सऊदी समझौते से पाकिस्तान को नुकसान, पश्चिम एशिया संकट में फंस कर रह जाएगा: रिपोर्ट
नई दिल्ली: पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए डिफेंस समझौते ने इस्लामाबाद की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। एक रिपोर्ट दावा करती है कि रक्षा प्रतिबद्धताओं के कारण देश मध्य-पूर्व संघर्ष में फंस सकता है। यमन में रियाद और ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच तनाव बढ़ने से सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर दबाव बढ़ रहा है।
'द गार्डियन' की रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में यह रक्षा समझौता पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक फायदे जैसा लग रहा था। इसका प्रमाण है समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान मुनीर की मौजूदगी। पिछले साल सितंबर में रियाद में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ वो भी मौजूद थे।
इस समझौते के तहत, सऊदी अरब अरबों डॉलर का निवेश पाकिस्तान में करेगा और उसे कर्ज भी देगा, जबकि पाकिस्तान सऊदी सेना को प्रशिक्षित करेगा और किसी भी हमले की स्थिति में सऊदी अरब की रक्षा करेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने यह मान लिया था कि अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते सुधरेंगे। इसके साथ ही मध्य पूर्व और खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष खुद ही खत्म हो जाएगा। हालांकि, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर बमबारी शुरू करने और उसके बाद सऊदी अरब सहित खाड़ी देशों पर ईरान के मिसाइल हमलों के बाद स्थिति तेजी से बदली।
इसके बाद संघर्ष ने सऊदी अरब और यमन में ईरान समर्थित विद्रोही गुट 'हूती' के बीच टकराव को फिर से भड़का दिया। 'द गार्डियन' की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी-हूती के बीच हुआ नाजुक समझौता तब टूट गया जब हूती ने यमन के कुछ इलाकों पर कब्जा कर लिया। साथ ही सऊदी के कुछ इलाकों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। सऊदी अरब ने जवाब में यमन पर हवाई हमले किए, जिससे बड़े पैमाने पर संघर्ष की आशंका को बल मिला।
अगस्त में पाकिस्तान पर दबाव बढ़ गया जब सऊदी रक्षा समझौते का विस्तार करते हुए इसमें तुर्की को भी शामिल किया गया। फिर इसका नाम बदलकर 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' कर दिया गया। तीनों देश इस बात पर सहमत हुए कि "उनमें से किसी एक पर भी सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।"
इस रिपोर्ट में रक्षा विश्लेषक आयशा सिद्दीका को कोट किया गया है। वो कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि आसिम मुनीर ने इस क्षेत्र के सामने मौजूद खतरों का सही आकलन किया था—और यह भी कि पाकिस्तान को इतनी जल्दी अपनी सेना को मोर्चे पर उतारना पड़ सकता है।"
सऊदी अरब के पास लड़ाकू विमानों और अन्य युद्धक उपकरणों सहित काफी सैन्य साजो-सामान है, लेकिन उनके पास हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे युद्ध का अनुभव नहीं है। ऐसी दशा में पाकिस्तान की सेना रियाद के लिए बहुत काम की साबित हो सकती है, खासकर इसलिए क्योंकि उसकी सेना को सुरक्षा खतरों से निपटने का व्यापक अनुभव है।
'द गार्डियन' ने कुछ विश्लेषकों की राय के आधार पर कहा कि अगर सऊदी अरब हूती के खिलाफ मक्का समझौते को लागू करता है, तो पाकिस्तान पर सेना तैनात करने का दबाव पड़ सकता है, जिसमें ट्रेनिंग के लिए पहले से ही सऊदी अरब में तैनात हजारों सैनिक भी शामिल हो सकते हैं।
रिपोर्ट में सऊदी अरब पर पाकिस्तान की आर्थिक निर्भरता पर भी प्रकाश डाला गया है, जिसने हाल ही में इस्लामाबाद को 8 अरब डॉलर (6 अरब पाउंड) की धनराशि दी जिससे रक्षा उत्पादन व सहयोग में निवेश की संभावना बढ़ी।
इस बीच, खबर है कि पाकिस्तान के अधिकारी इस व्यापक संघर्ष में घसीटे जाने को लेकर चिंतित हैं। पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है और उसे अपनी सीमाओं पर उग्रवाद और अस्थिरता जैसी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर पाकिस्तान हूती के खिलाफ सीधे तौर पर शामिल होता है, तो इसे ईरान के खिलाफ इस्लामाबाद का स्पष्ट रुख माना जा सकता है, जिससे इलाके में और देश के अंदर और मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।
पाकिस्तान की सीनेट में विपक्ष के नेता राजा नासिर अब्बास ने चेतावनी दी: "अगर पाकिस्तान युद्ध में कूदता है तो यह देश के लिए तबाही होगी।" उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पहले से ही "दो खतरनाक विद्रोहों" का सामना कर रहा है, जबकि उसकी अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही है और महंगाई बढ़ गई है।
मध्य पूर्व का व्यापक संघर्ष पूरे इलाके में फैलता जा रहा है और इसमें ईरान भी शामिल है। सऊदी अरब और हूती भी आपस में उलझे हैं। उनके हमलों से एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और इलाके में जहाजों की आवाजाही पर भी खतरा मंडरा रहा है।
हालिया तनाव ने पवित्र शहर मक्का को भी संकट में डाल दिया है। सऊदी अरब ने कहा है कि उसके एयर डिफेंस सिस्टम ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को पवित्र शहर के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया।