सऊदी को मिल सकती है यूरेनियम संवर्धन की अनुमति

Update: 2026-07-22 10:28 GMT

अमेरिका: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण परमाणु समझौते को मंजूरी दे दी है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब को अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए यूरेनियम संवर्धन की क्षमता मिलने का रास्ता साफ हो सकता है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, समझौते की आधिकारिक घोषणा जल्द की जा सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह समझौता करीब 30 वर्षों तक प्रभावी रहने की उम्मीद है। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां भी सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम के विकास में भाग ले सकती हैं। अमेरिका और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से चल रही बातचीत और संयुक्त शोध के बाद इस समझौते का मसौदा तैयार किया गया है।

समझौते के लागू होने के बाद सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन सुविधा विकसित करने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, इस कदम को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बहस भी शुरू हो सकती है। समझौते को अमेरिकी कांग्रेस के सामने समीक्षा के लिए पेश किया जाएगा, जहां इसे सांसदों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

अमेरिका के कुछ सांसदों और विशेषज्ञों को आशंका है कि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति देने से मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ सकती है। उनका कहना है कि संवर्धित यूरेनियम का इस्तेमाल केवल नागरिक परमाणु ऊर्जा के लिए हो, यह सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती होगी।

वहीं, समझौते के समर्थकों का कहना है कि इससे सऊदी अरब को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिलेगी और अमेरिका को क्षेत्र में अपनी रणनीतिक भागीदारी मजबूत करने का अवसर मिलेगा। अमेरिकी कंपनियों के शामिल होने से दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग भी बढ़ सकता है।

सऊदी अरब इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) का सदस्य देश है। यह संस्था दुनिया भर में शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ-साथ यह निगरानी भी करती है कि कोई देश परमाणु हथियार विकसित करने के लिए अपने कार्यक्रम का गलत इस्तेमाल न करे।

हालांकि, इस समझौते को लेकर एक बड़ा सवाल निगरानी व्यवस्था को लेकर है। सूत्रों के अनुसार, इसमें IAEA का अतिरिक्त प्रोटोकॉल शामिल नहीं होने की संभावना है। यह प्रोटोकॉल किसी देश में ज्यादा निरीक्षण और सत्यापन की अनुमति देता है, जिससे परमाणु गतिविधियों पर अधिक पारदर्शिता बनी रहती है।

सऊदी अरब लंबे समय से अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को विकसित करने की इच्छा जताता रहा है। देश का कहना है कि उसका उद्देश्य ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु तकनीक का शांतिपूर्ण उपयोग करना है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात को लेकर चिंता जताई जाती रही है कि संवर्धन क्षमता मिलने के बाद इसका इस्तेमाल भविष्य में किस दिशा में हो सकता है।

ट्रंप प्रशासन के इस फैसले को अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में कांग्रेस की समीक्षा और अंतरराष्ट्रीय निगरानी से यह तय होगा कि यह समझौता किस रूप में आगे बढ़ता है।

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