नेपाल : हिमालय में तेजी से बदलते मौसम और बढ़ते तापमान ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। अब खतरा केवल बाढ़ या भूस्खलन तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ों पर लटके हुए विशाल बर्फ के हिस्से यानी **हैंगिंग ग्लेशियर** भी बड़ी आपदा का कारण बन सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ये अस्थिर ग्लेशियर अचानक टूटकर नीचे गिरते हैं तो इससे बर्फ, चट्टान और पानी का ऐसा सैलाब आ सकता है, जो कई किलोमीटर तक तबाही मचा सकता है।
नेपाल में हालिया ग्लेशियर से जुड़ी आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में खतरे की ओर ध्यान खींचा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों की स्थिरता कमजोर हो रही है और कई इलाकों में बर्फ की विशाल संरचनाएं असंतुलित हो रही हैं।
क्या होते हैं हैंगिंग ग्लेशियर?
हैंगिंग ग्लेशियर ऐसे ग्लेशियर होते हैं जो पहाड़ों की खड़ी ढलानों पर टिके होते हैं। ये सामान्य ग्लेशियरों की तरह धीरे-धीरे नीचे की ओर नहीं बहते, बल्कि ऊंची और खतरनाक ढलानों पर जमा रहते हैं।
जब तापमान बढ़ता है, बर्फ तेजी से पिघलती है या पहाड़ों की चट्टानों की पकड़ कमजोर होती है तो इन ग्लेशियरों का संतुलन बिगड़ सकता है। इसके बाद बर्फ का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर सकता है।
यह गिरावट केवल बर्फ गिरने तक सीमित नहीं रहती। इसके साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और पानी भी नीचे की ओर तेजी से बह सकता है, जिससे फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
भारत में कितना बड़ा खतरा?
भारत के हिमालयी राज्य जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और सिक्किम ऐसे क्षेत्र हैं जहां ग्लेशियरों की संख्या काफी ज्यादा है। इनमें कई इलाके भूकंपीय और जलवायु परिवर्तन के लिहाज से संवेदनशील माने जाते हैं।
विशेषज्ञों ने उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में हैंगिंग ग्लेशियरों को लेकर विशेष चिंता जताई है। एक अध्ययन में इस क्षेत्र में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है। इनमें से कुछ ग्लेशियरों के टूटने पर नीचे बसे इलाकों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है।
अध्ययन के अनुसार, बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र जैसे इलाकों में संभावित ग्लेशियर टूटने से बनने वाले हिमस्खलन का प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।
नेपाल की घटना ने बढ़ाई चिंता
हाल में नेपाल में हुई विनाशकारी बाढ़ और तबाही ने हिमालयी आपदाओं के खतरे को फिर सामने ला दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसी घटनाओं में ग्लेशियर टूटना, बर्फ-चट्टान का गिरना और अचानक पानी का बहाव एक साथ मिलकर बड़ी आपदा पैदा कर सकते हैं।
हिमालय क्षेत्र में ऐसी घटनाओं का असर केवल एक देश तक सीमित नहीं रहता। नदियां कई देशों से होकर गुजरती हैं, इसलिए नेपाल, भारत और अन्य हिमालयी देशों के लिए आपदा प्रबंधन में आपसी सहयोग जरूरी माना जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन बना सबसे बड़ा कारण
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल है जहां तापमान तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और पहाड़ों की बर्फीली संरचनाओं में अस्थिरता बढ़ रही है।
इसके अलावा अनियमित बारिश, बादल फटना, भूकंप और पहाड़ी इलाकों में बढ़ता निर्माण कार्य भी खतरे को बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ग्लेशियरों के कमजोर होने से केवल बाढ़ का खतरा नहीं बढ़ता, बल्कि भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी घटनाएं भी ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं।
क्या समय रहते पता लगाया जा सकता है?
हैंगिंग ग्लेशियरों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इनके टूटने का सटीक समय बताना बेहद मुश्किल होता है। हालांकि वैज्ञानिक अब सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन सर्वे और सेंसर तकनीक के जरिए ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आपदा आने से पहले चेतावनी प्रणाली मजबूत करना सबसे जरूरी कदम है। यदि समय रहते खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान हो जाए तो लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है।
भारत में तैयारियों पर जोर
भारत सरकार और वैज्ञानिक संस्थान हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी बढ़ा रहे हैं। करीब 200 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों को लेकर भी निगरानी और आपदा प्रबंधन की दिशा में काम किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आपदा के बाद राहत कार्य करना पर्याप्त नहीं है। पहाड़ी इलाकों में निर्माण योजनाओं, जलविद्युत परियोजनाओं और आबादी के विस्तार को भी जोखिम के हिसाब से तय करना होगा।
भारत के लिए चेतावनी क्यों जरूरी?
हिमालय भारत की नदियों का प्रमुख स्रोत है और करोड़ों लोगों का जीवन इन नदियों पर निर्भर है। ऐसे में ग्लेशियरों से जुड़ी कोई भी बड़ी घटना न केवल पहाड़ी क्षेत्रों बल्कि मैदानी इलाकों को भी प्रभावित कर सकती है।
हैंगिंग ग्लेशियरों का खतरा यह संदेश देता है कि हिमालय में अब आपदाओं को केवल प्राकृतिक घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बदलते मौसम के दौर में वैज्ञानिक निगरानी, बेहतर चेतावनी प्रणाली और सुरक्षित विकास ही भविष्य में बड़े नुकसान को रोकने का रास्ता है।
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