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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने रामलीला और अन्य सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सार्वजनिक मैदानों के आवंटन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक मैदानों का आवंटन केवल 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति के आधार पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट का मानना है कि यह व्यवस्था सभी आवेदकों को समान अवसर देने की संवैधानिक आवश्यकता को अपने आप पूरा नहीं करती। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 8 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) को मौजूदा नियमों की समीक्षा करने और मैदानों के आवंटन के लिए व्यापक वार्षिक दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक संपत्तियों का आवंटन निष्पक्ष, पारदर्शी और तर्कसंगत प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। केवल यह तथ्य कि किसी व्यक्ति या संस्था ने सबसे पहले आवेदन किया है, उसे सार्वजनिक मैदान के इस्तेमाल का सबसे मजबूत अधिकार नहीं देता।अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी संसाधनों के आवंटन में सभी पात्र आवेदकों को समान अवसर मिलना जरूरी है। यदि किसी मैदान की उपलब्धता की जानकारी कुछ लोगों को दूसरों से पहले मिल जाती है, तो वे आवेदन करने में बढ़त हासिल कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में आवंटन प्रक्रिया भले ही देखने में समान लगे, लेकिन व्यवहार में यह सभी के लिए निष्पक्ष नहीं होगी।
पहले आवेदन करने वाले को प्राथमिकता देना जरूरी नहीं
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने अपने फैसले में कहा कि किसी मानदंड का निश्चित होना और उसका तर्कसंगत होना दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत के अनुसार, केवल आवेदन की तारीख और समय का स्पष्ट रिकॉर्ड होना किसी नीति को संवैधानिक रूप से उचित नहीं बनाताकोर्ट ने माना कि 'पहले आओ, पहले पाओ' की नीति पहली नजर में एक स्पष्ट व्यवस्था लग सकती है, लेकिन इसके जरिए आवेदकों के बीच असमान प्रतिस्पर्धा पैदा होने की आशंका रहती है।विशेष रूप से तब, जब आवेदन प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी और मैदान की उपलब्धता सार्वजनिक रूप से पहले से घोषित नहीं की गई हो। ऐसी परिस्थिति में प्रशासनिक जानकारी तक पहले पहुंच रखने वाली संस्था को अनुचित लाभ मिल सकता है।
रामलीला आयोजन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई
यह मामला रेज ऑफ न्यू बिगिनिंग फाउंडेशन की ओर से दाखिल याचिका से संबंधित था। संस्था ने दिल्ली के राजा गार्डन स्थित शिवाजी प्लेस के चंक-सी मैदान में रामलीला और दशहरा महोत्सव आयोजित करने के लिए आवेदन किया था।मैदान आवंटन के आवेदन को स्वीकार नहीं किए जाने के बाद संस्था ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिका में आवंटन प्रक्रिया और संबंधित प्रशासनिक फैसले पर सवाल उठाए गए थे।मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने केवल एक संस्था के आवेदन तक सीमित रहने के बजाय सार्वजनिक मैदानों के आवंटन की व्यापक प्रक्रिया पर भी विचार किया।
DUSIB को नए दिशानिर्देश बनाने का निर्देश
अदालत ने दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड को मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि रामलीला और इसी प्रकार के सांस्कृतिक तथा धार्मिक आयोजनों के लिए सार्वजनिक मैदानों का आवंटन करने संबंधी व्यापक दिशानिर्देश हर साल तैयार किए जाने चाहिए।इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य आवेदन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना है। इससे विभिन्न संस्थाओं को सार्वजनिक मैदानों के उपयोग के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।अदालत की टिप्पणी से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकारी संस्थाओं को केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर आवंटन की नीति नहीं बनानी चाहिए। ऐसी नीतियों में संवैधानिक समानता और तर्कसंगतता के सिद्धांतों का भी पालन होना चाहिए।
पुराने आयोजकों की प्राथमिकता पर भी सवाल
हाई कोर्ट ने सार्वजनिक मैदानों के आवंटन में पूर्व आयोजकों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर भी विचार किया।अदालत के अनुसार, केवल पूर्व में किसी मैदान पर आयोजन करने के आधार पर किसी संस्था को अनिश्चितकाल तक प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। आवंटन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें अन्य पात्र संस्थाओं को भी उचित अवसर मिल सके।सार्वजनिक मैदान सरकारी नियंत्रण में आने वाले संसाधन हैं। इसलिए इनके उपयोग की अनुमति देते समय प्रशासन को निष्पक्ष मानदंड अपनाने चाहिए।
धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों पर पड़ेगा असर
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला राजधानी में आयोजित होने वाली रामलीला, दशहरा महोत्सव और अन्य सांस्कृतिक तथा धार्मिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।दिल्ली में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन सार्वजनिक मैदानों में कार्यक्रम आयोजित करते हैं। ऐसे आयोजनों के लिए प्रशासन से अनुमति और मैदान का आवंटन प्राप्त करना आवश्यक होता है।अदालत के निर्देश के बाद संबंधित अधिकारियों को भविष्य की आवंटन प्रक्रिया में पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए नियमों की समीक्षा करनी होगी।फिलहाल हाई कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन में केवल सबसे पहले आवेदन करना पर्याप्त आधार नहीं है। प्रशासनिक फैसलों का निष्पक्ष, पारदर्शी और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होना भी जरूरी है।
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