नई दिल्ली: एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का मध्यम वर्ग बढ़ते वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है क्योंकि बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और परिवहन जैसी बुनियादी ज़रूरतों की लागत लगातार बढ़ रही है। कई अर्थशास्त्री और जानकार इसे सार्वजनिक नीति की विफलता मानते हैं, जो अब आम परिवारों के लिए निजी संघर्ष बन गई है।
'डॉन' अखबार के अनुसार, आम वेतनभोगी परिवारों के लिए सिकुड़ते आर्थिक दायरे पर बहस बढ़ रही है। इनमें से कई परिवार न तो इतने गरीब हैं कि उन्हें बड़े पैमाने पर सरकारी मदद मिल सके, और न ही इतने अमीर कि वे खराब होती सार्वजनिक सेवाओं के असर से खुद को बचा सकें।
रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही ये परिवार काम कर रहे हैं, टैक्स भर रहे हैं और रोज़मर्रा के खर्च पूरे कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि उनकी वित्तीय स्थिरता कमज़ोर होती जा रही है।
पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स के हालिया आंकड़े इस चुनौती को उजागर करते हैं। 2024-25 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, औसत मासिक पारिवारिक आय 82,179 रुपये थी, जबकि औसत मासिक उपभोग व्यय 79,150 रुपये तक पहुंच गया, जिससे केवल 3,000 रुपये से कुछ अधिक की बचत बची।
विश्लेषकों का कहना है कि यह कम अंतर दिखाता है कि कई परिवार चिकित्सा आपात स्थिति, बेरोज़गारी, स्कूल की बढ़ती फीस या घर की बड़ी मरम्मत जैसे अप्रत्याशित खर्चों के प्रति कितने संवेदनशील हैं।
यह दबाव केवल महंगाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध उन सेवाओं के लिए निजी तौर पर खर्च करने की बढ़ती ज़रूरत से भी है जिन्हें पारंपरिक रूप से सार्वजनिक सुविधाएँ माना जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जब सरकारी शिक्षा प्रणाली कमज़ोर पड़ती है तो परिवारों को अक्सर निजी स्कूलों के लिए भुगतान करना पड़ता है; सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में कमियों के कारण निजी अस्पतालों में इलाज कराना पड़ता है; और जहां नगरपालिका की सेवाएँ भरोसेमंद नहीं होतीं, वहां पानी की वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ती है।
बिजली इस दबाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण बन गई है। पाकिस्तान का बिजली क्षेत्र सर्कुलर डेट (बकाया कर्ज का चक्र), महंगी बिजली उत्पादन और वितरण में अक्षमता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, और उपभोक्ताओं को अक्सर ज़्यादा टैरिफ और अतिरिक्त सरचार्ज के ज़रिए इन लागतों का बोझ उठाना पड़ता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के साथ पाकिस्तान के कार्यक्रम से जुड़े प्रस्तावित टैरिफ सुधारों ने इस चिंता को बढ़ा दिया है कि मध्यम-आय वाले परिवारों को बिजली बिल में और बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है।
कई परिवारों के लिए, बिजली अब कोई ऐच्छिक खर्च नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन के ज़रूरी पहलुओं से जुड़ी एक आवश्यकता बन गई है, जिसमें रेफ्रिजरेशन, पानी पंपिंग, शिक्षा, रिमोट वर्क और गर्मी के बढ़ते तापमान से बचाव शामिल है।
नतीजतन, बिजली की बढ़ती लागत को केवल एक और यूटिलिटी खर्च के बजाय पारिवारिक आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देखा जा रहा है।