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73% छात्र हायर सेकेंडरी से पहले छोड़ रहे पढ़ाई, संसदीय समिति ने शिक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता

नई दिल्ली। देश में शिक्षा के स्तर को लेकर संसदीय समिति ने गंभीर चिंता जताई है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयासों के बावजूद स्कूलों और छात्रों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 73 प्रतिशत छात्र हायर सेकेंडरी यानी कक्षा 12वीं की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं।
यह जानकारी एस्टीमेट्स कमेटी (2026-27) की दसवीं रिपोर्ट (18वीं लोकसभा) में सामने आई है। यह रिपोर्ट देश में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए बजट और नीतिगत पहलों की समीक्षा पर आधारित है। रिपोर्ट में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की कार्यप्रणाली और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई पहलुओं का भी मूल्यांकन किया गया है।
संसदीय समिति ने कहा कि देश में शिक्षा का विस्तार होने के बावजूद बड़ी संख्या में छात्रों का पढ़ाई बीच में छोड़ देना चिंता का विषय है। समिति का मानना है कि स्कूल छोड़ने की बढ़ती दर से न केवल छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है, बल्कि देश के मानव संसाधन विकास पर भी असर पड़ता है।
रिपोर्ट में स्कूलों और छात्रों की घटती संख्या का भी उल्लेख किया गया है। समिति ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और सुविधाओं को बढ़ाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करें।
समिति ने सुझाव दिया है कि छात्रों के स्कूल छोड़ने के कारणों की पहचान की जानी चाहिए। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक कारणों का अध्ययन करने की जरूरत है। कई बार आर्थिक परेशानियां, परिवार की जिम्मेदारियां, स्कूलों में सुविधाओं की कमी और पढ़ाई के प्रति रुचि में कमी छात्रों के ड्रॉपआउट का कारण बनती हैं।
रिपोर्ट में शिक्षा को अधिक सुलभ और गुणवत्तापूर्ण बनाने पर जोर दिया गया है। समिति ने कहा कि केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों की भागीदारी को भी बढ़ाना जरूरी है।
CBSE की समीक्षा के दौरान समिति ने बोर्ड से जुड़े कई मुद्दों पर भी विचार किया। इसमें शिक्षा की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली और छात्रों के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराने जैसे विषय शामिल रहे।
संसदीय समिति ने कहा कि देश में शिक्षा के क्षेत्र में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन उनका प्रभाव जमीन पर दिखाई देना जरूरी है। योजनाओं का लाभ अंतिम छात्र तक पहुंचे, इसके लिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है।
समिति ने यह भी माना कि स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के साथ-साथ छात्रों को स्कूल में बनाए रखना बड़ी चुनौती है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों के बच्चों के लिए लगातार शिक्षा जारी रखना मुश्किल हो जाता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों के स्कूल छोड़ने की समस्या को दूर करने के लिए केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि स्कूलों में बेहतर माहौल, प्रशिक्षित शिक्षक, करियर मार्गदर्शन और व्यावहारिक शिक्षा पर भी ध्यान देना होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, हायर सेकेंडरी तक पहुंचने से पहले बड़ी संख्या में छात्रों का पढ़ाई छोड़ देना देश की शिक्षा व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर युवाओं के रोजगार और कौशल विकास पर भी पड़ सकता है।
संसदीय समिति ने अपनी सिफारिशों में शिक्षा क्षेत्र के लिए बेहतर बजट प्रबंधन, योजनाओं की प्रभावी निगरानी और छात्रों को पढ़ाई से जोड़कर रखने के उपायों पर जोर दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी छात्र आर्थिक या अन्य कारणों से शिक्षा से दूर न हो।
अब सरकार और शिक्षा मंत्रालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती छात्रों की ड्रॉपआउट दर कम करना और शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है। समिति की सिफारिशों के बाद आने वाले समय में शिक्षा क्षेत्र में नई नीतियों और सुधारों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है।





