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गुजरात मॉडल से राष्ट्रीय जल प्रबंधन तक स्टडी में चार बड़े सबक
Ratna Netam
7 Oct 2026 2:18 PM IST

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नई दिल्ली। भारत में जल प्रबंधन के क्षेत्र में पिछले 25 वर्षों में हुए बदलावों और सुधारों को लेकर एक नई केस स्टडी सामने आई है। **‘गुजरात से भारत: दुनिया के लिए पानी से जुड़े सबक’** नाम की इस स्टडी में वर्ष 2001 से गुजरात में शुरू हुए जल प्रबंधन सुधारों से लेकर उनके राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार तक की यात्रा का विस्तृत उल्लेख किया गया है। अध्ययन में यह समझाने की कोशिश की गई है कि किस तरह स्थानीय स्तर पर शुरू किए गए प्रयास बड़े पैमाने पर जल प्रबंधन की नीतियों और कार्यक्रमों के लिए आधार बन सकते हैं।
इस केस स्टडी में जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर **डैनियल डब्ल्यू. स्मिथ** एक महत्वपूर्ण अकादमिक साझेदार के रूप में जुड़े हैं। स्मिथ ने इस अध्ययन को **नितिन बस्सी** और **परमेश्वरन अय्यर** के साथ मिलकर तैयार किया है। केस स्टडी को जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी और गेट्स फाउंडेशन की ओर से प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन में भारत की जल प्रबंधन यात्रा को केवल बुनियादी ढांचे के विकास तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि शासन व्यवस्था, समुदाय की भूमिका, संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और राजनीतिक स्तर पर लिए गए फैसलों को भी महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें बताया गया है कि पानी जैसी बुनियादी जरूरत से जुड़ी चुनौती का समाधान केवल नई परियोजनाएं शुरू करने से नहीं होता, बल्कि लंबे समय तक प्रभावी व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई स्तरों पर एक साथ काम करना जरूरी होता है।
केस स्टडी में वर्ष 2001 से गुजरात में किए गए जल प्रबंधन सुधारों को इस यात्रा की शुरुआत के रूप में देखा गया है। इसके बाद इन प्रयासों से मिले अनुभवों और मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाने की दिशा में काम हुआ। अध्ययन में इस बात पर ध्यान दिया गया है कि स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक तैयार किए गए समाधान किस तरह बड़े क्षेत्र और राष्ट्रीय स्तर की नीतियों में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
इस अध्ययन का एक प्रमुख पहलू ग्लोबल साउथ के देशों के लिए बताए गए चार अहम सबक हैं। पहला सबक **मजबूत गवर्नेंस** से जुड़ा है। अध्ययन के अनुसार जल प्रबंधन की किसी भी योजना की सफलता के लिए संस्थागत ढांचा मजबूत होना जरूरी है। योजनाएं बनाने के साथ-साथ उनकी निगरानी, जवाबदेही और क्रियान्वयन की व्यवस्था भी प्रभावी होनी चाहिए।
दूसरा बड़ा सबक **जल-संसाधनों के एकीकृत प्रबंधन** से जुड़ा है। अध्ययन का जोर इस बात पर है कि जल प्रबंधन को अलग-अलग परियोजनाओं के रूप में देखने की बजाय उपलब्ध जल स्रोतों, आपूर्ति, संरक्षण और उपयोग को एक समग्र व्यवस्था के रूप में समझा जाना चाहिए। इससे संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के साथ योजनाओं के बीच समन्वय मजबूत किया जा सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु **समुदाय की भागीदारी और ओनरशिप** है। केस स्टडी में कहा गया है कि जल प्रबंधन के प्रयासों को टिकाऊ बनाने के लिए स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। जब समुदाय किसी योजना को केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि अपनी व्यवस्था के रूप में अपनाता है तो उसके लंबे समय तक सफल रहने की संभावना बढ़ जाती है। स्थानीय भागीदारी से जरूरतों की बेहतर पहचान और संसाधनों के सही उपयोग में भी मदद मिल सकती है।
चौथा सबक **राजनीतिक इच्छाशक्ति और पर्याप्त फंडिंग के साथ बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन** से जुड़ा है। अध्ययन के अनुसार किसी सफल मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए केवल नीतिगत घोषणा पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए राजनीतिक स्तर पर लगातार समर्थन, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था जरूरी होती है। इन्हीं तत्वों के आधार पर छोटे स्तर पर सफल प्रयासों को बड़े भूभाग और बड़ी आबादी तक पहुंचाया जा सकता है।
केस स्टडी में भारत के अनुभवों को ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बताया गया है। कई विकासशील देशों में जल उपलब्धता, वितरण, संरक्षण और प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे में भारत में पिछले 25 वर्षों के दौरान सामने आए अनुभव उन देशों के लिए उपयोगी संदर्भ बन सकते हैं जो अपने यहां जल प्रबंधन व्यवस्था में व्यापक सुधार करना चाहते हैं।
अध्ययन का मुख्य संदेश यह है कि जल संकट का समाधान केवल तकनीकी उपायों में नहीं खोजा जा सकता। इसके लिए बेहतर शासन, संसाधनों का समन्वित प्रबंधन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और राजनीतिक-आर्थिक समर्थन को एक साथ आगे बढ़ाना जरूरी है। इन सभी पहलुओं के बीच तालमेल होने पर ही बड़े स्तर पर बदलाव संभव है।
‘गुजरात से भारत: दुनिया के लिए पानी से जुड़े सबक’ केस स्टडी भारत की जल प्रबंधन यात्रा को एक दीर्घकालिक प्रक्रिया के रूप में पेश करती है। इसमें गुजरात में शुरू हुए सुधारों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे प्रयासों के जरिए यह दिखाया गया है कि निरंतर नीति, स्थानीय भागीदारी और प्रभावी क्रियान्वयन के जरिए जल प्रबंधन में बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। साथ ही यह अध्ययन विकासशील देशों के लिए भी एक व्यापक संदेश देता है कि पानी से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए मजबूत व्यवस्था और समाज की भागीदारी दोनों जरूरी हैं।
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