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पेट्रोल डीजल की कीमतों पर बढ़ा दबाव कच्चे तेल के भाव ने बढ़ाई टेंशन

Ratna Netam
2 Sept 2026 6:10 PM IST
पेट्रोल डीजल की कीमतों पर बढ़ा दबाव कच्चे तेल के भाव ने बढ़ाई टेंशन
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नई दिल्ली।पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। इसकी एक वजह देश में एथनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी **E20** को लेकर चल रही बहस है, जबकि दूसरी बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि एथनॉल की वजह से सीधे पेट्रोल या डीजल के दाम बढ़ने वाले हैं। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 2 सितंबर 2026 को देश की सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है।
इसके बावजूद आने वाले दिनों में अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि वाहन मालिकों और आम उपभोक्ताओं की नजर पेट्रोल-डीजल के अगले संभावित रिवीजन पर है।
एथनॉल को लेकर क्यों मची है बहस?
भारत ने पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की नीति को ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से आगे बढ़ाया है। देश में अब सामान्य पेट्रोल में **20 प्रतिशत तक एथनॉल मिश्रण यानी E20** का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों में भी 20 प्रतिशत एथनॉल ब्लेंडिंग दर्ज है।
सरकार का कहना है कि एथनॉल ब्लेंडिंग का उद्देश्य रोजाना पेट्रोल की खुदरा कीमत कम करना नहीं है। इसका बड़ा मकसद विदेश से आने वाले कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि अगर एथनॉल ब्लेंडिंग नहीं होती तो हालिया वैश्विक तेल कीमतों के दौर में पेट्रोल की कीमत काफी ज्यादा हो सकती थी।
यानी एथनॉल का इस्तेमाल अपने आप में पेट्रोल महंगा करने का कारण नहीं है। पेट्रोल की कीमत तय होने में कई दूसरे कारक भी शामिल होते हैं।
क्या एथनॉल से पेट्रोल महंगा होगा?
यह सवाल फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। दरअसल, एथनॉल की कीमत और पेट्रोल की कीमत अलग-अलग होती है। पेट्रोल में एथनॉल मिलाने से ईंधन की संरचना बदलती है, लेकिन इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि उपभोक्ता के लिए पेट्रोल की कीमत बढ़ जाएगी।
सरकार ने जुलाई में स्पष्ट किया था कि फिलहाल नियमित पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण 20 प्रतिशत से आगे बढ़ाने का कोई फैसला नहीं हुआ है। साथ ही E0 या E10 पेट्रोल को देशभर में फिर से उपलब्ध कराने का भी कोई तत्काल प्रस्ताव नहीं बताया गया था। प्रीमियम पेट्रोल की कुछ श्रेणियां फिलहाल एथनॉल-मुक्त बनी हुई हैं।
हालांकि, अगस्त में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने E20 के साथ कम एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन विकल्प उपलब्ध कराने की जरूरत पर राय रखी थी। इसका संबंध खासकर पुराने वाहनों की जरूरतों और उपभोक्ताओं को विकल्प देने से है।
पेट्रोल-डीजल की कीमत पर असली दबाव कहां से आता है?
पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर सबसे बड़ा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों का पड़ता है। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, डीलर कमीशन और केंद्र व राज्य सरकारों के टैक्स भी कीमत तय करने में भूमिका निभाते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल बढ़ने का असर हमेशा उसी दिन पेट्रोल पंप पर दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है।
इस समय कच्चे तेल को लेकर चिंता इसलिए बढ़ी है क्योंकि पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने सप्लाई को लेकर आशंकाएं बढ़ा दी हैं। 1 सितंबर को ब्रेंट क्रूड में करीब 4.6 प्रतिशत की तेजी आई और यह 94.65 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। इसके बाद 2 सितंबर को भी कीमतें लगभग 97 डॉलर के करीब पहुंच गई थीं, हालांकि बाद में इनमें कुछ नरमी आई।
डीजल पर भी क्यों बढ़ सकती है चिंता?
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल पर नहीं पड़ता। डीजल की कीमत भी अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, रिफाइनिंग लागत और घरेलू मूल्य निर्धारण से प्रभावित होती है। डीजल का इस्तेमाल परिवहन, कृषि, निर्माण और उद्योगों में बड़े पैमाने पर होता है। इसलिए अगर डीजल महंगा होता है तो इसका असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि माल ढुलाई से लेकर कई वस्तुओं की लागत तक पहुंच सकता है।
हालांकि, फिलहाल 2 सितंबर को सरकारी तेल कंपनियों ने प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखी हैं। दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर बताया गया है। मुंबई में पेट्रोल 111.21 रुपये और डीजल 97.83 रुपये प्रति लीटर रहा।
क्या जल्द बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
फिलहाल किसी तत्काल बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक 95-100 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर बना रहता है तो घरेलू तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। बाजार सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों में भी कहा गया है कि 85-90 डॉलर के आसपास तेल कंपनियां दबाव को संभाल सकती हैं, लेकिन कीमतें लंबे समय तक 95-100 डॉलर से ऊपर रहने पर खुदरा ईंधन कीमतों में बदलाव की संभावना बढ़ सकती है।
इसका अर्थ यह है कि **पेट्रोल-डीजल महंगा होने का तत्काल कारण एथनॉल नहीं, बल्कि मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमत और उससे जुड़े आर्थिक कारक होंगे।**
E20 को लेकर उपभोक्ताओं की चिंता
एथनॉल पर चर्चा केवल कीमत को लेकर नहीं है। कई वाहन मालिक E20 पेट्रोल के माइलेज, इंजन के प्रदर्शन और पुराने वाहनों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। सरकार और ऑटोमोबाइल उद्योग की ओर से इस संबंध में कई स्पष्टीकरण दिए गए हैं, लेकिन उपभोक्ताओं के बीच बहस अभी जारी है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोल पंपों और ईंधन बिलों पर पेट्रोल में एथनॉल की सटीक मात्रा अनिवार्य रूप से बताने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इससे फिलहाल मौजूदा व्यवस्था में कोई अनिवार्य बदलाव नहीं हुआ है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
अगर आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर वाहन मालिकों के मासिक बजट पर पड़ेगा। पेट्रोल की कीमत बढ़ने से निजी वाहन चलाने की लागत बढ़ सकती है, जबकि डीजल की कीमत बढ़ने का व्यापक असर माल ढुलाई और परिवहन लागत पर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ अगर कच्चे तेल की कीमतें नीचे आती हैं या वैश्विक सप्लाई की स्थिति सामान्य होती है तो ईंधन कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण संकेत अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार से मिलेंगे।
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