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कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पड़ी भारीअधिशासी अभियंता पर हाईकोर्ट ने लगाया हर्जाना

Ratna Netam
7 Aug 2026 10:03 PM IST
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पड़ी भारीअधिशासी अभियंता पर हाईकोर्ट ने लगाया हर्जाना
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प्रयागराज : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के जौनपुर स्थित अधिशासी अभियंता के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उन पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। अदालत ने यह कार्रवाई एक उपभोक्ता को बार-बार अनावश्यक नोटिस जारी कर परेशान करने और न्यायालय के पूर्व आदेशों की अवहेलना करने पर की। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सरकारी अधिकारियों को अपने अधिकारों का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर करना चाहिए और किसी भी उपभोक्ता को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।
मामला जौनपुर की **ओम फूड मैन्युफैक्चरिंग सेंटर** नामक कंपनी से जुड़ा है, जिसने अपने व्यावसायिक बिजली कनेक्शन को लेकर बिजली निगम की कार्रवाई के खिलाफ कई बार इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी का कहना था कि उसने नियमानुसार अपने बिजली कनेक्शन का लोड बढ़वाया था और निगम की ओर से मीटर भी लगाया गया था। इसके बावजूद करीब दो वर्ष बाद बिजली विभाग ने बिलिंग में कथित त्रुटि बताते हुए 54 लाख रुपये से अधिक की अतिरिक्त राशि का नोटिस भेज दिया।
कंपनी ने इस मांग को पूरी तरह अनुचित बताते हुए अदालत का रुख किया। उसका कहना था कि यदि लोड बढ़ाने या मीटर लगाने में कोई तकनीकी या प्रशासनिक गलती हुई भी है तो वह बिजली विभाग की जिम्मेदारी है, उपभोक्ता की नहीं। ऐसे में वर्षों बाद भारी-भरकम बिल थोपना न्यायसंगत नहीं है।
इस मामले में 6 मई 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि यदि बिजली विभाग से बिलिंग में कोई त्रुटि हुई है तो वह नियमानुसार उसे सुधार सकता है और संशोधित मांग भी जारी कर सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर बिजली कनेक्शन काटने जैसी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया था कि उपभोक्ता को कानून के अनुसार उचित अवसर और न्यायसंगत प्रक्रिया का लाभ मिलना चाहिए।
इसके बावजूद बिजली निगम ने अपने रवैये में बदलाव नहीं किया। पहले लगभग 2.93 लाख रुपये की मांग का नोटिस जारी किया गया, फिर 54.14 लाख रुपये का नया नोटिस भेजा गया और बाद में 5.44 लाख रुपये की एक और मांग उपभोक्ता के सामने रख दी गई। हर बार कंपनी को अदालत की शरण लेनी पड़ी और हर बार सुनवाई के दौरान बिजली निगम ने संबंधित नोटिस वापस ले लिया। इस क्रम ने अदालत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि विभाग बिना ठोस आधार के बार-बार नोटिस जारी कर उपभोक्ता को परेशान कर रहा है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लिया। न्यायालय ने कहा कि बिना किसी नए तथ्य या ठोस कारण के लगातार अलग-अलग मांग पत्र जारी करना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि यह न्यायालय के आदेशों की भावना के भी विपरीत है। अदालत ने इसे न्यायिक आदेश की "अवमाननापूर्ण अवहेलना" करार दिया और कहा कि सरकारी अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे न्यायालय के निर्देशों का पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ पालन करें।
जब न्यायालय ने बिजली निगम की ओर से उपस्थित अधिवक्ता से पूछा कि बार-बार नोटिस जारी करने का आधार क्या था, तब कोई संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इस पर न्यायमूर्ति प्रकाश पाड़िया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने संबंधित अधिशासी अभियंता के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए प्रारंभिक तौर पर 5 लाख रुपये का हर्जाना लगाने का निर्णय लिया।
हालांकि बाद में वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा दायर अनुरोध और प्रस्तुत तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने हर्जाने की राशि घटाकर 25 हजार रुपये कर दी। न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह राशि दो सप्ताह के भीतर संबंधित उपभोक्ता को अदा की जाए। यदि निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं किया जाता है तो जौनपुर के जिलाधिकारी इस राशि की वसूली भू-राजस्व की तरह करेंगे।
इस फैसले को उपभोक्ता अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने अपने आदेश के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी विभागों द्वारा मनमाने ढंग से नोटिस जारी कर नागरिकों और उपभोक्ताओं को परेशान करना स्वीकार्य नहीं है। साथ ही, न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह भी ठहराया जा सकता है। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
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