
नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट बैंक यानी FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम के तहत पूंजी प्रवाह में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 31 अगस्त तक इस सुविधा के जरिए कैपिटल इनफ्लो 100 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया। यह आंकड़ा विदेशी निवेशकों और नॉन-रेसिडेंट भारतीयों यानी NRI की इस व्यवस्था में मजबूत दिलचस्पी को दिखाता है। विदेशी मुद्रा जुटाने के लिहाज से यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
'फाइनेंशियल टाइम्स' की एक रिपोर्ट के अनुसार, RBI की विशेष स्वैप सुविधा ने केवल FCNR(B) डिपॉजिट ही नहीं, बल्कि एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) और ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग (OFCB) के जरिए भी फंड जुटाने में मदद की है। इस व्यवस्था के तहत बैंकों और संबंधित संस्थानों को विदेशी मुद्रा के प्रवाह को आकर्षित करने का अवसर मिला।
100 अरब डॉलर के पार पहुंचा कैपिटल इनफ्लो
31 अगस्त तक FCNR(B) डिपॉजिट व्यवस्था के तहत पूंजी प्रवाह 100 अरब डॉलर का स्तर पार कर गया। इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा का आना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि विदेशी निवेशकों और प्रवासी भारतीयों ने इस विकल्प में काफी रुचि दिखाई।
FCNR(B) खाते विशेष रूप से नॉन-रेसिडेंट भारतीयों के लिए होते हैं। इनमें जमा राशि विदेशी मुद्रा में रखी जाती है। इस तरह की डिपॉजिट व्यवस्था NRI जमाकर्ताओं को अपनी विदेशी मुद्रा को भारतीय बैंकिंग सिस्टम में रखने का विकल्प उपलब्ध कराती है।
बड़े पैमाने पर आए इस फंड को भारत में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता और बैंकिंग सिस्टम के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव रहता है, विदेशी मुद्रा का मजबूत प्रवाह अर्थव्यवस्था के लिए अहम भूमिका निभा सकता है।
RBI की स्पेशल स्वैप सुविधा से मिला समर्थन
रिपोर्ट के मुताबिक RBI की स्पेशल स्वैप सुविधा ने विदेशी मुद्रा जुटाने की प्रक्रिया को समर्थन दिया। इसके जरिए बैंकों को FCNR(B) डिपॉजिट के साथ ECB और OFCB के माध्यम से जुटाए गए फंड के लिए भी व्यवस्था उपलब्ध कराई गई।
स्वैप व्यवस्था का इस्तेमाल विदेशी मुद्रा से जुड़े जोखिमों को संभालने के लिए किया जाता है। बैंकों के लिए इस तरह की सुविधा विदेशी मुद्रा में फंड जुटाने को अधिक व्यावहारिक बना सकती है। यही कारण है कि विशेष व्यवस्था के दौरान बड़ी मात्रा में पूंजी आकर्षित हुई।
FCNR(B) सुविधा सोमवार को हुई बंद
FCNR(B) से जुड़ी विशेष सुविधा सोमवार को बंद हो गई है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इससे जुड़े सभी लेनदेन तत्काल समाप्त हो गए हैं। जिन डिपॉजिट के लिए निर्धारित समयसीमा के भीतर समझौते किए गए हैं, उनके लिए बैंकों को RBI की स्वैप व्यवस्था का लाभ आगे भी मिल सकेगा।
जानकारी के अनुसार, 11 सितंबर तक किए गए पात्र डिपॉजिट एग्रीमेंट के लिए बैंकों को RBI के स्वैप अरेंजमेंट का समर्थन मिलता रहेगा। इससे पहले से प्रक्रिया में मौजूद लेनदेन को पूरा करने के लिए बैंकों को अतिरिक्त समय मिल जाएगा।
तीन से पांच साल की मैच्योरिटी
इन स्वैप एग्रीमेंट की मैच्योरिटी अवधि तीन से पांच साल रखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, जुटाई गई राशि का बड़ा हिस्सा पांच साल की अवधि वाले अरेंजमेंट के जरिए आया है। लंबी अवधि के लिए फंड जुटाया जाना बैंकिंग सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे अपेक्षाकृत स्थिर विदेशी मुद्रा संसाधन उपलब्ध होते हैं।
पांच साल की अवधि को लेकर ज्यादा दिलचस्पी यह भी दिखाती है कि जमाकर्ताओं और संबंधित पक्षों ने लंबी अवधि के विकल्प को प्राथमिकता दी है।
NRI निवेशकों के लिए क्या है FCNR(B)?
FCNR(B) का पूरा नाम फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) अकाउंट है। यह भारतीय बैंकों में NRI के लिए उपलब्ध विदेशी मुद्रा डिपॉजिट का एक माध्यम है। इसमें जमा राशि निर्धारित विदेशी मुद्राओं में रखी जा सकती है।
चूंकि डिपॉजिट विदेशी मुद्रा में होता है, इसलिए यह सामान्य रुपये वाले NRI डिपॉजिट से अलग है। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए यह अपनी विदेशी मुद्रा की बचत को भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में रखने का एक विकल्प प्रदान करता है।
ECB और OFCB से भी जुटाया गया फंड
RBI की विशेष व्यवस्था का असर केवल FCNR(B) डिपॉजिट तक सीमित नहीं रहा। रिपोर्ट के मुताबिक एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग और ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग के जरिए भी फंड जुटाने में मदद मिली।
ECB के माध्यम से पात्र भारतीय संस्थाएं विदेशी स्रोतों से पूंजी जुटाती हैं। विदेशी बाजार से पूंजी हासिल करने के लिए कंपनियां और अन्य पात्र संस्थाएं इस विकल्प का इस्तेमाल करती हैं। RBI की स्वैप सुविधा ने इस तरह जुटाई गई विदेशी मुद्रा को लेकर भी समर्थन प्रदान किया।
विदेशी मुद्रा प्रवाह के लिए अहम घटनाक्रम
FCNR(B) के तहत 100 अरब डॉलर से ज्यादा का कैपिटल इनफ्लो भारतीय वित्तीय व्यवस्था के लिए एक बड़ा आंकड़ा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि विशेष सुविधा के दौरान विदेशी मुद्रा आधारित निवेश और डिपॉजिट के लिए अच्छी मांग रही।
हालांकि इस सुविधा का निर्धारित चरण बंद हो चुका है, लेकिन 11 सितंबर तक पात्र डिपॉजिट एग्रीमेंट के लिए स्वैप व्यवस्था का समर्थन जारी रहेगा। इसके बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है कि कुल मिलाकर इस व्यवस्था के माध्यम से कितनी विदेशी मुद्रा जुटाई गई।
अब बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि इस बड़े विदेशी मुद्रा प्रवाह का बैंकिंग सिस्टम और विदेशी मुद्रा की उपलब्धता पर आगे क्या असर पड़ता है। साथ ही पांच साल की अवधि वाले स्वैप में अधिक फंड आने के कारण इसका प्रभाव लंबी अवधि तक देखने को मिल सकता है।





