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आर्थिक अपराधों पर CJI सूर्यकांत ने जताई चिंता

nidhi
31 Aug 2026 6:56 AM IST
आर्थिक अपराधों पर CJI सूर्यकांत ने जताई चिंता
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CJI सूर्यकांत की बड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अपराधों से निपटने की वैश्विक व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि दुनिया में मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए इधर-उधर किए जाने वाले धन के मुकाबले उसकी वास्तविक बरामदगी बेहद कम है। उनके मुताबिक, हर 100 रुपये की अवैध संपत्ति में से कानून प्रवर्तन एजेंसियां करीब एक रुपये के बराबर राशि ही वापस हासिल कर पाती हैं। उन्होंने इसके पीछे आर्थिक अपराधियों के लगातार बदलते तौर-तरीकों और देशों के बीच पर्याप्त सहयोग की कमी को बड़ी वजह बताया। CJI सूर्यकांत ने यह टिप्पणी कैम्ब्रिज में आयोजित आर्थिक अपराध पर 43वें अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान की। उन्होंने आर्थिक अपराधों की व्यापकता का उदाहरण देते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर एक वर्ष में जितनी रकम की मनी लॉन्ड्रिंग होने का अनुमान है, वह इतनी बड़ी है कि उससे दुनिया के लगभग आठ अरब लोगों में से प्रत्येक के लिए एक सामान्य लैपटॉप खरीदा जा सकता है और इसके बाद भी रकम बच सकती है। इसके बावजूद अवैध धन की वास्तविक रिकवरी एक प्रतिशत से भी कम रहने का अनुमान है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आर्थिक अपराधों का स्वरूप अब किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। अवैध धन तेजी से एक देश से दूसरे देश और अलग-अलग वित्तीय व्यवस्थाओं तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि किसी एक देश के लिए अकेले ऐसे अपराधों से प्रभावी तरीके से निपटना मुश्किल हो जाता है। आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई और विदेशों में पहुंच चुकी संपत्ति की वापसी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत सहयोग बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि अवैध संपत्ति और आर्थिक अपराध अंतरराष्ट्रीय संधियों तथा कानूनी प्रक्रियाओं की तुलना में कहीं अधिक तेजी से सीमाएं पार कर सकते हैं। ऐसे मामलों में वित्तीय खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, लाभकारी स्वामित्व की पहचान, अवैध संपत्तियों को जब्त करने की व्यवस्था और विभिन्न देशों की एजेंसियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
CJI सूर्यकांत ने अपने संबोधन में प्राचीन भारतीय चिंतक कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सदियों पहले भी सरकारी राजस्व और भ्रष्टाचार से जुड़ी चुनौतियों पर विचार किया गया था। अर्थशास्त्र में राजस्व की निगरानी के लिए ऑडिट, क्रॉस-वेरिफिकेशन और गलत तरीके से अर्जित संपत्ति की जब्ती जैसे उपायों का उल्लेख मिलता है। CJI ने इसके जरिए यह रेखांकित किया कि आर्थिक अपराध कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन आधुनिक तकनीक और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था ने इसकी जटिलता को कई गुना बढ़ा दिया है।
भारत में आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए मौजूद कानूनी व्यवस्था का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसे किसी एक कानून तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। देश में कई दशकों में अलग-अलग कानूनी और संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित हुई हैं। मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े कानूनों से लेकर भगोड़े आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई तक कई स्तरों पर प्रावधान मौजूद हैं। इसके साथ ही न्यायपालिका ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि आर्थिक अपराधों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और नागरिकों के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।
CJI ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में Mutual Legal Assistance Treaties यानी पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत के अनुभव में ऐसी संधियां विदेशों में मौजूद अवैध संपत्तियों को वापस लाने में महत्वपूर्ण साबित होती हैं। आर्थिक अपराधों में केवल आरोपी का प्रत्यर्पण ही चुनौती नहीं होता, बल्कि अपराध से अर्जित धन और संपत्ति को खोजकर उसे वापस लाना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों से होने वाले नए आर्थिक अपराधों की ओर भी ध्यान दिलाया। 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे साइबर फ्रॉड का उल्लेख करते हुए CJI ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने ऐसे उभरते अपराधों पर सक्रिय रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्यों से समस्या की व्यापकता का आकलन करने और इससे निपटने के लिए प्रभावी कानूनी उपायों पर विचार करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का प्रमुख संदेश यह रहा कि आर्थिक अपराधों के खिलाफ लड़ाई केवल कानून बनाने से पूरी नहीं होगी। इसके लिए जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से सूचनाओं का आदान-प्रदान, विदेशों में मौजूद अवैध संपत्ति का पता लगाने की क्षमता और कानूनी प्रक्रियाओं को प्रभावी बनाना आवश्यक है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अवैध धन राष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान नहीं करता। ऐसे में यदि अलग-अलग देशों की एजेंसियां अपने-अपने स्तर पर ही काम करती रहेंगी तो अपराधियों को कानूनी और वित्तीय व्यवस्थाओं के बीच मौजूद अंतर का फायदा मिल सकता है। इसलिए वैश्विक सहयोग, सतर्कता और कानून के शासन के जरिए ही मनी लॉन्ड्रिंग तथा अन्य आर्थिक अपराधों को प्रभावी ढंग से चुनौती दी जा सकती है।
CJI सूर्यकांत की यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब दुनियाभर में मनी लॉन्ड्रिंग, साइबर धोखाधड़ी, अवैध संपत्ति और सीमा पार आर्थिक अपराधों को लेकर चिंता बढ़ रही है। उनका कहना है कि सफलता का पैमाना केवल आर्थिक अपराधों की समस्या पर चर्चा करना नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि अलग-अलग देश और उनकी संस्थाएं अवैध संपत्ति की पहचान, जब्ती और वापसी के लिए कितनी प्रभावी कार्रवाई करती हैं।
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