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नई दिल्ली। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर दुनिया के प्रमुख अर्थशास्त्रियों का भरोसा मजबूत हुआ है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के ताजा **Chief Economists’ Outlook** सर्वे में भारत को शामिल प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत ग्रोथ आउटलुक मिला है। सर्वे में शामिल 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों ने अगले 12 महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि को ‘मजबूत’ या ‘बहुत मजबूत’ रहने की उम्मीद जताई है।खास बात यह है कि मई में केवल 52 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने भारत के लिए मजबूत या बहुत मजबूत ग्रोथ की उम्मीद जताई थी। यानी कुछ महीनों में भारत को लेकर आर्थिक भरोसे में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। कुल मिलाकर 98 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की वृद्धि कम से कम मध्यम या उससे बेहतर रह सकती है।
92 मुख्य अर्थशास्त्रियों ने सर्वे में लिया हिस्सा
WEF की रिपोर्ट में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े कुल 92 मुख्य अर्थशास्त्रियों के विचार शामिल किए गए हैं। सर्वे में भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन, मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका, मध्य एशिया और उप-सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों के आर्थिक परिदृश्य का आकलन किया गया है।रिपोर्ट में भारत के आर्थिक परिदृश्य को इन क्षेत्रों के मुकाबले विशेष रूप से मजबूत बताया गया है। मजबूत घरेलू मांग को भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकतों में गिना गया है।
74 प्रतिशत को मजबूत ग्रोथ का भरोसा
भारत को लेकर सर्वे के आंकड़े खासे सकारात्मक हैं। 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों ने अगले एक साल में मजबूत या बहुत मजबूत वृद्धि की संभावना जताई है। मई के सर्वे में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था।इसके साथ 98 प्रतिशत उत्तरदाताओं को भारत में मध्यम या उससे बेहतर आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताओं के बावजूद सर्वे में शामिल अर्थशास्त्री भारत की घरेलू आर्थिक गतिविधियों को अपेक्षाकृत मजबूत मान रहे हैं।हालांकि यह किसी निश्चित आर्थिक परिणाम की भविष्यवाणी नहीं है। सर्वे अर्थशास्त्रियों की अपेक्षाओं को दर्शाता है और वास्तविक वृद्धि ऊर्जा कीमतों, वैश्विक व्यापार, महंगाई, निवेश तथा भू-राजनीतिक घटनाक्रम जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी।
चीन के लिए कमजोर हुआ भरोसा
WEF सर्वे में चीन को लेकर तस्वीर भारत की तुलना में कमजोर हुई है। ताजा रिपोर्ट में चीन के आर्थिक प्रदर्शन को लेकर अर्थशास्त्रियों का भरोसा मई के मुकाबले कम हुआ है। चीन लंबे समय से दुनिया की प्रमुख ग्रोथ इंजन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है, लेकिन संपत्ति बाजार की चुनौतियां, घरेलू मांग और क्रेडिट ग्रोथ जैसे मुद्दे उसके आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित कर रहे हैं।मई 2026 के WEF आउटलुक में 77 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने चीन में मध्यम या उससे बेहतर ग्रोथ की उम्मीद जताई थी। उस समय निर्यात और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग को चीन के लिए सहायक कारकों के रूप में देखा गया था।
यूरोप का आउटलुक भी कमजोर
यूरोप की आर्थिक वृद्धि को लेकर भी चुनौतीपूर्ण तस्वीर बनी हुई है। मई की WEF रिपोर्ट में 65 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यूरोप में कमजोर या बहुत कमजोर ग्रोथ की संभावना जताई थी। ऊर्जा संबंधी झटके और महंगाई के साथ कमजोर वृद्धि ने यूरोप के लिए स्टैगफ्लेशन से जुड़े जोखिम बढ़ाए थे।ताजा सर्वे में भारत के मजबूत आउटलुक के मुकाबले यूरोप अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्रों में बना हुआ है। इसीलिए भारत का प्रदर्शन वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अधिक प्रमुखता से सामने आया है।
भारत की ग्रोथ 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान
WEF रिपोर्ट में भारत की अर्थव्यवस्था के वित्त वर्ष 2026-27 में 6.7 प्रतिशत की दर से बढ़ने की संभावना का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक मजबूत घरेलू मांग आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे सकती है। हालांकि ऊंची ऊर्जा कीमतों को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम के रूप में देखा गया है।भारत बड़े पैमाने पर ऊर्जा आयात पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और दूसरी ऊर्जा वस्तुओं की कीमतों में तेज बढ़ोतरी महंगाई, व्यापार संतुलन और कंपनियों की लागत को प्रभावित कर सकती है।
घरेलू मांग बनी बड़ी ताकत
भारत के आर्थिक आउटलुक में घरेलू मांग को प्रमुख सहारा माना गया है। बड़ी आबादी, खपत और घरेलू आर्थिक गतिविधियां वैश्विक बाहरी झटकों के असर को कुछ हद तक सीमित करने में भूमिका निभा सकती हैं। WEF की मई रिपोर्ट में भी भारत को उन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया गया था जिनकी वृद्धि घरेलू मांग के कारण अपेक्षाकृत मजबूत रह सकती है।इसका मतलब यह नहीं है कि भारत वैश्विक जोखिमों से पूरी तरह सुरक्षित है। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कमजोरी और वित्तीय बाजारों की अस्थिरता जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकते हैं।
रोजगार को लेकर ज्यादातर विशेषज्ञों को स्थिरता की उम्मीद
WEF सर्वे में भारत के रोजगार बाजार को लेकर भी अपेक्षाकृत स्थिर तस्वीर सामने आई है। करीब 70 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में बेरोजगारी की स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं होगा। 17 प्रतिशत ने बेरोजगारी बढ़ने और 13 प्रतिशत ने इसमें कमी आने की संभावना जताई।रिपोर्ट में अगस्त में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी के लिए बेरोजगारी दर 5 प्रतिशत रहने का उल्लेख किया गया है, जो जुलाई में 5.1 प्रतिशत थी। इसी अवधि में लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट 55.4 प्रतिशत से बढ़कर 55.6 प्रतिशत हुआ।
महंगाई पर भी नजर
भारत की मजबूत वृद्धि के बावजूद महंगाई एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। WEF रिपोर्ट के मुताबिक 55 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में भारत में मध्यम स्तर की महंगाई की उम्मीद है, जबकि 45 प्रतिशत ने उच्च महंगाई की संभावना जताई है। मई में 61 प्रतिशत उत्तरदाताओं को उच्च या बहुत उच्च महंगाई की आशंका थी।रिपोर्ट में अगस्त की उपभोक्ता महंगाई 4.8 प्रतिशत बताई गई है। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर थी, लेकिन 2 से 6 प्रतिशत की निर्धारित सहनशीलता सीमा के भीतर रही।
ब्याज दरों में बदलाव की उम्मीद कम
सर्वे में शामिल 67 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की मौद्रिक नीति में अगले 12 महीनों में बड़ा बदलाव नहीं होगा। वहीं 24 प्रतिशत को नीति सख्त होने की संभावना दिखाई देती है। रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त में नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखी गई थी और रुख न्यूट्रल था।राजकोषीय नीति को लेकर भी 72 प्रतिशत उत्तरदाताओं को स्थिरता की उम्मीद है, जबकि 22 प्रतिशत ने नीति कुछ ढीली होने की संभावना जताई है।
वैश्विक जोखिम अभी खत्म नहीं
भारत के लिए सकारात्मक सर्वे के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने जोखिम बने हुए हैं। WEF की पिछली रिपोर्टों ने भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा और खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव, सप्लाई चेन में व्यवधान और वित्तीय बाजारों की अस्थिरता को प्रमुख चिंताओं में शामिल किया है।ऐसे में 74 प्रतिशत विशेषज्ञों का भारत में मजबूत या बहुत मजबूत ग्रोथ का अनुमान महत्वपूर्ण संकेत जरूर है, लेकिन इसे निश्चित नतीजे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिलहाल WEF सर्वे यह दिखाता है कि प्रमुख वैश्विक क्षेत्रों की तुलना में भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर अर्थशास्त्रियों की अपेक्षाएं सबसे मजबूत बनी हुई हैं।
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