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मुश्किल क्षेत्रों की नेचुरल गैस पर बढ़ी कीमत सीमा

Ashish verma
4 Oct 2026 6:51 PM IST
मुश्किल क्षेत्रों की नेचुरल गैस पर बढ़ी कीमत सीमा
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नई दिल्ली। सरकार ने मुश्किल और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों से उत्पादित नेचुरल गैस के लिए अधिकतम कीमत सीमा बढ़ाने का फैसला किया है। डीपवाटर, अल्ट्रा-डीपवाटर और हाई-प्रेशर, हाई-टेंपरेचर यानी एचपीएचटी क्षेत्रों से निकलने वाली गैस के लिए अब सीलिंग प्राइस 9.89 डॉलर प्रति MMBtu तय की गई है। इससे पहले इन क्षेत्रों की गैस के लिए अधिकतम कीमत 8.90 डॉलर प्रति MMBtu थी। नई कीमत सीमा 1 अक्टूबर 2026 से लागू होकर 31 मार्च 2027 तक प्रभावी रहेगी।
सरकार के इस फैसले को मुश्किल गैस क्षेत्रों में उत्पादन करने वाली कंपनियों के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे क्षेत्रों में गैस की खोज और उत्पादन सामान्य गैस क्षेत्रों की तुलना में काफी जटिल और महंगा होता है। समुद्र की अधिक गहराई, दबाव, तापमान और तकनीकी चुनौतियों के कारण कंपनियों को अतिरिक्त निवेश करना पड़ता है। ऐसे में कीमत सीमा बढ़ने से उत्पादकों को अपनी लागत की भरपाई करने में कुछ मदद मिल सकती है।
क्या है नेचुरल गैस की सीलिंग प्राइस?
नेचुरल गैस की कीमत तय करने की व्यवस्था में सरकार कुछ क्षेत्रों से निकलने वाली गैस के लिए अधिकतम कीमत सीमा निर्धारित करती है। इसे सीलिंग प्राइस कहा जाता है। इसका मतलब है कि संबंधित श्रेणी की गैस की कीमत निर्धारित सीमा से ऊपर नहीं जा सकती।
मुश्किल क्षेत्रों से निकलने वाली गैस के मामले में यह सीमा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन क्षेत्रों में उत्पादन लागत सामान्य गैस क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती है। यदि बाजार में गैस की कीमतों पर दबाव रहता है और उत्पादकों को सीमित कीमत पर ही गैस बेचनी पड़ती है, तो महंगी परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है।
अब सीलिंग प्राइस को 8.90 डॉलर से बढ़ाकर 9.89 डॉलर प्रति MMBtu करने से उत्पादकों को प्रति यूनिट गैस पर अधिक कीमत प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।
किन क्षेत्रों को मिलेगा फायदा?
नई कीमत सीमा मुख्य रूप से डीपवाटर, अल्ट्रा-डीपवाटर और हाई-प्रेशर, हाई-टेंपरेचर क्षेत्रों से निकलने वाली गैस पर लागू होगी। इन क्षेत्रों में गैस उत्पादन सामान्य क्षेत्रों की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।
डीपवाटर और
अल्ट्रा-डीपवाटर
परियोजनाओं में समुद्र के भीतर काफी गहराई तक ड्रिलिंग करनी पड़ती है। इसके लिए विशेष उपकरण, आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत होती है। वहीं हाई-प्रेशर और हाई-टेंपरेचर वाले क्षेत्रों में भी उत्पादन के दौरान अलग तरह के तकनीकी जोखिम सामने आते हैं।
इन परिस्थितियों में गैस की कीमत में मामूली बदलाव भी परियोजनाओं की कमाई और निवेश के फैसलों पर असर डाल सकता है।
कंपनियों को मिल सकती है राहत
कीमत सीमा बढ़ने का सबसे सीधा फायदा मुश्किल क्षेत्रों में काम कर रही गैस उत्पादक कंपनियों को मिल सकता है। उत्पादन लागत अधिक होने के कारण ऐसी परियोजनाओं में निवेश का जोखिम भी ज्यादा होता है। अधिक कीमत मिलने से कंपनियों के लिए इन क्षेत्रों में उत्पादन जारी रखना या नई परियोजनाओं में निवेश करना अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकता है।
गैस उत्पादन में बड़े पैमाने पर शुरुआती निवेश की जरूरत होती है। खोज, ड्रिलिंग, उत्पादन सुविधाओं और परिवहन से जुड़ा खर्च काफी अधिक हो सकता है। इसलिए सरकार की ओर से कीमत सीमा में किया गया बदलाव कंपनियों के लिए आर्थिक दबाव कम करने में मददगार हो सकता है।
देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए भी अहम
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए लंबे समय से घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने पर जोर देता रहा है। घरेलू स्तर पर नेचुरल गैस का उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
नेचुरल गैस का इस्तेमाल बिजली उत्पादन, उर्वरक, सीएनजी, औद्योगिक ईंधन और कई अन्य क्षेत्रों में होता है। इसलिए घरेलू गैस उत्पादन में बढ़ोतरी का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उद्योग और परिवहन सहित कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
मुश्किल क्षेत्रों से गैस उत्पादन को बढ़ावा मिलने पर देश के घरेलू गैस संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल संभव हो सकता है।
कीमत बढ़ने का उपभोक्ताओं पर क्या असर होगा?
कीमत सीमा बढ़ाए जाने का असर केवल उत्पादक कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। गैस की कीमत उत्पादन लागत और बाजार की परिस्थितियों के साथ जुड़ी होती है। हालांकि, अंतिम उपभोक्ता पर इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि गैस किस क्षेत्र में इस्तेमाल हो रही है और कीमतों में कितना बदलाव आता है।
उर्वरक, बिजली, सीएनजी और औद्योगिक क्षेत्र गैस के बड़े उपभोक्ता हैं। इसलिए गैस की कीमतों में बदलाव का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से दिखाई दे सकता है। लेकिन सीलिंग प्राइस में बढ़ोतरी का उद्देश्य मुख्य रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में गैस उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखना है।
31 मार्च 2027 तक लागू रहेगा फैसला
सरकार द्वारा तय नई सीलिंग प्राइस 1 अक्टूबर 2026 से 31 मार्च 2027 तक लागू रहेगी। यानी इस अवधि के दौरान संबंधित मुश्किल क्षेत्रों से उत्पादित गैस के लिए अधिकतम कीमत 9.89 डॉलर प्रति MMBtu होगी।
इसके बाद सरकार बाजार की स्थिति, उत्पादन लागत और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए आगे की कीमत सीमा पर फैसला कर सकती है। इस तरह कीमत सीमा की समीक्षा समय-समय पर ऊर्जा बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप की जाती है।
कुल मिलाकर मुश्किल क्षेत्रों की नेचुरल गैस के लिए कीमत सीमा को 8.90 डॉलर से बढ़ाकर 9.89 डॉलर प्रति MMBtu करना गैस उत्पादकों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव है। इससे महंगी और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण परियोजनाओं को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। साथ ही घरेलू गैस उत्पादन को बढ़ावा देने और देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में भी यह फैसला अहम माना जा सकता है।
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