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शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा के बीच बढ़ी कूटनीतिक हलचल

Kavita2
10 Sept 2026 10:03 AM IST
शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा के बीच बढ़ी कूटनीतिक हलचल
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नई दिल्ली। दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति को लेकर भारत और चीन के बीच महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समझौते की संभावना बन रही है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को देखते हुए दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बातचीत तेज होने की खबर है। सूत्रों के मुताबिक, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति से संबंधित प्रस्तावित समझौते की रूपरेखा को अंतिम रूप देने की दिशा में काम चल रहा है। यदि दोनों देशों के बीच सहमति बनती है तो यह भारत के लिए रणनीतिक और औद्योगिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।

दुर्लभ खनिज आधुनिक उद्योगों और तकनीकी क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा उपकरण और हाईटेक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में इनकी जरूरत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में इन खनिजों की स्थिर और भरोसेमंद आपूर्ति भारत की आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल है।

शी जिनपिंग की संभावित यात्रा के बीच बढ़ी हलचल

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच 12 सितंबर की शाम द्विपक्षीय वार्ता प्रस्तावित है। इस बातचीत में दोनों देशों के बीच संबंधों से जुड़े विभिन्न मुद्दों के साथ दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति का विषय भी प्रमुखता से उठ सकता है।

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 11 सितंबर को द्विपक्षीय वार्ता होने की जानकारी है। दोनों नेताओं की बैठक में द्विपक्षीय संबंधों के साथ व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

एक ही अवधि में भारत का चीन और रूस के शीर्ष नेतृत्व के साथ उच्चस्तरीय संवाद होना वैश्विक और क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दुर्लभ खनिजों पर क्यों है भारत की नजर

दुर्लभ खनिजों को लेकर दुनियाभर में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। आधुनिक तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था में इनका महत्व तेजी से बढ़ा है। इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाली बैटरी से लेकर पवन ऊर्जा संयंत्रों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और रक्षा क्षेत्र के कई उत्पादों के निर्माण में दुर्लभ खनिजों की आवश्यकता होती है।

भारत तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, अक्षय ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में इन खनिजों की मांग आने वाले वर्षों में और बढ़ने की संभावना है। आपूर्ति श्रृंखला में किसी तरह का व्यवधान उद्योगों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।

इसी वजह से भारत विभिन्न देशों के साथ दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। चीन के साथ संभावित समझौते को भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

चीन की भूमिका महत्वपूर्ण

दुर्लभ खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। खनिजों के खनन से लेकर उनके प्रसंस्करण और विभिन्न औद्योगिक उपयोगों तक चीन की मजबूत स्थिति है। ऐसे में भारत के लिए चीन के साथ आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करना महत्वपूर्ण है।

प्रस्तावित समझौते से यदि भारत को दुर्लभ खनिजों की नियमित और स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित होती है तो इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा और रक्षा से जुड़े उद्योगों को लाभ मिल सकता है।

हालांकि किसी भी समझौते के अंतिम स्वरूप में आपूर्ति की मात्रा, गुणवत्ता, कीमत, निर्यात व्यवस्था और अन्य तकनीकी शर्तें महत्वपूर्ण होंगी। इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहमति बनना जरूरी होगा।

उद्योगों को मिल सकती है राहत

भारत में इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी निर्माण का क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। इसके अलावा सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इन क्षेत्रों के विस्तार के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है।

यदि दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति सुचारु रहती है तो घरेलू उद्योगों के लिए उत्पादन योजना बनाना आसान हो सकता है। इससे आयात से जुड़ी अनिश्चितता कम करने में भी मदद मिल सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दीर्घकालिक आपूर्ति व्यवस्था से भारत की रणनीतिक और औद्योगिक जरूरतों को मजबूती मिल सकती है। हालांकि इसके साथ भारत को घरेलू स्तर पर खनिजों की खोज, खनन और प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने पर भी जोर देना होगा।

बातचीत में कई अन्य मुद्दे भी रहेंगे

प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक केवल दुर्लभ खनिजों तक सीमित नहीं रहने वाली है। दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है।

भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में कई जटिल मुद्दे रहे हैं। सीमा से जुड़े विषयों के साथ व्यापार और आर्थिक संबंध भी दोनों देशों के बीच बातचीत के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। ऐसे में दोनों नेताओं की मुलाकात को व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

दुर्लभ खनिजों पर संभावित समझौता दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के एक नए क्षेत्र को भी आगे बढ़ा सकता है।

रूस के साथ भी अहम बातचीत

प्रधानमंत्री मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 11 सितंबर को होने वाली प्रस्तावित द्विपक्षीय वार्ता भी महत्वपूर्ण होगी। भारत और रूस के बीच लंबे समय से रक्षा, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में संबंध रहे हैं।

दोनों नेताओं की बातचीत में द्विपक्षीय सहयोग के अलावा वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर भी चर्चा संभव है। रूस के साथ भारत के रणनीतिक संबंधों को देखते हुए यह बैठक कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत की रणनीति में आपूर्ति सुरक्षा अहम

दुर्लभ खनिजों को लेकर भारत की मौजूदा रणनीति का प्रमुख उद्देश्य आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाना और किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम करना है। चीन के साथ संभावित समझौता तत्काल जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्तर पर भारत को घरेलू उत्पादन और प्रसंस्करण क्षमता भी विकसित करनी होगी।

इस दिशा में खनिज संसाधनों की खोज, नई तकनीक, रीसाइक्लिंग और मित्र देशों के साथ साझेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है।

फिलहाल नजरें 12 सितंबर को होने वाली प्रस्तावित मोदी-जिनपिंग वार्ता पर टिकी हैं। यदि दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति बनती है तो इसका असर भारत के इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और हरित ऊर्जा क्षेत्रों पर पड़ सकता है। साथ ही यह समझौता भारत-चीन आर्थिक संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत भी दे सकता है।

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