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मकोका के बाद भी करते रहे अपराध, कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को लगाई फटकार
nidhi
7 Oct 2026 10:19 AM IST

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अदालत ने पुलिस के ‘बेस्ट एफर्ट्स’ पर उठाए सवाल
नई दिल्ली: दिल्ली की एक विशेष अदालत ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम यानी मकोका से जुड़े एक मामले में दिल्ली पुलिस की जांच और कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। विशेष न्यायाधीश गौरव राव ने बाहरी-उत्तर जिला पुलिस की ओर से पेश रिपोर्ट को “महज आईवॉश” बताते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में पुलिस की ओर से दिखाई गई ढिलाई ने मकोका जैसे सख्त कानून के उद्देश्य को ही कमजोर कर दिया।
यह मामला सितंबर 2020 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। इसमें मुकेश उर्फ पुनीत और प्रदीप उर्फ गुरी समेत कुछ लोगों पर संगठित अपराध में शामिल होने के आरोप में मकोका लगाया गया था। अदालत ने पाया कि कानून लागू होने के बावजूद मुख्य आरोपी कई वर्षों तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे। मुकेश उर्फ पुनीत को फरवरी 2026 में गिरफ्तार किया गया, जबकि प्रदीप उर्फ गुरी अप्रैल 2026 में पुलिस के हत्थे चढ़ा। यानी दोनों आरोपी मकोका लगने के करीब छह साल बाद गिरफ्तार हुए। अदालत ने इस लंबी देरी को गंभीर लापरवाही माना।
कोर्ट के अनुसार, मकोका लागू होने के समय मुकेश के खिलाफ करीब 20 आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें हत्या और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप भी शामिल थे। इसके बाद 2021 से 2024 के बीच उसके खिलाफ आठ और एफआईआर दर्ज हुईं, जिनमें हत्या, डकैती, अपहरण और अन्य गंभीर अपराध शामिल बताए गए हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि जब आरोपी लगातार नए मामलों में नामजद हो रहे थे, तब भी उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि यदि मकोका जैसा कठोर कानून लगाने के बाद भी आरोपी खुलेआम घूमते रहें और कथित रूप से नए अपराध करते रहें, तो ऐसे कानून को लागू करने का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
मामले की पिछली सुनवाई में अदालत ने पुलिस से यह स्पष्ट करने को कहा था कि आरोपी मकोका लगाए जाने के समय जमानत पर थे या हिरासत में, और उनकी गिरफ्तारी में इतना लंबा समय क्यों लगा। इसके जवाब में डीसीपी की ओर से जो रिपोर्ट पेश की गई, उससे अदालत संतुष्ट नहीं हुई। रिपोर्ट में कहा गया था कि पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों को पकड़ने के लिए “सर्वश्रेष्ठ प्रयास” किए। इसी दावे पर अदालत ने तीखी प्रतिक्रिया दी। न्यायाधीश ने कहा कि यदि लगभग छह साल तक गिरफ्तारी न होने के बावजूद इसे “सर्वश्रेष्ठ प्रयास” कहा जा रहा है, तो यह व्यवस्था का मजाक बनाता है।
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों की समय पर गिरफ्तारी न होने से जांच पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। लंबे समय के बाद गवाहों की याददाश्त कमजोर हो सकती है, सबूत नष्ट हो सकते हैं और मामलों की निष्पक्ष जांच कठिन हो सकती है। विशेष अदालत ने यह भी नोट किया कि मकोका के तहत कार्रवाई का मकसद संगठित अपराध से जुड़े लोगों पर तेजी और प्रभावी तरीके से शिकंजा कसना होता है। लेकिन यदि आरोपी इतने लंबे समय तक पकड़ से बाहर रहें तो इसका गलत संदेश जाता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ सकता है।
अदालत ने मामले की गंभीरता देखते हुए अपने 5 अक्टूबर के आदेश की प्रति दिल्ली पुलिस आयुक्त को भेजने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने पूरे मामले की विस्तृत जांच कर लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और जांच अधिकारियों की भूमिका तय करने को कहा है। इसके साथ ही संबंधित संयुक्त पुलिस आयुक्त को अगली सुनवाई में रिपोर्ट और टिप्पणियों के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।
इस मामले में तीन अन्य आरोपी अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर बताए गए हैं। अदालत ने इस स्थिति को भी गंभीर माना है और पुलिस से फरार आरोपियों को पकड़ने की दिशा में ठोस कार्रवाई की उम्मीद जताई है। फिलहाल अदालत का आदेश दिल्ली पुलिस की जांच व्यवस्था और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। अब पुलिस आयुक्त स्तर की जांच में यह देखा जाएगा कि इतने लंबे समय तक आरोपी गिरफ्त से बाहर कैसे रहे और क्या जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही या चूक रही।
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