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‘सूरदास’ जैसा IAS अफसर: मां के त्याग और संघर्ष से रची गई UPSC की सबसे अनोखी सक्सेस स्टोरी

Harrison
10 Oct 2025 8:21 PM IST
‘सूरदास’ जैसा IAS अफसर: मां के त्याग और संघर्ष से रची गई UPSC की सबसे अनोखी सक्सेस स्टोरी
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Lifestyle, लाइफस्टाइल ,करियर: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा को देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिना जाता है। लाखों युवा हर साल इस परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन सफलता सिर्फ मेहनत से नहीं, बल्कि समर्पण, त्याग और अदम्य साहस से मिलती है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं UPSC इतिहास की एक सबसे प्रेरणादायक और अनोखी सफलता की कहानी, जिसे सुनकर आप कहेंगे – "यह सूरदास जैसा अफसर है, जिसने अंधेरे में भी रोशनी की राह ढूंढ ली।"
यह कहानी है प्रदीप कुमार की, जो नेत्रहीन होते हुए भी IAS अधिकारी बने। उनके इस सफर के पीछे एक और नाम छिपा है – उनकी मां, जिनके त्याग और बलिदान ने इस सपने को साकार किया।
अंधेरा जीवन, लेकिन नजरों में था उजाला
प्रदीप कुमार का जन्म एक बेहद साधारण और गरीब परिवार में हुआ। जन्म से ही उनकी दृष्टि कमजोर थी, और कुछ वर्षों बाद उन्होंने पूरी तरह से अपनी आंखों की रोशनी खो दी। जहां एक ओर समाज ने उन्हें ‘अंधा’, ‘लाचार’ कहकर हिम्मत तोड़ने की कोशिश की, वहीं उनकी मां ने उन्हें कभी दया नहीं, दिशा दी।
उनकी मां ने ठान लिया कि बेटा भले ही देख नहीं सकता, लेकिन ज्ञान और संस्कारों से वह दुनिया को रास्ता दिखाएगा। उन्होंने प्रदीप को पढ़ाया, ब्रेल लिपि सिखाई, और खुद उसे रोज़ स्कूल ले जातीं और लातीं। घर चलाने के लिए दूसरों के घरों में काम किया, लेकिन बेटे की पढ़ाई में कभी समझौता नहीं किया।
UPSC की तैयारी – संघर्षों भरा रास्ता
स्कूल के बाद प्रदीप ने कॉलेज में दाखिला लिया और वहीं से UPSC की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन यह सफर आसान नहीं था। किताबें, नोट्स और कोचिंग – सब कुछ सामान्य छात्रों के लिए बना होता है। लेकिन प्रदीप के पास ना बड़ी कोचिंग थी, ना ब्रेल में पूरे स्टडी मटेरियल।
यहां भी उनकी मां ने मोर्चा संभाला। वे घंटों बैठकर सामान्य किताबें पढ़कर बेटे को सुनाती थीं। उन्होंने अखबारों से लेकर एनसीईआरटी तक, हर शब्द बेटे को सुनाया, ताकि उसकी तैयारी में कोई कमी न रह जाए।
सफलता की सुबह
सालों की मेहनत, त्याग और संघर्ष रंग लाया। प्रदीप कुमार ने UPSC परीक्षा में सफलता हासिल की और IAS अफसर बनकर देश की सेवा करने का सपना पूरा किया। उनकी रैंक ने यह साबित कर दिया कि दृष्टि की कमी सोच में नहीं होती, बल्कि हौसले में होती है।
मां का बलिदान बना प्रेरणा
प्रदीप कहते हैं:
“अगर मेरी मां ने मेरा साथ न दिया होता, तो मैं भी शायद कहीं गुमनाम हो जाता। उन्होंने मुझे सहारा नहीं, हौसला दिया।”
उनकी मां ने जो त्याग किया, वह किसी तपस्या से कम नहीं था। उन्होंने हर वह कठिनाई झेली, जिसे कोई भी सामान्य इंसान सोचकर डर जाए। लेकिन उनका विश्वास था – “मेरा बेटा अंधा हो सकता है, लेकिन उसका भविष्य चमकदार होगा।”
आज की पीढ़ी के लिए सबक
प्रदीप कुमार की कहानी UPSC के हर उम्मीदवार के लिए एक सीख है। सफलता पाने के लिए सिर्फ किताबें नहीं, दृढ़ निश्चय, संघर्ष, और परिवार का साथ चाहिए। उन्होंने यह साबित कर दिया कि असली जीत परिस्थितियों को हराने में होती है।
प्रदीप कुमार की यह कहानी सिर्फ एक UPSC सक्सेस स्टोरी नहीं, बल्कि मां-बेटे के रिश्ते की मिसाल है। एक नेत्रहीन बेटे ने जिस तरह अपनी मां के सपनों को उड़ान दी, वह इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।
यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर इरादे बुलंद हों और साथ देने वाला कोई सच्चा हमसफर हो, तो कोई भी अंधेरा रौशनी बनने से नहीं रोक सकता।
अगर आप चाहें तो इस प्रेरणादायक कहानी को वीडियो स्क्रिप्ट, मोटिवेशनल स्पीच, या पोस्टर सीरीज़ में भी बदलकर पेश किया जा सकता है। बताएं किस रूप में चाहिए?
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