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निफ्टी में 11% की भारी गिरावट

Ashish verma
11 Oct 2026 6:53 PM IST
निफ्टी में 11% की भारी गिरावट
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नई दिल्ली। नवरात्रि 2025 से नवरात्रि 2026 के बीच भारतीय शेयर बाजार के लिए चुनौतीपूर्ण समय रहा है। मजबूत घरेलू आर्थिक वृद्धि और घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) के समर्थन के बावजूद वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों ने बाजार की रफ्तार पर असर डाला है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में निफ्टी इंडेक्स में करीब 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि इसके अधिकांश घटकों ने निवेशकों को नकारात्मक रिटर्न दिया। बाजार की इस कमजोरी के पीछे विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये में कमजोरी और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी जैसे कारकों को प्रमुख माना जा रहा है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था के घरेलू संकेतक मजबूत रहने के बावजूद बाहरी चुनौतियों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने बाजार पर दबाव बढ़ाया। इसके साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार निकासी ने शेयर बाजार की स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया।
एक साल में निफ्टी में 11 प्रतिशत की गिरावट
नवरात्रि 2025 से नवरात्रि 2026 के बीच निफ्टी इंडेक्स में करीब 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस दौरान इंडेक्स में शामिल अधिकांश शेयरों ने नकारात्मक रिटर्न दिया।
निफ्टी भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांकों में से एक है। इसमें देश की बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर शामिल होते हैं। ऐसे में इस सूचकांक में गिरावट व्यापक बाजार की स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इस अवधि में बाजार की कमजोरी का असर निवेशकों की धारणा पर भी पड़ा। हालांकि, निफ्टी में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि सभी शेयरों में समान नुकसान हुआ। अलग-अलग कंपनियों और क्षेत्रों का प्रदर्शन अलग हो सकता है।
विदेशी निवेशकों ने निकाले 3.04 लाख करोड़ रुपये
भारतीय शेयर बाजार में गिरावट की प्रमुख वजहों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार बिकवाली को शामिल किया गया है।उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 3.04 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की है।इससे पहले वर्ष 2025 में भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने करीब 1.66 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की थी।
लगातार दो वर्षों में विदेशी निवेशकों की ओर से बड़े पैमाने पर बिकवाली ने भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बनाया है।विदेशी निवेशकों की गतिविधियां बाजार में पूंजी प्रवाह और निवेशकों की धारणा को प्रभावित करती हैं। जब विदेशी निवेशक बड़ी मात्रा में शेयर बेचते हैं, तो बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है।
अमेरिका-ईरान तनाव से कच्चे तेल की कीमतों पर असर
बाजार की कमजोरी के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को भी एक महत्वपूर्ण कारण बताया गया है।भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है। इससे तेल की कीमतों में तेजी आने की आशंका बढ़ती है।भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश के आयात खर्च पर असर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी परिवहन, उत्पादन और अन्य आर्थिक गतिविधियों की लागत को भी प्रभावित कर सकती है।विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की बढ़ती कीमतों से जुड़ी चिंताओं ने भारतीय शेयर बाजार की धारणा पर नकारात्मक प्रभाव डाला।
रुपये में कमजोरी ने बढ़ाई बाजार की चिंता
भारतीय रुपये में कमजोरी भी शेयर बाजार पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रही।जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य गिरता है, तो आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। विशेष रूप से कच्चे तेल जैसी वस्तुओं के आयात पर इसका प्रभाव पड़ता है।रुपये की कमजोरी विदेशी निवेशकों के निवेश संबंधी फैसलों को भी प्रभावित कर सकती है।
विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों से मिलने वाले रिटर्न के साथ मुद्रा विनिमय दर में होने वाले बदलावों पर भी ध्यान देते हैं।ऐसे में रुपये में लगातार कमजोरी विदेशी निवेशकों की चिंता बढ़ा सकती है। बाजार विशेषज्ञों ने इस कारक को भी भारतीय शेयर बाजार की गिरावट से जोड़कर देखा है।
वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का दबाव
भारतीय शेयर बाजार की कमजोरी के पीछे वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी को भी एक कारण माना जा रहा है।बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर निवेशकों को ऋण प्रतिभूतियों से अपेक्षाकृत अधिक रिटर्न मिलने की संभावना बन सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में कुछ बड़े निवेशक शेयर बाजार की तुलना में बॉन्ड जैसे निवेश विकल्पों को प्राथमिकता दे सकते हैं।विशेष रूप से अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बदलाव का असर वैश्विक पूंजी प्रवाह पर पड़ सकता है।
जब विकसित अर्थव्यवस्थाओं में निवेश के विकल्प अधिक आकर्षक होते हैं, तो उभरते बाजारों से पूंजी निकासी का दबाव बढ़ सकता है।भारतीय शेयर बाजार भी वैश्विक निवेश प्रवाह में होने वाले ऐसे बदलावों से प्रभावित हो सकता है।
घरेलू संस्थागत निवेशकों ने दिया समर्थन
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।घरेलू संस्थागत निवेशकों में म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां और अन्य भारतीय वित्तीय संस्थान शामिल होते हैं।इन संस्थानों का निवेश बाजार में मांग बनाए रखने में मदद कर सकता है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली के समय घरेलू संस्थानों की खरीदारी बाजार को कुछ हद तक सहारा दे सकती है।
हालांकि, घरेलू निवेशकों के समर्थन के बावजूद नवरात्रि 2025 से नवरात्रि 2026 के बीच निफ्टी में गिरावट दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।यह स्थिति दर्शाती है कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव इस अवधि में महत्वपूर्ण रहा।
मजबूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद बाजार कमजोर
भारतीय अर्थव्यवस्था की घरेलू वृद्धि को मजबूत बताया गया है, लेकिन इसका पूरा लाभ शेयर बाजार के प्रदर्शन में दिखाई नहीं दिया।अर्थव्यवस्था की वृद्धि और शेयर बाजार का प्रदर्शन हमेशा एक समान दिशा में नहीं चलते।शेयर बाजार में कंपनियों के मुनाफे, निवेशकों की अपेक्षाओं, ब्याज दरों, वैश्विक परिस्थितियों और पूंजी प्रवाह जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है।
इसी कारण मजबूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद शेयर बाजार में गिरावट संभव है।नवरात्रि 2025 से नवरात्रि 2026 के बीच भारतीय बाजार की स्थिति में भी घरेलू आर्थिक मजबूती और वैश्विक चुनौतियों के बीच यही अंतर देखने को मिला।
निवेशकों के लिए आगे क्या महत्वपूर्ण?
भारतीय शेयर बाजार की आगामी दिशा तय करने में विदेशी निवेशकों का रुख, कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की स्थिति और वैश्विक बॉन्ड यील्ड महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।इसके अलावा, घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां और भारतीय कंपनियों का वित्तीय प्रदर्शन भी बाजार की धारणा को प्रभावित करेंगे।बाजार में निवेश करने वाले लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि शेयरों की कीमतें घरेलू आर्थिक परिस्थितियों के साथ अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों से भी प्रभावित होती हैं।
कुल मिलाकर, उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नवरात्रि 2025 से नवरात्रि 2026 के बीच भारतीय शेयर बाजार को विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इस अवधि में निफ्टी में करीब 11 प्रतिशत की गिरावट और वर्ष 2026 में विदेशी निवेशकों की 3.04 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी बाजार पर बने दबाव को दर्शाती है।
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