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Delhi : फाइनेंस मिनिस्ट्री का नया देशव्यापी फील्ड विज़िट प्रोग्राम शुरू

New Delhi नई दिल्ली : केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने पहली बार देशभर में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स के फील्ड विज़िट का एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया है। इस पहल का उद्देश्य आर्थिक नीतियों को अधिक प्रभावी बनाना और मौजूदा वैश्विक चुनौतियों, विशेषकर पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न प्रभावों को समझकर उनका समाधान निकालना है।
यह कार्यक्रम वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs - DEA) की अगुवाई में संचालित किया जा रहा है। इस योजना के तहत वरिष्ठ DEA अधिकारी देशभर में बड़ी, मध्यम और छोटी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के साथ-साथ बाहरी सहायता प्राप्त परियोजनाओं का दौरा करेंगे। इन दौरों के माध्यम से उद्योगों में मौजूद वास्तविक स्थिति और चुनौतियों का आकलन किया जाएगा।
सरकार का मानना है कि नीति निर्माण को जमीनी स्तर की वास्तविकताओं से जोड़ने के लिए सीधे उद्योगों से फीडबैक लेना बेहद जरूरी है। इसी उद्देश्य से इस नए कार्यक्रम को शुरू किया गया है, ताकि आर्थिक नीतियां अधिक व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख बनाई जा सकें।
एक आधिकारिक संचार के अनुसार, इन फील्ड विज़िट्स का मुख्य उद्देश्य विभिन्न स्तरों पर मौजूद बाधाओं की पहचान करना है। इनमें इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी समस्याएं, नियामकीय अड़चनें, सप्लाई चेन में रुकावटें, वित्तीय संसाधनों तक पहुंच की कठिनाइयां, कौशल विकास में कमी और तकनीकी अपनाने से जुड़ी चुनौतियां शामिल हैं।
इस पहल के तहत अधिकारी उद्योगों के प्रतिनिधियों से सीधे बातचीत करेंगे और यह समझने का प्रयास करेंगे कि मौजूदा नीतियां किस हद तक प्रभावी हैं और कहां सुधार की आवश्यकता है। इसके अलावा, छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) की समस्याओं पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा, क्योंकि यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वित्त मंत्रालय का मानना है कि वैश्विक स्तर पर बदलते आर्थिक हालात, खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण सप्लाई चेन और व्यापार पर पड़ रहे प्रभावों को समझना आवश्यक हो गया है। ऐसे में यह फील्ड विज़िट प्रोग्राम नीति निर्माताओं को वास्तविक स्थिति का बेहतर आकलन करने में मदद करेगा।
अधिकारियों के अनुसार, इस पहल से न केवल उद्योगों की समस्याओं को सीधे समझने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य की आर्थिक नीतियों को अधिक व्यावहारिक और मजबूत बनाने में भी सहायता मिलेगी।
सरकार को उम्मीद है कि यह नया कदम नीति निर्माण और उद्योग जगत के बीच की दूरी को कम करेगा और भारत के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगा।





