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दिल्ली हाई कोर्ट की 'वैवाहिक बलात्कार' पर टिप्पणी, जानिए क्या कहा

Renuka Sahu
20 Jan 2022 1:18 AM GMT
दिल्ली हाई कोर्ट की वैवाहिक बलात्कार पर टिप्पणी, जानिए क्या कहा
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फाइल फोटो 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि भारतीय दंड संहिता की पूर्ववर्ती धारा 377 और बलात्कार कानून में विसंगति थी जो एक पति को अपनी पत्नी के साथ बिना सहमति के यौन संबंध बनाने समेत अप्राकृतिक यौन संबंध के खिलाफ अभियोजन से संरक्षण देती है.

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की पूर्ववर्ती धारा (Preceding Clause) 377 और बलात्कार कानून में विसंगति थी जो एक पति को अपनी पत्नी के साथ बिना सहमति के यौन संबंध बनाने समेत अप्राकृतिक यौन संबंध (Unnatural Sex) के खिलाफ अभियोजन (Prosecution) से संरक्षण देती है. इस धारा को उच्चतम न्यायालय ने 2018 में अपराध की श्रेणी से हटा दिया था.

धारा 375 और धारा 377 में विसंगति का जिक्र
उच्च न्यायालय ने उन याचिकाओं (Petitions) पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की जिनमें वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को अपराध (Crime) की श्रेणी में रखने का अनुरोध किया गया है. न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की पीठ (Bench) बृहस्पतिवार को भी इस मामले पर सुनवाई जारी रखेगी. सुनवाई (Hearing) के दौरान न्यायमूर्ति शकधर ने कहा, 'आईपीसी की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध के लिए सजा) को अपराधमुक्त (Acquitted) किए जाने से पहले, मैं विषमलैंगिक जोड़ों (Heterosexual Couples) के बारे में बात कर रहा हूं, क्या धारा 375 और धारा 377 में विसंगति (Discrepancy) नहीं थी. विडंबना यह है कि सुखी वैवाहिक जीवन में यह जारी रहा और किसी ने शिकायत नहीं की.'
'सहमति है तो यह बलात्कार नहीं'
न्यायाधीश ने कहा, 'इस तथ्य के बावजूद कि आप्रकृतिक यौन संबंध (Unnatural Sex) भी यौन क्रिया का हिस्सा है और इसलिए अगर इसमें सहमति है तो यह बलात्कार (Rape) नहीं है. लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले से पहले धारा 377 की विसंगति प्रभावी रही.' आईपीसी की धारा 375 में दिए गए अपवाद (Exception) के तहत, अपनी पत्नी के साथ एक पुरुष द्वारा यौन संबंध या यौन क्रिया, पत्नी की उम्र 15 वर्ष से कम नहीं होने की सूरत में बलात्कार नहीं है.
वरिष्ठ वकीलों ने क्या कहा ?
अदालत (Court) की टिप्पणी पर न्यायमित्र और वरिष्ठ वकील (Senior Advocate) रेबेका जॉन ने कहा कि इस पर आईपीसी की धारा 377 लागू नहीं होती. जॉन ने कहा, 'अगर हम एक अपवाद (Exception) को देखते हैं तो हम एक विसंगति (Discrepancy) को हावी नहीं होने दे सकते.' इससे पहले मंगलवार को सुनवाई के दौरान अन्य न्यायमित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने अदालत से कहा था कि विवाह संस्था (Marriage Institution) की रक्षा और दुरुपयोग की आशंका वैवाहिक बलात्कार को भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपवाद मानने का आधार नहीं हो सकते. न्याय मित्र के रूप में अदालत का सहयोग कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने कहा कि पहले भी आपराधिक मामलों (Criminal Cases) के दुरुपयोग की आशंका रही है और विवाह संस्था की रक्षा के लिए कानून (Laws) भी रहे हैं लेकिन पत्नियों को कम गंभीर प्रकृति के यौन अपराधों समेत किसी अपराध के लिए पतियों के खिलाफ अभियोजन चलाने की शक्ति (Power to Prosecute) नहीं दी गई.
पतियों को दिए गए अपवाद को खत्म करने की मांग
अदालत ने 17 जनवरी को केंद्र (Center) से वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण (Criminalization) के मुद्दे पर अपनी सैद्धांतिक स्थिति (Theoretical Position) स्पष्ट करने के लिए कहा था. उच्च न्यायालय की पीठ गैर सरकारी संगठन आरआईटी फाउंडेशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन्स एसोसिएशन, एक पुरुष और एक महिला द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. इसमें भारतीय बलात्कार कानून (Indian Rape Law) के तहत पतियों को दिए गए अपवाद को खत्म करने की मांग की गई है. न्याय मित्र ने इसके पहले कहा था कि एक विवाहित महिला को अपने पति पर मुकदमा (Court Case) चलाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है, अगर उसे लगता है कि उसके साथ बलात्कार किया गया था.
केंद्र सरकार ने हलफनामे में क्या कहा ?
केंद्र सरकार (Central Government) ने इस मामले में दायर अपने पहले हलफनामे (Affidavit) में कहा है कि वैवाहिक बलात्कार को एक आपराधिक उल्लंघन (Criminal Violation) नहीं बनाया जा सकता क्योंकि यह एक ऐसी घटना बन सकती है जो विवाह की संस्था को अस्थिर कर सकती है और पतियों को परेशान करने का सरल औजार बन सकती है. दिल्ली सरकार (Delhi Government) ने अदालत को बताया है कि वैवाहिक बलात्कार को पहले से ही IPC के तहत 'क्रूरता के अपराध' के रूप में शामिल किया गया है. याचिकाकर्ताओं (Petitioners) ने IPC की धारा 375 (बलात्कार) के तहत वैवाहिक बलात्कार अपवाद की संवैधानिकता (Constitutionality) को इस आधार पर चुनौती दी है कि यह उन विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करती है जिनका उनके पतियों द्वारा यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) किया जाता है.
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