सामग्री की रिकवरी और उपयोगी पुर्जों को दोबारा इस्तेमाल करने के अवसर सीमित हो जाते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में मौजूद कुछ धातुएं और दूसरे संसाधन नए उत्पाद बनाने में काम आ सकते हैं। इन्हें वापस प्राप्त करने से नए कच्चे माल की मांग कम करने और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिल सकती है।
इसके विपरीत, जब उपयोगी सामग्री वाले उपकरणों को बिना संसाधन रिकवरी के नष्ट किया जाता है, तो उनमें मौजूद मूल्यवान घटकों का संभावित लाभ नहीं मिल पाता। यही वजह है कि मेडिकल ई-वेस्ट के निपटान में केवल कचरा हटाने के बजाय उपयोगी संसाधनों को वापस हासिल करने की व्यवस्था पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
पांच उपकरणों की पूरी लाइफ साइकिल का मूल्यांकन
शोधकर्ताओं ने पांच मेडिकल उपकरणों की पूरी जीवनचक्र प्रक्रिया का मूल्यांकन किया। इसमें उपकरणों के निर्माण, पैकेजिंग, परिवहन और उपयोगी अवधि समाप्त होने के बाद उनके निपटान तक के चरण शामिल थे। तीन उपकरणों के मामले में स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर उनके इस्तेमाल के प्रभावों का भी अध्ययन किया गया।
इस तरह के मूल्यांकन से यह समझने में मदद मिलती है कि किसी उपकरण का पर्यावरणीय प्रभाव केवल उसके उपयोग के बाद पैदा होने वाले कचरे तक सीमित नहीं रहता। उपकरण बनाने में इस्तेमाल होने वाले संसाधन, उसकी पैकेजिंग, उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की प्रक्रिया और अंत में उसका निपटान भी कुल प्रभाव का हिस्सा हैं।
जीवनचक्र के सभी चरणों को ध्यान में रखकर उपकरणों की डिजाइन और उनके निपटान की व्यवस्था में सुधार किया जा सकता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में पांचों उपकरणों के नाम और प्रत्येक उपकरण के लिए दर्ज किए गए विशिष्ट पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
सुरक्षित निपटान और रीसाइक्लिंग पर जोर जरूरी
मेडिकल ई-वेस्ट की समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य संस्थानों, उपकरण निर्माताओं और कचरा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। इस्तेमाल किए गए उपकरणों को अलग से एकत्र करना, उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करना और संक्रमण संबंधी जोखिमों की जांच करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
इसके साथ ही, ऐसी तकनीकों और प्रक्रियाओं को अपनाने की आवश्यकता है, जिनसे मरीजों की सुरक्षा से समझौता किए बिना उपयोगी सामग्री को वापस प्राप्त किया जा सके। उपकरणों की मरम्मत, उनके सुरक्षित पुर्जों का पुनः उपयोग और उपयुक्त रीसाइक्लिंग प्रक्रिया कचरे की मात्रा कम करने में मदद कर सकती है।
कुल मिलाकर, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में सुविधाएं बढ़ा रहा है, लेकिन इसके साथ मेडिकल ई-वेस्ट के सुरक्षित निपटान की चुनौती भी गंभीर होती जा रही है। WEEE फोरम से जुड़ी स्टडी इस बात को रेखांकित करती है कि संक्रमण संबंधी सावधानियों के साथ रीसाइक्लिंग और संसाधन रिकवरी पर ध्यान देना जरूरी है। उचित व्यवस्था विकसित होने से पर्यावरणीय जोखिम घटाने और कीमती सामग्रियों को दोबारा इस्तेमाल में लाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।





