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CJI प्रोटेस्ट पर दिल्ली HC सख्त, पुलिस से मांगा जवाब

दिल्ली हाई कोर्ट: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों की निगरानी के आरोपों को लेकर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है। अदालत ने पुलिस से पूछा है कि क्या प्रदर्शनकारियों की रिकॉर्डिंग और निगरानी के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है। मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ कर रही है।
यह मामला पूर्व जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष आइशे घोष की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों की लगातार फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की जा रही है, जो उनकी निजता, सम्मान और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि पुलिस किसी भी तरह की निगरानी नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर होने वाले सभी प्रदर्शनों की रिकॉर्डिंग केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से की जाती है। इसका मकसद किसी व्यक्ति की निजी जानकारी जुटाना या प्रदर्शनकारियों पर नजर रखना नहीं है।
पुलिस के जवाब पर हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि रिकॉर्डिंग किस प्रक्रिया के तहत की जा रही है और क्या इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है। अदालत ने मामले की आगे की सुनवाई मंगलवार को तय की है।
आइशे घोष ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि 20 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के धरने और भूख हड़ताल शुरू होने के बाद से प्रदर्शनकारियों की लगातार निगरानी की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि पुलिस की ओर से प्रदर्शन स्थल की तस्वीरें और वीडियो बनाए जा रहे हैं।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह की गतिविधियों से प्रदर्शनकारियों में डर का माहौल पैदा हो रहा है और उनके संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और एकत्र होने के अधिकार का हिस्सा है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने कई बार प्रदर्शन स्थल के अंदर मार्च किया और प्रदर्शनकारियों को ले जाने वाली गाड़ियों को रोककर पूछताछ की। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इस तरह की गतिविधियां प्रदर्शनकारियों को हतोत्साहित करने और दबाव बनाने का प्रयास हैं।
इस मामले में निजता के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 2017 के ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि निजता संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अहम हिस्सा है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि सरकार की ओर से की जाने वाली किसी भी निगरानी की प्रक्रिया कानूनी, जरूरी और उचित उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
दिल्ली हाई कोर्ट अब यह जांच करेगा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की रिकॉर्डिंग किस उद्देश्य से की जा रही है और क्या इसमें निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है। अदालत का ध्यान इस बात पर भी है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों की निजता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि सार्वजनिक प्रदर्शन स्थलों पर रिकॉर्डिंग एक सामान्य प्रक्रिया है, जिससे किसी अप्रिय घटना की स्थिति में स्थिति को समझने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिलती है। वहीं याचिकाकर्ता पक्ष का तर्क है कि बिना स्पष्ट नियमों के लगातार रिकॉर्डिंग करना नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल हाई कोर्ट ने पुलिस से इस मुद्दे पर जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई में मामले के सभी पहलुओं पर विचार किया जाएगा। इस मामले पर अदालत का अंतिम फैसला यह तय कर सकता है कि सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस रिकॉर्डिंग और निगरानी की सीमाएं क्या होंगी।





