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JNU में 17 दिनों की भूख हड़ताल खत्म, छात्रों की मांगों पर झुका विश्वविद्यालय प्रशासन

नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पिछले 17 दिनों से जारी छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को समाप्त हो गई। विश्वविद्यालय प्रशासन और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत के बाद आंदोलन खत्म करने का फैसला लिया गया। प्रशासन ने छात्र संघ के पदाधिकारियों के निष्कासन आदेश वापस लेने, छात्रों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और विवादास्पद चीफ प्रॉक्टर कार्यालय (सीपीओ) मैनुअल की समीक्षा सहित कई मांगों पर सहमति जताई है। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के डीन प्रोफेसर विवेक कुमार और छात्र प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर वाले बैठक के कार्यवृत्त में इन निर्णयों का उल्लेख किया गया है। इस समझौते के बाद विश्वविद्यालय परिसर में लंबे समय से जारी गतिरोध समाप्त होने की उम्मीद बढ़ गई है।
17 दिन बाद छात्रों ने खत्म की भूख हड़ताल
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र संघ के पदाधिकारी और अन्य विद्यार्थी 3 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनका विरोध विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुशासनात्मक कार्रवाई और छात्र हितों से जुड़ी विभिन्न मांगों को लेकर था।
छात्रों का आरोप था कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों के खिलाफ अनुचित कार्रवाई की है। इसके अलावा छात्र संघ लंबे समय से सीपीओ मैनुअल के विवादास्पद प्रावधानों को वापस लेने की मांग कर रहा था।
लगातार 17 दिनों तक चले आंदोलन के दौरान छात्रों ने प्रशासन से बातचीत कर अपनी मांगों का समाधान निकालने की अपील की।
मंगलवार को प्रशासनिक समिति और छात्र प्रतिनिधियों के बीच बनी सहमति के बाद छात्र संघ ने भूख हड़ताल समाप्त करने की घोषणा कर दी।
पांच छात्रों का निष्कासन रद्द करने के निर्देश
समझौते के प्रमुख निर्णयों में पांच छात्रों के निष्कासन आदेश वापस लेने का मुद्दा शामिल है।
बैठक के कार्यवृत्त के अनुसार, छात्र संघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा, उपाध्यक्ष के. गोपिका बाबू, महासचिव सुनील यादव, दानिश अली और नीतीश कुमार के निष्कासन आदेश वापस लेने के निर्देश दिए गए हैं।
छात्र संघ लंबे समय से इन पदाधिकारियों की बहाली की मांग कर रहा था। छात्रों का कहना था कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को विश्वविद्यालय से निष्कासित करना छात्र संघ की गतिविधियों और प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।
प्रशासन की ओर से निष्कासन वापस लेने का निर्देश मिलने को आंदोलन के महत्वपूर्ण परिणामों में से एक माना जा रहा है।
हालांकि, प्रशासनिक सहमति और संबंधित औपचारिक आदेशों के क्रियान्वयन की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने पर सहमति
बैठक में छात्रों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेने पर भी सहमति बनी है।
विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत में तय किया गया कि छात्रों के विरुद्ध दर्ज मामलों को वापस लेने की दिशा में आवश्यक प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
यह मांग आंदोलन के दौरान प्रमुख मुद्दों में शामिल थी। छात्र संघ का कहना था कि विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने से उनके शैक्षणिक भविष्य पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, एफआईआर वापस लेने की प्रशासनिक सहमति का अर्थ आपराधिक मामले का तत्काल समाप्त होना नहीं है। इसके लिए संबंधित कानूनी प्रक्रिया पूरी करना आवश्यक होगा।
सीपीओ मैनुअल की समीक्षा के लिए बनेगी समिति
छात्रों की एक अन्य महत्वपूर्ण मांग चीफ प्रॉक्टर कार्यालय के मैनुअल से जुड़ी थी।
छात्र संघ का आरोप था कि सीपीओ मैनुअल के कुछ प्रावधान विद्यार्थियों के लोकतांत्रिक अधिकारों और परिसर में विरोध प्रदर्शन की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं।
समझौते के तहत विवादास्पद प्रावधानों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने पर सहमति बनी है।
इस समिति में छात्र संघ के एक पदाधिकारी और एक निर्वाचित छात्र प्रतिनिधि को शामिल किया जाएगा।
समिति मैनुअल के विवादित प्रावधानों की समीक्षा करेगी और आवश्यक बदलावों पर विचार करेगी।
प्रॉक्टोरियल जांच वापस लेने का भी निर्णय
बैठक में विभिन्न छात्र आंदोलनों के दौरान शुरू की गई प्रॉक्टोरियल जांचों का मुद्दा भी उठाया गया।
समझौते के अनुसार, निष्कासन के विरोध, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों और छात्रावासों के बुनियादी ढांचे से संबंधित प्रदर्शनों के दौरान शुरू की गई प्रॉक्टोरियल जांचों को वापस लेने पर सहमति जताई गई है।
यह फैसला उन छात्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनके खिलाफ विश्वविद्यालय की आंतरिक अनुशासनात्मक प्रक्रिया चल रही थी।
प्रशासन और छात्रों के बीच बनी सहमति से इन विवादों के समाधान का रास्ता खुलने की उम्मीद है।
प्रवेश परीक्षा और छात्रावास आरक्षण पर भी चर्चा
बैठक में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (जेएनयूईई) से जुड़ी मांग पर भी निर्णय लिया गया।
इसके तहत एक समिति गठित की जाएगी, जिसमें छात्र संघ के पदाधिकारी का प्रतिनिधित्व रहेगा।
इसके अलावा छात्रावास आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा के लिए भी छात्र प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए समिति बनाने पर सहमति बनी है।
छात्रावासों में आरक्षण व्यवस्था, सीटों के वितरण और संबंधित सुविधाओं को लेकर छात्र संघ लंबे समय से अपनी मांगें उठाता रहा है।
बैठक में पुस्तकालय के समय, छात्रावासों की व्यवस्था और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस में कैंटीन खोलने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग तक पहुंचा था मामला
भूख हड़ताल लंबी खिंचने के बाद यह मामला विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया था।
राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की थी।
उन्होंने पत्र लिखकर भूख हड़ताल कर रहे छात्रों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की थी।
सांसद ने छात्र प्रतिनिधियों के निष्कासन आदेश वापस लेने, सीपीओ मैनुअल के विवादित प्रावधानों की समीक्षा और लंबित मांगों के समाधान की आवश्यकता बताई थी।
प्रशासन और छात्रों के बीच पहले भी हुई थी बातचीत
भूख हड़ताल के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई थी।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, 9 अक्टूबर और 14 अक्टूबर को छात्रों की मांगों पर चर्चा की गई थी।
प्रशासन ने दावा किया था कि भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को नियमित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही थी।
वहीं, छात्र संघ ने प्रशासन के कुछ दावों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि निष्कासित पदाधिकारियों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल रही थीं।
इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए थे।
समझौते के बाद अब फैसलों के क्रियान्वयन पर नजर
17 दिनों की भूख हड़ताल समाप्त होने के बाद विश्वविद्यालय परिसर में सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों और प्रशासनिक कामकाज को लेकर सकारात्मक वातावरण बनने की उम्मीद है।
छात्र संघ की प्रमुख मांगों पर बनी सहमति को गतिरोध दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
हालांकि, अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रशासन द्वारा किए गए आश्वासनों को औपचारिक आदेशों और वास्तविक बदलावों में कब तक लागू किया जाता है।
निष्कासन आदेशों की वापसी, दर्ज मामलों की कानूनी प्रक्रिया और विभिन्न समितियों के गठन पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों के बीच हुए समझौते से लंबे समय से जारी आंदोलन समाप्त हो गया है। इस घटनाक्रम ने विश्वविद्यालयों में संवाद, छात्र प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक जवाबदेही के महत्व को एक बार फिर सामने रखा है।





