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एक घंटे का काम चार घंटे लेता है, राज शमानी ने बताई असली वजह
Ashish verma
4 Oct 2026 10:23 PM IST

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नई दिल्ली New Delhi : क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि जिस काम को आप आसानी से एक घंटे में पूरा कर सकते थे, वही काम पूरी दोपहर खा जाता है? किताब पढ़ने बैठे और कुछ मिनट बाद फोन हाथ में आ गया। जरूरी ईमेल लिखना शुरू किया, लेकिन बीच में सोशल मीडिया देखने लगे। फिर वापस काम पर लौटे तो ध्यान बनाने में समय लग गया। दिन खत्म होने तक थकान तो खूब महसूस हुई, लेकिन जरूरी काम अधूरा ही रह गया। उद्यमी और कंटेंट क्रिएटर राज शमानी ने इसी समस्या की तरफ ध्यान खींचते हुए कहा है कि इसके पीछे हमेशा आलस जिम्मेदार नहीं होता, बल्कि बार-बार लिया जाने वाला ब्रेक और टूटता फोकस बड़ी वजह हो सकता है।
राज शमानी ने अपनी हालिया लिंक्डइन पोस्ट में एक सीधा सवाल उठाया—एक घंटे का काम आपको चार घंटे का क्यों लगता है? उनके मुताबिक, हममें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि जिस काम को करने में घंटों लग रहे हैं, उसे वास्तव में बहुत कम समय में पूरा किया जा सकता है। कई बार जिस दिन हम बिना रुके और बिना ध्यान भटकाए काम करते हैं, उसी दिन वही टास्क उम्मीद से पहले खत्म हो जाता है।
काम नहीं, बार-बार टूटता फोकस है समस्या
जब हम किसी जरूरी काम पर ध्यान लगाते हैं तो शुरुआत में दिमाग को उस काम की लय पकड़ने में थोड़ा समय लगता है। एक बार फोकस बनने के बाद काम तेजी से आगे बढ़ सकता है। लेकिन इसी बीच फोन की नोटिफिकेशन देखना, मैसेज का जवाब देना या सोशल मीडिया खोल लेना उस लय को तोड़ देता है।
समस्या केवल उन कुछ मिनटों की नहीं है जो फोन देखने में खर्च होते हैं। असली चुनौती वापस उसी स्तर के फोकस में लौटने की होती है। बार-बार ऐसा होने पर एक छोटा काम कई हिस्सों में बंट जाता है और पूरा करने में जरूरत से ज्यादा समय लगने लगता है।
दो मिनट का फोन बन जाता है लंबा ब्रेक
काम करते समय अक्सर हम खुद से कहते हैं कि केवल दो मिनट फोन देखेंगे। लेकिन फोन खोलते ही एक मैसेज के बाद दूसरा नोटिफिकेशन, फिर कोई वीडियो या दूसरी पोस्ट ध्यान खींच सकती है। कुछ ही मिनटों में व्यक्ति उस काम से मानसिक रूप से दूर हो जाता है जिसे वह पहले कर रहा था।
जब वापस लैपटॉप या किताब पर नजर जाती है तो कई बार यह याद करने में भी समय लगता है कि काम कहां छोड़ा था। इस तरह कुछ मिनट का ब्रेक पूरे वर्कफ्लो को प्रभावित कर सकता है।
राज शमानी का इशारा इसी पैटर्न की तरफ है। उनके मुताबिक, हम अक्सर काम की वास्तविक कठिनाई से ज्यादा अपने लगातार टूटते ध्यान की वजह से समय गंवाते हैं।
बिजी रहने और प्रोडक्टिव होने में फर्क
दिनभर लैपटॉप के सामने बैठे रहना जरूरी नहीं कि आप पूरे दिन प्रोडक्टिव भी रहे हों। कई बार व्यक्ति सुबह से शाम तक काम में व्यस्त दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक आउटपुट बहुत कम होता है।
इसका कारण यह हो सकता है कि काम लगातार नहीं हुआ। थोड़ा काम, फिर फोन, फिर ईमेल, फिर किसी दूसरे टास्क पर जाना और कुछ देर बाद पहले वाले काम पर लौटना—इस तरह पूरा दिन निकल जाता है।
शाम को ऐसा महसूस होता है कि पूरे दिन बहुत मेहनत की, जबकि जरूरी कामों की सूची में कई टास्क अभी भी बाकी होते हैं। इससे मानसिक थकान भी बढ़ सकती है।
एक समय में एक काम पर ध्यान
इस समस्या से बचने का आसान तरीका है कि किसी महत्वपूर्ण काम के लिए एक निश्चित समय तय किया जाए और उस दौरान केवल उसी काम पर ध्यान दिया जाए। उदाहरण के लिए अगर कोई रिपोर्ट तैयार करनी है तो अगले 45 मिनट या एक घंटे तक केवल उसी पर काम किया जा सकता है।
इस दौरान फोन को साइलेंट या दूर रखना मददगार हो सकता है। गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद किए जा सकते हैं और सोशल मीडिया से दूरी बनाई जा सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि लगातार कई घंटे बिना आराम किए काम करना जरूरी है। आराम भी जरूरी है, लेकिन ब्रेक जानबूझकर और तय समय पर लिया जाए तो फोकस बार-बार टूटने से बच सकता है।
मल्टीटास्किंग हमेशा फायदेमंद नहीं
कई लोगों को लगता है कि एक साथ कई काम करना ज्यादा प्रोडक्टिव होने की निशानी है। ईमेल लिखते हुए मैसेज का जवाब देना, मीटिंग के दौरान दूसरा काम करना या पढ़ाई करते हुए सोशल मीडिया देखते रहना सामान्य लग सकता है।
लेकिन व्यवहार में ऐसा करने पर ध्यान बार-बार एक काम से दूसरे काम की तरफ जाता है। इससे गलतियां बढ़ सकती हैं और किसी एक काम को पूरा करने में अधिक समय लग सकता है।
इसके बजाय जरूरी कामों को प्राथमिकता के अनुसार पूरा करना ज्यादा आसान तरीका हो सकता है। पहले एक महत्वपूर्ण टास्क खत्म करें और फिर दूसरे पर जाएं।
हर ब्रेक खराब नहीं होता
यह समझना भी जरूरी है कि राज शमानी की बात का अर्थ ब्रेक लेना बंद करना नहीं है। लंबे समय तक काम करते रहने पर शरीर और दिमाग दोनों को आराम की जरूरत होती है। छोटे और तय ब्रेक ऊर्जा बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
समस्या तब शुरू होती है जब ब्रेक बिना योजना के बार-बार होने लगते हैं। पांच मिनट काम करने के बाद फोन देखना और फिर कुछ देर बाद दोबारा ध्यान भटकना उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए काम और ब्रेक दोनों का समय तय करना उपयोगी हो सकता है।
फोन को बनाएं कम विचलित करने वाला
आज काम के बीच सबसे बड़े डिस्ट्रैक्शन में स्मार्टफोन शामिल है। फोन जरूरी भी है, लेकिन उसी में सोशल मीडिया, मैसेज, वीडियो और दूसरी चीजें मौजूद होने के कारण ध्यान आसानी से भटक सकता है।
महत्वपूर्ण काम के दौरान गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद करना, फोन को मेज से दूर रखना या केवल जरूरी कॉल की अनुमति देना मददगार हो सकता है। इससे हर कुछ मिनट में स्क्रीन देखने की आदत को कम किया जा सकता है।
एक घंटे का काम सच में एक घंटे में हो सकता है
राज शमानी की पोस्ट का मूल संदेश यही है कि कई बार समस्या काम की मात्रा नहीं, बल्कि उसे करने के तरीके में होती है। अगर कोई काम वास्तव में एक घंटे में पूरा हो सकता है, लेकिन बीच में दस बार ध्यान भटक रहा है, तो वही काम तीन या चार घंटे तक खिंच सकता है।
ऐसे में समाधान खुद को आलसी मानना नहीं, बल्कि यह देखना है कि आपका ध्यान कहां-कहां टूट रहा है।
दिन के आखिर में ज्यादा घंटे काम करना ही सफलता का पैमाना नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उन घंटों में कितना काम वास्तव में पूरा हुआ। बिना जरूरत फोन देखने, बार-बार टास्क बदलने और अनियोजित ब्रेक को कम करके काम की रफ्तार बेहतर की जा सकती है।
अगर एक घंटे के लिए पूरी तरह किसी एक काम पर फोकस किया जाए, तो संभव है कि शाम तक थकान भी कम महसूस हो और कामों की अधूरी सूची भी छोटी रह जाए। यानी कई बार उत्पादकता बढ़ाने के लिए ज्यादा काम करने की नहीं, बल्कि कम व्यवधान के साथ काम करने की जरूरत होती है।
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