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दिल्ली दंगा मामलों में स्वतंत्र जांच की मांग हाईकोर्ट ने ठुकराई

Ratna Netam
5 Oct 2026 5:29 PM IST
दिल्ली दंगा मामलों में स्वतंत्र जांच की मांग हाईकोर्ट ने ठुकराई
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नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग करने वाली याचिकाओं के एक समूह को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि उसके समक्ष ऐसा कोई ठोस आधार या सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि दिल्ली पुलिस की जांच इतनी समझौतावादी, पक्षपातपूर्ण या विश्वसनीयता से रहित थी कि उसे किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपना आवश्यक हो।न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति मनोज जैन की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी जांच को एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी को स्थानांतरित करना सामान्य प्रक्रिया नहीं है। ऐसा आदेश केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है, जब उपलब्ध सामग्री स्पष्ट रूप से यह दर्शाए कि मौजूदा जांच निष्पक्ष नहीं है या उससे गंभीर रूप से समझौता किया गया है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश किए गए तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर यह स्थापित नहीं होता कि दिल्ली पुलिस की पूरी जांच व्यवस्था निष्पक्ष जांच करने में विफल रही है। पीठ ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी के खिलाफ कुछ आरोप या कुछ अधिकारियों के कथित आचरण के आधार पर पूरी जांच प्रक्रिया को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने दंगों के दौरान कुछ पुलिस अधिकारियों के कथित कदाचार और निष्क्रियता का मुद्दा उठाया था। इस पर अदालत ने कहा कि यदि किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाए जाते हैं, तो केवल उसी आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरी दिल्ली पुलिस निष्पक्ष जांच करने में अक्षम है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार का निष्कर्ष निकालने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होते हैं।
याचिकाओं में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) या विशेष जांच दल (SIT), को सौंपने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि स्वतंत्र एजेंसी से जांच होने पर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सकेगी। हालांकि अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जांच का स्थानांतरण केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाता है। अदालत ने कहा कि न्यायिक मिसालों के अनुसार किसी जांच एजेंसी को बदलने का आदेश तभी दिया जा सकता है, जब यह स्पष्ट हो कि वर्तमान जांच एजेंसी निष्पक्ष जांच करने में पूरी तरह विफल रही है या जांच से गंभीर रूप से समझौता हुआ है।
इसके अलावा अदालत ने उन याचिकाओं को भी राहत देने से इनकार कर दिया, जिनमें कुछ राजनीतिक नेताओं के खिलाफ कथित भड़काऊ या घृणास्पद भाषणों को लेकर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।इस मुद्दे पर अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जिन सामग्रियों पर भरोसा किया गया, उनमें मुख्य रूप से भाषणों के प्रतिलेख, वीडियो रिकॉर्डिंग, समाचार पत्रों की कतरनें और विभिन्न मीडिया रिपोर्टें शामिल थीं। अदालत ने पाया कि कई मामलों में भाषणों के केवल कुछ हिस्से या अंश ही रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किए गए थे। ऐसे में संपूर्ण संदर्भ के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
पीठ ने कहा कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत सामग्री के आधार पर किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देना न्यायोचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी माना कि किसी भाषण का मूल्यांकन उसके पूरे संदर्भ और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, न कि केवल चुनिंदा अंशों के आधार पर।2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में कई लोगों की जान गई थी और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। इसके अलावा सार्वजनिक और निजी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुंचा था। दंगों के बाद दिल्ली पुलिस ने अनेक मामलों में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की थी और कई आरोपपत्र भी अदालतों में दाखिल किए गए।
इन घटनाओं के बाद विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों की ओर से दिल्ली उच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें स्वतंत्र जांच, कथित पुलिस कदाचार की जांच और कुछ राजनीतिक नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग शामिल थी।अपने ताजा फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अदालत का दायित्व उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लेना है। यदि जांच एजेंसी को बदलने जैसी असाधारण राहत दी जानी हो तो उसके लिए अत्यंत मजबूत और विश्वसनीय आधार आवश्यक होता है। इस मामले में अदालत को ऐसा कोई आधार नहीं मिला।
अदालत ने यह भी दोहराया कि न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होता है और केवल आरोपों के आधार पर जांच एजेंसी बदलना उचित नहीं माना जा सकता। जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप तभी किया जाना चाहिए जब उसके लिए पर्याप्त कानूनी और तथ्यात्मक आधार मौजूद हों।इस प्रकार दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वतंत्र जांच की मांग वाली सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री दिल्ली पुलिस की जांच को किसी अन्य एजेंसी को स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। साथ ही अदालत ने राजनीतिक नेताओं के खिलाफ कथित भड़काऊ भाषणों के मामले में एफआईआर दर्ज कराने संबंधी मांग को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
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