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सुप्रीम कोर्ट सख्त: पत्रकारों पर हमले पर दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब
Tara Tandi
13 Oct 2026 3:56 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन आरोपों पर गंभीरता से संज्ञान लिया कि राष्ट्रीय राजधानी में विरोध प्रदर्शनों को कवर कर रही महिला पत्रकारों के साथ पुलिसकर्मियों ने मारपीट की। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को गुरुवार को सुनवाई के दौरान मौजूद रहने और मामले की जानकारी देने का निर्देश दिया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने यह टिप्पणी तब की जब वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने 'नेटवर्क ऑफ विमेन इन मीडिया, इंडिया' (NWMI) द्वारा दायर एक याचिका का ज़िक्र किया। इस याचिका में विरोध प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों, खासकर महिला पत्रकारों की सुरक्षा की मांग की गई थी।
CJI कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, "हम चाहेंगे कि कोई वरिष्ठ अधिकारी यहां मौजूद रहे और मामले को समझाए।" इससे संकेत मिला कि पुलिस को इन आरोपों पर सफाई देनी होगी।
यह घटनाक्रम उन आरोपों के बीच सामने आया है जिनमें कहा गया है कि 10 और 11 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को कवर कर रहे पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई, उन्हें हिरासत में लिया गया और उनके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डाली गई।
वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने भी अदालत की अवमानना की एक अलग याचिका का ज़िक्र किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के 10 अक्टूबर के आदेश का उल्लंघन करते हुए पत्रकारों के साथ मारपीट की।
शीर्ष अदालत ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि वकील, पत्रकार और अन्य पेशेवर अपने पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में किसी बाधा का सामना न करें।
ये निर्देश जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिए थे। इन याचिकाओं में प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले लगाए गए प्रतिबंधों से संबंधित आदेश के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था।
अदालत ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया था कि वे मेट्रो और रेलवे सेवाओं के सामान्य कामकाज, बिना रुकावट इंटरनेट कनेक्टिविटी और लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करें, बशर्ते कि वे ट्रैफिक नियमों और सार्वजनिक व्यवस्था की ज़रूरतों का पालन करें।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना किसी को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, खासकर उन इलाकों के बाहर शांतिपूर्ण और निहत्थे जमावड़ों के मामले में जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी।
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