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भारत रूस रिश्तों में कारोबार का नया अध्याय मोदी पुतिन ने बनाया बड़ा प्लान
Ratna Netam
11 Sept 2026 5:14 PM IST

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच शुक्रवार को नई दिल्ली में हुई द्विपक्षीय बैठक में व्यापार, ऊर्जा और रक्षा से लेकर क्रिटिकल मिनरल्स तक कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में अब सबसे बड़ा लक्ष्य **2030 तक सालाना द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाना** है। इसके साथ भारत की कोशिश रूसी बाजार में भारतीय सामान और कंपनियों की पहुंच बढ़ाने की भी है, ताकि दोनों देशों के व्यापार को ज्यादा संतुलित और विविध बनाया जा सके।
मोदी और पुतिन की यह दो सप्ताह से भी कम समय में दूसरी मुलाकात है। इससे पहले 31 अगस्त को किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO की बैठक के दौरान दोनों नेता मिले थे। दिल्ली की ताजा बैठक BRICS Summit से ठीक पहले हुई है, जिससे इसके कूटनीतिक मायने और बढ़ गए हैं।
2030 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य
भारत और रूस के बीच आर्थिक संबंध पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। अब दोनों देशों की निगाह अगले बड़े लक्ष्य पर है।
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की बातचीत में **2030 तक भारत-रूस द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर सालाना तक पहुंचाने** का लक्ष्य प्रमुख मुद्दों में रहा।
इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल कच्चे तेल और रक्षा कारोबार पर निर्भर रहने के बजाय व्यापार का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।
भारत रूस को फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग सामान, मशीनरी, कृषि और खाद्य उत्पादों समेत कई क्षेत्रों में अपना निर्यात बढ़ाने की संभावनाएं देखता रहा है। दूसरी तरफ रूस भारत के लिए ऊर्जा, उर्वरक और दूसरे कच्चे माल का महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता है।
रूसी बाजार में भारतीय कंपनियों की पहुंच पर फोकस
दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा व्यापार का संतुलन भी है।
रूस से भारत का आयात काफी बढ़ा है, खासकर कच्चे तेल के कारण। इसके मुकाबले रूस को भारतीय निर्यात अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में भारत की प्राथमिकताओं में रूसी बाजार में भारतीय उत्पादों के लिए बेहतर अवसर पैदा करना शामिल है।
इससे पहले भी भारत ने रूस के साथ व्यापार को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाने के लिए उचित बाजार पहुंच पर जोर दिया है।
अब 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारतीय कंपनियों के लिए रूस में नए अवसर तलाशना महत्वपूर्ण होगा।
फार्मा, कृषि, फूड प्रोसेसिंग, ऑटो कंपोनेंट, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग उत्पाद और उपभोक्ता वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में भारतीय कारोबार के लिए संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।
रूसी तेल बना आर्थिक रिश्तों की बड़ी कड़ी
भारत-रूस व्यापार में ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक बन चुकी है।
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बीच भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। भारत का कहना है कि उसकी विशाल आबादी और अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित, विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा आपूर्ति जरूरी है।
2026 में भी रूसी तेल की भारतीय बाजार में बड़ी हिस्सेदारी बनी हुई है। जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी रिकॉर्ड **51 प्रतिशत** तक पहुंच गई थी। अगस्त में इसमें कुछ कमी आने की संभावना जताई गई क्योंकि चीन ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई।
इससे साफ है कि ऊर्जा सहयोग फिलहाल भारत-रूस आर्थिक रिश्तों का केंद्रीय हिस्सा बना हुआ है।
तेल से आगे बढ़ाना है कारोबार
भारत और रूस अब आर्थिक रिश्तों को केवल तेल और रक्षा के दायरे में सीमित नहीं रखना चाहते।
शुक्रवार की बातचीत में **सिविल न्यूक्लियर एनर्जी, उर्वरक, मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे, स्टील और क्रिटिकल मिनरल्स** जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं भी एजेंडे में थीं।
क्रिटिकल मिनरल्स खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए इनकी जरूरत लगातार बढ़ रही है।
भारत अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित और विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। रूस के पास विशाल प्राकृतिक संसाधन हैं, इसलिए इस क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग की नई संभावनाएं बन सकती हैं।
रक्षा सहयोग पर भी हुई चर्चा
भारत और रूस के रिश्तों में रक्षा सहयोग दशकों पुराना है।
भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के पास बड़ी संख्या में रूसी मूल के प्लेटफॉर्म और हथियार प्रणालियां हैं। ऐसे में स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव, अपग्रेड और तकनीकी सहयोग दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।
ताजा बैठक में भी रक्षा सहयोग प्रमुख एजेंडे में शामिल रहा।
हालांकि भारत अब रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है। ऐसे में भविष्य में रूस के साथ रिश्ते केवल तैयार हथियार खरीदने तक सीमित रहने के बजाय संयुक्त उत्पादन और भारत में मैन्युफैक्चरिंग की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
भारत-रूस का ब्रह्मोस सहयोग पहले से दोनों देशों की रक्षा साझेदारी का बड़ा उदाहरण है।
परमाणु ऊर्जा भी अहम क्षेत्र
सिविल न्यूक्लियर एनर्जी भी दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत में रूस की भागीदारी वाली कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना इसका प्रमुख उदाहरण है। बढ़ती बिजली मांग और कम-कार्बन ऊर्जा स्रोतों की जरूरत को देखते हुए परमाणु ऊर्जा भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
मोदी-पुतिन वार्ता में सिविल न्यूक्लियर एनर्जी सहयोग के विस्तार की संभावनाओं पर भी ध्यान रहा।
अगर दोनों देश इस क्षेत्र में नई परियोजनाओं या तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाते हैं तो आर्थिक साझेदारी को एक और मजबूत आधार मिल सकता है।
रेलवे और स्टील में भी संभावनाएं
दोनों नेताओं की बैठक में रेलवे और स्टील जैसे पारंपरिक औद्योगिक क्षेत्रों में सहयोग भी एजेंडे का हिस्सा रहा।
भारत दुनिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क में से एक का आधुनिकीकरण कर रहा है। हाई-स्पीड रेल, माल ढुलाई, स्टेशन विकास और नई तकनीक पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है।
रूस के पास रेलवे और भारी इंजीनियरिंग क्षेत्र में लंबा अनुभव है। ऐसे में दोनों देशों की कंपनियों के बीच तकनीकी और औद्योगिक साझेदारी की गुंजाइश मौजूद है।
इसी तरह स्टील और मैन्युफैक्चरिंग में सहयोग दोनों देशों के व्यापार को तेल से आगे ले जाने में मदद कर सकता है।
उर्वरक भी भारत के लिए महत्वपूर्ण
रूस भारत के लिए उर्वरकों का भी महत्वपूर्ण स्रोत रहा है।
भारत में कृषि क्षेत्र की विशाल जरूरत को देखते हुए उर्वरकों की सुरक्षित और किफायती आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। वैश्विक संघर्ष या सप्लाई चेन में व्यवधान आने पर उर्वरक की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
ऐसे में रूस के साथ दीर्घकालिक और स्थिर आपूर्ति व्यवस्था भारत के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक और खाद्य-सुरक्षा मुद्दा बन जाती है।
ताजा बातचीत में उर्वरक सहयोग भी चर्चा के क्षेत्रों में शामिल था।
व्यापार में सबसे बड़ी चुनौती क्या?
100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य की राह में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक व्यापार असंतुलन है।
भारत बड़े पैमाने पर रूस से तेल और अन्य सामान खरीदता है। इसके मुकाबले रूस को भारत का निर्यात कम है।
अगर यही स्थिति जारी रहती है तो व्यापार का कुल आंकड़ा भले बढ़ जाए, लेकिन आर्थिक संबंध संतुलित नहीं होंगे।
इसी वजह से भारतीय उत्पादों के लिए रूसी बाजार खोलना और गैर-ऊर्जा कारोबार बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
फार्मा और इंजीनियरिंग से लेकर खाद्य उत्पादों तक भारत के पास ऐसे कई सेक्टर हैं जहां रूस को निर्यात बढ़ाया जा सकता है।
इसके अलावा भुगतान व्यवस्था, बैंकिंग और लॉजिस्टिक्स जैसी व्यावहारिक चुनौतियों का समाधान भी कारोबार बढ़ाने के लिए जरूरी होगा।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार भी चर्चा में
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने का मुद्दा भी लंबे समय से चर्चा में है।
डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, हालांकि इसे बड़े पैमाने पर लागू करने में कई व्यावहारिक कठिनाइयां हैं। अलग-अलग देशों की वित्तीय प्रणालियां और मुद्राओं की परिवर्तनीयता जैसे मुद्दे इसमें बड़ी चुनौती हैं।
भारत और रूस के मामले में पश्चिमी प्रतिबंधों ने भुगतान व्यवस्था को पहले ही जटिल बनाया है।
ऐसे में सुरक्षित और व्यावहारिक भुगतान तंत्र तैयार करना 100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा।
यूक्रेन युद्ध पर भारत का पुराना रुख
आर्थिक मुद्दों के साथ मोदी और पुतिन के बीच वैश्विक परिस्थितियों पर भी बातचीत महत्वपूर्ण है।
भारत लगातार रूस-यूक्रेन संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए निकालने की बात करता रहा है।
31 अगस्त को बिश्केक में पुतिन से मुलाकात के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यूक्रेन युद्ध को मानवता के हित में समाप्त होना चाहिए और भारत शांति के हर प्रयास का समर्थन करेगा।
भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखी है, लेकिन साथ ही युद्ध समाप्त करने और कूटनीतिक समाधान की वकालत भी की है।
BRICS से ठीक पहले मुलाकात के मायने
मोदी-पुतिन की बैठक दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS Summit से ठीक पहले हुई है।
BRICS का विस्तार होने के बाद इसका आर्थिक और राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। इस बार सप्लाई चेन, स्टार्टअप, इनोवेशन और आर्थिक सहयोग से जुड़े कई प्रस्ताव एजेंडे में हैं।
भारत के लिए रूस के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का भी हिस्सा है।
एक तरफ भारत अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते बढ़ा रहा है, वहीं रूस के साथ दशकों पुरानी साझेदारी को भी कायम रखे हुए है।
मोदी-पुतिन बैठक का सबसे बड़ा संदेश
शुक्रवार की बैठक से तीन बड़े आर्थिक संकेत निकलते हैं।
पहला, भारत और रूस **2030 तक 100 अरब डॉलर के सालाना व्यापार** के लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ना चाहते हैं। दूसरा, भारत व्यापार को ज्यादा संतुलित बनाने के लिए रूसी बाजार में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाना चाहता है। तीसरा, दोनों देश तेल और रक्षा के पार जाकर क्रिटिकल मिनरल्स, परमाणु ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे, स्टील और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहते हैं।
इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा। पश्चिमी प्रतिबंध, भुगतान की चुनौतियां, लॉजिस्टिक्स और मौजूदा व्यापार असंतुलन बड़ी बाधाएं हैं।
लेकिन मोदी-पुतिन की ताजा बैठक ने साफ कर दिया है कि दोनों देश आर्थिक रिश्तों का दायरा बढ़ाने के इच्छुक हैं।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि बैठक में हुई बातचीत के बाद कितने ठोस कारोबारी समझौते सामने आते हैं और भारत रूसी बाजार में अपने निर्यात को कितनी तेजी से बढ़ा पाता है। अगर गैर-तेल व्यापार में बड़ा विस्तार होता है तो 100 अरब डॉलर का लक्ष्य भारत-रूस आर्थिक संबंधों को एक नए स्तर पर ले जा सकता है।
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