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विवादित कॉल रिकॉर्डिंग की होगी फॉरेंसिक जांच हाई कोर्ट का आदेश
Ratna Netam
7 Oct 2026 2:21 PM IST

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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक विवादित फोन कॉल रिकॉर्डिंग की सत्यता जांचने के लिए उसे सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL) भेजने का निर्देश दिया है। यह मामला रियल एस्टेट कंपनी BPTP लिमिटेड और नितिन नरेश समेत अन्य पक्षों से जुड़े विवाद का है। रिकॉर्डिंग को लेकर नरेश ने दावा किया है कि इसमें सुनाई दे रही आवाज उनकी वास्तविक आवाज नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किया गया वॉयस क्लोन हो सकती है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वैज्ञानिक जांच को जरूरी माना है।
जस्टिस तुषार राव गेडेला की अदालत ने BPTP लिमिटेड की ओर से दाखिल एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। कंपनी ने अपनी अर्जी में आरोप लगाया कि प्रतिवादियों ने अदालत के 3 सितंबर के पूर्व आदेश का जानबूझकर उल्लंघन किया है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक फोन रिकॉर्डिंग भी पेश की गई, जिसकी अवधि करीब 12 मिनट बताई गई है।
BPTP की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राजीव नायर ने अदालत को बताया कि पूर्व आदेश के बाद नितिन नरेश ने कथित रूप से कंपनी के अधिकृत प्रतिनिधि जय शंकर से बातचीत की थी। कंपनी की ओर से आरोप लगाया गया कि बातचीत का स्वरूप पैसे की मांग करने वाली कथित रंगदारी कॉल जैसा था। इसी आधार पर कंपनी ने दावा किया कि यह बातचीत हाई कोर्ट के पहले दिए गए आदेश का उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से लगभग 12 मिनट की रिकॉर्डिंग अदालत के समक्ष चलाई गई। साथ ही अदालत से अनुरोध किया गया कि कथित अवमानना के संबंध में उचित कार्रवाई की जाए। हालांकि नितिन नरेश की ओर से रिकॉर्डिंग की सत्यता पर सवाल उठाए गए। उन्होंने ऐसी किसी बातचीत से इनकार करते हुए कहा कि रिकॉर्डिंग में उनकी आवाज को AI तकनीक के जरिए क्लोन या मॉड्यूलेट किया गया हो सकता है।
नरेश की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाने से पहले उसकी प्रामाणिकता स्थापित किया जाना जरूरी है। उनकी तरफ से अदालत से रिकॉर्डिंग को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने का अनुरोध किया गया, ताकि वैज्ञानिक तरीके से यह पता लगाया जा सके कि रिकॉर्डिंग वास्तविक है या उसमें किसी तकनीक के जरिए बदलाव किया गया है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि आवेदन में लगाए गए आरोपों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले रिकॉर्डिंग की सच्चाई और विश्वसनीयता की जांच आवश्यक है। अदालत ने इसी आधार पर विवादित रिकॉर्डिंग की फॉरेंसिक जांच कराने का फैसला किया।
अदालत ने निर्देश दिया कि रिकॉर्डिंग को एक पेन ड्राइव में सुरक्षित कर दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सौंपा जाए। इसके बाद पेन ड्राइव को सील कर नई दिल्ली स्थित CBI मुख्यालय से संबद्ध CFSL को भेजा जाएगा। कोर्ट ने CFSL के निदेशक से मामले को प्राथमिकता देते हुए रिकॉर्डिंग की वैज्ञानिक जांच करने को कहा है।
हाई कोर्ट ने CFSL को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट तैयार कर रजिस्ट्रार जनरल को सौंपे। रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने पेश किया जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे यह तय करने में मदद मिलेगी कि रिकॉर्डिंग वास्तविक है या तकनीकी रूप से उसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ की गई है।
मामले की सुनवाई के दौरान नितिन नरेश ने स्वेच्छा से कहा कि उनके खिलाफ इस विषय में कोई बयान न देने का आदेश पारित किया जा सकता है। अदालत ने उनके इस बयान को स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई तक मामले से जुड़े विषय पर चुप्पी बनाए रखने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 2 नवंबर को निर्धारित की गई है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अदालत के सामने सीधे तौर पर यह सवाल आया है कि किसी विवादित डिजिटल रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज वास्तविक है या AI आधारित वॉयस क्लोन। अब CFSL की वैज्ञानिक जांच इस विवाद में अहम भूमिका निभाएगी। फिलहाल हाई कोर्ट ने रिकॉर्डिंग की सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला है और आरोपों की पुष्टि भी नहीं की है। अदालत ने पहले तकनीकी जांच कर तथ्य स्पष्ट करने का रास्ता अपनाया है।
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